विश्लेषण/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 9 अक्टूबर 2026
देश की चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को लेकर चुनाव आयोग के दावे और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब अब आयोग को दस्तावेजों के साथ देना होगा। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी और रिकॉर्ड सामने आने पर यह देखना चाहेगा कि बदलाव किसने किया। यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब आयोग पहले इस घोषणा को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने का हवाला दे चुका था। सवाल सीधा है—जब अदालत ने संशोधित फॉर्म को मंजूरी नहीं दी, तो आयोग ने अपने दावे के समर्थन में किस आदेश का हवाला दिया? बदलाव किसने अधिकृत किया? और क्या इस प्रक्रिया में कानून तथा आयोग के सामूहिक निर्णय के नियमों का पालन हुआ? इन सवालों का जवाब केवल चुनाव आयोग की साख के लिए नहीं, बल्कि देश की चुनावी व्यवस्था पर जनता के भरोसे के लिए भी जरूरी है।

इस विवाद को केवल एक तकनीकी फॉर्म की गलती बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि इसमें अतिरिक्त घोषणा या शर्त जोड़ी जाती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा करने का अधिकार किस नियम से मिला, बदलाव किसने मंजूर किया और उसका पात्र मतदाताओं पर क्या असर पड़ा। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह बदलाव विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान सामने आया, जब मतदाता सूची में नाम जोड़ने, पुराने रिकॉर्ड का सत्यापन करने और पात्र नागरिकों की पहचान से जुड़े फैसले लिए जा रहे हैं। ऐसे समय में प्रक्रिया की हर शर्त का कानूनी आधार स्पष्ट होना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाली संस्था से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह नियमों के पालन का उदाहरण पेश करे—न कि उसके अपने फैसलों की वैधता पर सवाल उठें।
फॉर्म-6 में क्या जोड़ा गया और विवाद क्यों बढ़ा?
फॉर्म-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है। विवाद इसके ऑनलाइन संस्करण में SIR से जुड़ी एक अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने पर है। इस घोषणा में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि उसका नाम या उसके माता-पिता का नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। आयोग का कहना रहा है कि मूल वैधानिक फॉर्म में संशोधन नहीं किया गया, बल्कि SIR के लिए अलग घोषणा जोड़ी गई थी। लेकिन सवाल यह है कि यदि मूल फॉर्म नहीं बदला गया, तो ऑनलाइन आवेदन में ऐसी अतिरिक्त जानकारी भरने की व्यवस्था किस अधिकार से लागू की गई? क्या इसके लिए नियमों के तहत आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई थी? क्या आवेदक इस घोषणा का जवाब दिए बिना अपना आवेदन जमा कर सकते थे? इन सवालों का उत्तर महत्वपूर्ण है, क्योंकि घोषणा को अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन उसे भरे बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियां और आयोग के भीतर उठे सवाल
फॉर्म-6 विवाद की गंभीरता इसलिए भी बढ़ी क्योंकि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से आयोग के कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की खबरें सामने आईं। दोनों आयुक्तों की आपत्तियों और आयोग के फैसलों पर असहमति की खबरों के बीच चुनाव आयोग ने कहा था कि SIR से जुड़े फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी से लिए गए थे। दूसरी ओर, मीडिया रिपोर्टों में फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर औपचारिक आपत्तियां दर्ज होने का उल्लेख है। यही विरोधाभास जांच की मांग करता है: क्या विवादित बदलाव पर आयोग के सभी सदस्यों की सहमति थी, या इस खास फैसले पर मतभेद था? यदि आपत्तियां दर्ज हुई थीं, तो उन्हें किस तरह निपटाया गया? और यदि आयोग का दावा है कि अंतिम फैसला सर्वसम्मति से हुआ, तो उस दावे का समर्थन करने वाले आधिकारिक रिकॉर्ड क्या कहते हैं?
एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में असहमति होना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन संस्था के नाम पर जारी किए गए फैसलों की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठें, तो उनका जवाब देना जरूरी हो जाता है। यदि निर्णय सर्वसम्मति से हुआ था, तो आयोग संबंधित रिकॉर्ड सामने रख सकता है। यदि किसी बदलाव पर आपत्ति थी, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि अंतिम निर्णय किस कानूनी प्रक्रिया से लिया गया। पारदर्शिता से ही यह पता चलेगा कि विवाद किसी तकनीकी गलतफहमी का परिणाम है या निर्णय प्रक्रिया में ऐसी कमी थी जिसे सुधारने की आवश्यकता है।
मोदी सरकार की जवाबदेही क्यों बनती है?
यह मामला सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के व्यक्तिगत निर्देशों से जुड़ा है, ऐसा उपलब्ध रिपोर्टों से साबित नहीं होता। इसलिए यह कहना कि उन्होंने स्वयं फॉर्म-6 में बदलाव का आदेश दिया, तथ्यों से आगे जाना होगा। लेकिन केंद्र सरकार की जवाबदेही का प्रश्न फिर भी महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े वैधानिक नियम, प्रशासनिक व्यवस्था और आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा करना संवैधानिक शासन का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अब यह देखना होगा कि आयोग और केंद्र सरकार अदालत के सामने कौन-सा रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हैं और विवादित बदलाव की वैधानिकता को किस आधार पर सही ठहराते हैं।
मोदी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती यह है कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का उत्तर केवल विपक्ष पर आरोप लगाकर नहीं दिया जा सकता। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बनी रहे और अदालत के सामने उठे सवालों का समाधान कानून के अनुसार हो। हालांकि, फॉर्म-6 विवाद के आधार पर प्रधानमंत्री या गृह मंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना अभी संभव नहीं है। उसके लिए ऐसा प्रमाण चाहिए जो उनके किसी विशिष्ट निर्देश या निर्णय को विवादित बदलाव से जोड़ता हो।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया और क्या नहीं किया?
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित फॉर्म-6 को अपनी मंजूरी देने के दावे से स्पष्ट रूप से दूरी बनाई और रिकॉर्ड के आधार पर यह जानने की बात कही कि बदलाव किसने किया। अदालत ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग पर उस समय आदेश देने से इनकार किया, लेकिन केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित निर्वाचन आयुक्तों से जवाब मांगा। इसका अर्थ है कि विवाद की जांच आगे बढ़ रही है; अदालत ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि बदलाव अवैध था या किसी अधिकारी ने जानबूझकर गलत दावा किया।
यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत की टिप्पणी आयोग के दावे पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, लेकिन टिप्पणी को दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया का अगला चरण संबंधित पक्षों के जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच है। यदि अदालत को लगे कि कोई निर्णय वैधानिक अधिकार से बाहर या निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत लिया गया, तो वह कानून के अनुरूप आदेश दे सकती है। फिलहाल, सबसे अहम बात यह है कि आयोग अपने दावे का आधार स्पष्ट करे और यह बताए कि ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव का निर्णय किसने लिया था।
क्या चुनाव आयोग ने अपनी गलती सुधारने की कोशिश की?
चुनाव आयोग ने 30 सितंबर को उन राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म-6 से SIR संबंधी अतिरिक्त घोषणा हटा दी थी जहां पुनरीक्षण पूरा हो चुका था। इससे यह सवाल भी उठता है कि यदि घोषणा प्रक्रिया का आवश्यक और निर्विवाद हिस्सा थी, तो उसे कुछ राज्यों में हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? आयोग का पक्ष है कि गैर-SIR अवधि में नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे। इसलिए इस कदम को अपने आप में गलती स्वीकार करने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि घोषणा किन राज्यों में, कितने समय तक और किस आदेश के तहत लागू रही तथा उसे हटाने का निर्णय किन कारणों से लिया गया।
मतदाता पंजीकरण में तकनीकी बदलाव का असर वास्तविक नागरिकों पर पड़ सकता है। इसलिए आयोग को यह भी बताना चाहिए कि अतिरिक्त घोषणा के कारण कितने आवेदन प्रभावित हुए, कितने आवेदन लंबित रहे और क्या किसी पात्र आवेदक को केवल पुराने रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी उपलब्ध न होने के कारण कठिनाई हुई। ऐसे आंकड़े सामने आए बिना इस विवाद के वास्तविक प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता।
जवाबदेही से ही चुनावी भरोसा बचेगा
फॉर्म-6 विवाद ने चुनाव आयोग के सामने तीन स्पष्ट सवाल रखे हैं: संशोधित फॉर्म को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने का दावा किस आधार पर किया गया? ऑनलाइन घोषणा किसने और किस अधिकार से जोड़ी? और क्या इस फैसले में आयोग की वैधानिक तथा सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन हुआ? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ दिया जाना चाहिए।
मोदी सरकार को भी यह स्पष्ट करना होगा कि अदालत के सामने रखे गए सवालों पर उसका पक्ष क्या है और वह संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा कानून के पालन को किस तरह सुनिश्चित करती है। लेकिन जब तक किसी विशिष्ट निर्देश या अवैध कार्रवाई का प्रमाण सामने नहीं आता, तब तक प्रधानमंत्री या गृह मंत्री को इस विवाद में व्यक्तिगत रूप से दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिक के मताधिकार का आधार है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल उसके दावों से नहीं, बल्कि उन दावों के समर्थन में पेश किए गए प्रमाणों से तय होगी। अब आयोग को स्पष्ट करना है कि बदलाव किसने किया, उसका कानूनी आधार क्या था और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी का दावा किस अर्थ में किया गया। इन सवालों का पारदर्शी जवाब ही इस विवाद को सुलझाने और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बनाए रखने की दिशा में सबसे जरूरी कदम होगा।



