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बिना SOP, बिना लिखित निर्देश—आखिर किस नियम से कटे हजारों वोट? चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026

SIR में ऑटो-जेनरेटेड Form-7 से मतदाता सूची से नाम हटाने का मामला; ERO के डिजिटल हस्ताक्षर वाले फॉर्म इस्तेमाल हुए, लेकिन राज्यों को लिखित प्रोटोकॉल नहीं मिलने की रिपोर्ट

मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दूसरे और तीसरे चरण के दौरान हजारों मतदाताओं के नाम कथित तौर पर ऑटो-जेनरेटेड Form-7 के जरिए हटाए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि इन फॉर्मों पर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ERO) के डिजिटल हस्ताक्षर होने के बावजूद, राज्यों के चुनाव अधिकारियों को इस प्रक्रिया के लिए चुनाव आयोग की ओर से कोई लिखित प्रोटोकॉल या मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) साझा किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है।

यह सवाल इसलिए बेहद गंभीर है, क्योंकि मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम होना उसके मतदान के अधिकार के इस्तेमाल की बुनियादी शर्त है। यदि नाम हटाने की प्रक्रिया में स्पष्ट नियम, जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं है, तो इसका सीधा असर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर पड़ सकता है।

Form-7 किसलिए है, और विवाद क्यों?

Form-7 चुनाव आयोग का आधिकारिक फॉर्म है। इसका इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी प्रविष्टि पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी मौजूदा नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि हजारों नाम हटाने के लिए ऑटो-जेनरेटेड फॉर्म इस्तेमाल किए जा रहे हैं, तो इनकी प्रक्रिया, आधार और सत्यापन के नियम क्या हैं?

रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों में यह प्रक्रिया चुनाव आयोग की ओर से लिखित SOP या प्रोटोकॉल जारी किए जाने के बिना संचालित की जा रही है। चुनावी नियमावली में भी ERO द्वारा स्वयं Form-7 दाखिल करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं होने की बात सामने आई है। यदि यह स्थिति सही है, तो आयोग को बताना होगा कि इस प्रक्रिया का कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या है।

चुनाव आयोग को जवाब देना होगा

यह महज तकनीकी प्रक्रिया का सवाल नहीं है। मतदाता सूची से नाम हटाने के मामले में हर कदम नियमों के अनुरूप होना चाहिए। किसी भी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटता है, तो वह केवल एक डेटा एंट्री की गलती नहीं, बल्कि उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित करने वाला मामला है।

चुनाव आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि ऑटो-जेनरेटेड Form-7 किस नियम के तहत तैयार किए गए, इन्हें डिजिटल हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया क्या थी, संबंधित मतदाताओं को सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर कैसे दिया गया तथा राज्यों को लिखित दिशा-निर्देश क्यों नहीं दिए गए।

लोकतंत्र में मतदाता सूची पर संदेह दूर करना जरूरी

जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है, तब चुनाव आयोग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। आयोग को केवल यह कहकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए कि प्रक्रिया नियमित है। उसे नियमों, दस्तावेजों और सत्यापन की पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि किसी भी नागरिक का नाम मनमाने ढंग से हटाए जाने की आशंका दूर हो सके।

मतदाता सूची में नाम जोड़ना और हटाना प्रशासनिक औपचारिकता भर नहीं है। यह लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा मामला है। इसलिए चुनाव आयोग को जवाब देना होगा कि हजारों नाम हटाने की इस प्रक्रिया में नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित किया गया और राज्यों को लिखित SOP के बिना काम करने की नौबत क्यों आई।

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