राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पोलिंग बूथों के सीसीटीवी और वीडियो फुटेज तक आम लोगों की पहुंच सीमित करने वाले नियमों में दिसंबर 2024 में किए गए बदलाव और अब कथित तौर पर RTI के जवाब में पांच वर्षों के आवेदनों का रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात ने पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल सीधा है—जिस संस्था पर देश के लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की जिम्मेदारी है, उसके पास चुनावी फुटेज मांगने से जुड़े आवेदनों का व्यवस्थित रिकॉर्ड क्यों नहीं है? यदि रिकॉर्ड वास्तव में उपलब्ध नहीं है, तो आयोग को इसका स्पष्ट और आधिकारिक जवाब देना चाहिए।
मामले को लेकर सामने आए दावों के मुताबिक, दिसंबर 2024 में चुनाव आयोग ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को पत्र लिखकर पोलिंग बूथों के सीसीटीवी और वीडियो फुटेज की मांग से जुड़े आवेदनों की संख्या का हवाला दिया था। इसके बाद चुनाव नियमों में बदलाव किया गया। वहीं, 14 सितंबर 2026 को दाखिल RTI के जवाब में कथित तौर पर पिछले पांच वर्षों में ऐसे आवेदनों की कुल संख्या का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई। यदि दोनों बातें सही हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है: जब आवेदनों की संख्या नियम बदलने के औचित्य के रूप में सामने रखी गई, तो उस संख्या का रिकॉर्ड अब कहां है?
तीन तारीखें, कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में दिसंबर 2024 की तीन तारीखों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। दावे के अनुसार, 10 दिसंबर को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा चुनाव से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और दस्तावेजों को लेकर आदेश दिया। 17 दिसंबर को चुनाव आयोग ने नियमों में बदलाव के लिए कानून मंत्रालय को पत्र लिखा और 20 दिसंबर को संशोधित नियमों की अधिसूचना जारी हो गई। आधिकारिक राजपत्र में 20 दिसंबर 2024 को Conduct of Elections (Second Amendment) Rules, 2024 की अधिसूचना प्रकाशित होने की पुष्टि होती है। हालांकि, बाकी तारीखों और पूरी प्रक्रिया के संबंध में संबंधित पत्र, अदालत के आदेश तथा सरकारी रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही घटनाक्रम की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
नियमों में किए गए बदलाव के तहत चुनाव नियमावली के नियम 93(2)(a) में यह स्पष्ट किया गया कि चुनाव से संबंधित कागजातों का निरीक्षण उन्हीं दस्तावेजों तक सीमित रहेगा, जिन्हें नियमों में निर्दिष्ट किया गया है। इस बदलाव का प्रभाव इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और चुनावी फुटेज की सार्वजनिक उपलब्धता पर पड़ा। सरकार और चुनाव आयोग की ओर से गोपनीयता, मतदाताओं की निजता तथा फुटेज के संभावित दुरुपयोग जैसे तर्क दिए गए हैं। लेकिन निजता की सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता—दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया गया, यह सवाल अब भी महत्वपूर्ण है।
रिकॉर्ड नहीं तो नियम बदलने का आधार क्या था?
सबसे अहम सवाल RTI में कथित तौर पर रिकॉर्ड उपलब्ध न होने का है। यदि चुनाव आयोग के पास पांच वर्षों में प्राप्त आवेदनों की संख्या का कोई संकलित रिकॉर्ड नहीं है, तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या रिकॉर्ड कभी बनाया ही नहीं गया, नष्ट कर दिया गया, किसी अन्य कार्यालय में रखा है या RTI के जवाब में केवल संकलित आंकड़ा उपलब्ध न होने की बात कही गई है। ये अलग-अलग स्थितियां हैं और इनका अर्थ भी अलग है। केवल “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” होने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि कोई आवेदन आया ही नहीं था; लेकिन यह जवाब अपने आप में सार्वजनिक स्पष्टीकरण की मांग जरूर करता है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल चुनाव कराने से नहीं, बल्कि अपने फैसलों के आधार और प्रक्रिया को पारदर्शी रखने से भी बनती है। चुनावी फुटेज तक पहुंच पर रोक लगाने वाले नियमों के पीछे यदि ठोस कारण थे, तो उन कारणों और संबंधित आंकड़ों को स्पष्ट रूप से सामने रखा जाना चाहिए। अगर किसी नियम में बदलाव से जनता और उम्मीदवारों की चुनावी प्रक्रिया की जांच करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इस मामले में किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन गंभीर सवालों को अनदेखा करना भी स्वीकार्य नहीं है। चुनाव आयोग को कथित RTI जवाब, दिसंबर 2024 में कानून मंत्रालय को भेजे गए पत्र, नियम संशोधन की फाइल और उपलब्ध आवेदन-संबंधी आंकड़ों पर स्पष्ट स्थिति रखनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र जांच भी होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि निर्णय किन तथ्यों के आधार पर लिया गया और रिकॉर्ड की स्थिति क्या है।
लोकतंत्र में वोट की ताकत जनता के भरोसे से आती है। चुनावी प्रक्रिया पर संदेह पैदा करने वाले सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, पारदर्शी जांच और प्रमाणित तथ्यों से दिया जाना चाहिए। जवाबदेही किसी पद की कृपा नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी है।



