पर्यावरण/विशेष रिपोर्ट | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 8 अक्टूबर 2026
कभी जिन वन्यजीवों का भविष्य लगभग अंधकार में दिखाई देता था, उनके संरक्षण की दिशा में भारत से अब उम्मीद जगाने वाली खबरें सामने आ रही हैं। गुजरात के कच्छ में करीब एक दशक बाद ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण के चूजे का जन्म इस बात का महत्वपूर्ण संकेत है कि यदि वैज्ञानिक प्रयास, संरक्षण नीति और स्थानीय समुदायों की भागीदारी एक साथ काम करें तो विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों को भी वापस बचाया जा सकता है। यह उपलब्धि केवल एक पक्षी के बच्चे के जन्म की खबर नहीं है, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है जिसमें इंसान ने अपनी ही विकास यात्रा के बीच प्रकृति के लिए जगह बचाने की कोशिश की है। दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी ही उम्मीदें मिली हैं। स्पेन और पुर्तगाल में इबेरियन लिंक्स की संख्या 2001 में महज 62 वयस्क जानवरों से बढ़कर 2022 में 648 हो गई। अफ्रीका के चाड में स्किमिटार-हॉर्न्ड ओरिक्स को दोबारा जंगल में बसाया गया और कजाखस्तान में साइगा एंटीलोप की आबादी ने भी उल्लेखनीय वापसी की। ये उदाहरण बताते हैं कि किसी प्रजाति का संकट अंतिम अध्याय नहीं होता, बशर्ते संरक्षण के प्रयास लगातार और वैज्ञानिक आधार पर किए जाएं।
भारत के संदर्भ में यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध होने के साथ-साथ बेहद संवेदनशील भी है। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट, राजस्थान के घास के मैदानों से लेकर पूर्वोत्तर की आर्द्रभूमियों और समुद्री तटों तक अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्रों में ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं जिनका अस्तित्व सीधे उनके प्राकृतिक आवास पर निर्भर करता है। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, संगाई, डुगोंग और हंगुल जैसी प्रजातियां केवल वन्यजीव सूची में दर्ज नाम नहीं हैं; वे अपने-अपने पारिस्थितिक तंत्र की सेहत का संकेत भी हैं। यदि किसी घासभूमि से गोडावण गायब होता है, किसी आर्द्रभूमि से संगाई संकट में पड़ता है या समुद्री घास के मैदान नष्ट होते हैं और डुगोंग के लिए भोजन कम होता है, तो इसका असर केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं रहता। प्रकृति में हर प्रजाति एक बड़े जाल की कड़ी है और किसी एक कड़ी के कमजोर होने का असर धीरे-धीरे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।
भारत सरकार की Integrated Development of Wildlife Habitats योजना के तहत 24 चिन्हित प्रजातियों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इसके तहत राज्यों को शोध, आवास सुधार, सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जैसे क्षेत्रों में काम करना होता है। यह दिशा महत्वपूर्ण है क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अब केवल जंगलों में गश्त बढ़ाने या जानवरों की संख्या गिनने तक सीमित नहीं रह सकता। आज संरक्षण की चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बदलती जलवायु, तेजी से बढ़ता बुनियादी ढांचा, सड़कों और बिजली लाइनों का विस्तार, प्राकृतिक आवासों का विभाजन, मानव-वन्यजीव संघर्ष और भोजन तथा पानी की उपलब्धता में बदलाव—इन सभी का प्रभाव वन्यजीवों पर पड़ता है। इसलिए संरक्षण की सफलता तभी संभव है जब वैज्ञानिक शोध को जमीन पर लागू होने वाली नीतियों और स्थानीय लोगों की भागीदारी से जोड़ा जाए।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की कहानी इस चुनौती को सबसे स्पष्ट तरीके से सामने रखती है। यह पक्षी मुख्य रूप से खुले घास के मैदानों पर निर्भर करता है, लेकिन यही क्षेत्र लंबे समय से कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचे और अन्य मानवीय गतिविधियों के दबाव में रहे हैं। बिजली की ऊंची तारें भी इस पक्षी के लिए गंभीर खतरा रही हैं क्योंकि भारी शरीर वाला यह पक्षी उड़ान के दौरान तारों को आसानी से नहीं देख पाता। इसलिए केवल पक्षी को बचाना पर्याप्त नहीं है; उसके पूरे आवास को बचाना होगा। कच्छ में लंबे अंतराल के बाद चूजे का जन्म इसी व्यापक संरक्षण प्रयास की सफलता का संकेत है। यह उम्मीद देता है कि यदि वैज्ञानिक निगरानी, प्रजनन कार्यक्रम, सुरक्षित आवास और पर्याप्त भोजन की व्यवस्था लगातार बनी रहे तो अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए भी भविष्य बनाया जा सकता है।
हिमालय का स्नो लेपर्ड भी इस बात का उदाहरण है कि संरक्षण केवल सरकारी व्यवस्था से नहीं चलता। ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में वैज्ञानिक अध्ययन के साथ स्थानीय समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। जिन लोगों का जीवन सदियों से जंगल, पहाड़ और चरागाहों से जुड़ा है, उन्हें संरक्षण का साझेदार बनाए बिना किसी भी दीर्घकालिक योजना को सफल बनाना कठिन है। स्थानीय समुदाय यदि वन्यजीवों को अपने लिए खतरे या प्रतिबंध के रूप में देखने लगें तो संरक्षण और समाज के बीच टकराव पैदा हो सकता है। लेकिन यदि उन्हें संरक्षण से रोजगार, सम्मान, सुरक्षा और निर्णय लेने में भागीदारी मिलती है तो वही समुदाय वन्यजीवों के सबसे मजबूत रक्षक बन सकते हैं। भारत में संरक्षण की अगली बड़ी छलांग इसी स्थानीय भागीदारी को मजबूत करने से आ सकती है।
वन्यजीव संरक्षण की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि किसी प्रजाति की संख्या कितनी बढ़ी। असली सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या उसका प्राकृतिक आवास सुरक्षित है, क्या उसके भोजन और पानी के स्रोत सुरक्षित हैं, क्या उसका प्रजनन चक्र सुरक्षित है और क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए वही पारिस्थितिकी तंत्र बचा रहेगा? किसी प्रजाति की संख्या कुछ वर्षों के लिए बढ़ा देना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन उसे एक स्वस्थ प्राकृतिक पर्यावरण में स्थायी रूप से बनाए रखना कहीं अधिक कठिन काम है। यही वजह है कि संरक्षण में विज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ रही है। कैमरा ट्रैप, सैटेलाइट निगरानी, डीएनए आधारित अध्ययन, आबादी की वैज्ञानिक गणना और आवास के डिजिटल मानचित्र अब संरक्षण की रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं।
भारत को अब अपनी National Red List Assessment जैसी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को भी व्यापक और नियमित बनाने की आवश्यकता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन प्रजातियों को तत्काल संरक्षण की जरूरत है और किन क्षेत्रों में संसाधनों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी तक जिन प्रजातियों पर अधिक ध्यान गया है, उनके अलावा कई ऐसे पौधे और छोटे जीव भी हो सकते हैं जिनका संकट सार्वजनिक चर्चा में नहीं आता, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। संरक्षण का अगला चरण केवल बाघ, हाथी या कुछ चर्चित प्रजातियों तक सीमित नहीं रह सकता। हमें छोटे स्तनधारियों, पक्षियों, उभयचरों, सरीसृपों, परागण करने वाले जीवों और संकटग्रस्त पौधों तक संरक्षण की दृष्टि को फैलाना होगा।
इस पूरे प्रयास में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन सबसे कठिन चुनौती बनी रहेगी। सड़कें, रेलवे, बिजली परियोजनाएं, खनन, शहरों का विस्तार और औद्योगिक गतिविधियां देश की आर्थिक जरूरतों का हिस्सा हैं, लेकिन इनके लिए प्राकृतिक आवासों को पूरी तरह नजरअंदाज करना लंबे समय में महंगा साबित हो सकता है। इसलिए सवाल विकास रोकने का नहीं, बल्कि ऐसा विकास करने का है जिसमें प्रकृति की कीमत को भी आर्थिक गणना का हिस्सा माना जाए। वन्यजीव गलियारों की रक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण की वैज्ञानिक योजना, बिजली लाइनों के सुरक्षित डिजाइन, आर्द्रभूमियों और घासभूमियों का संरक्षण तथा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा जैसी नीतियां इसी संतुलन को मजबूत कर सकती हैं।
वन्यजीव सप्ताह के दौरान मिली ये उपलब्धियां हमें उत्सव का अवसर जरूर देती हैं, लेकिन साथ ही एक बड़ी जिम्मेदारी की याद भी दिलाती हैं। किसी प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने में वर्षों लग सकते हैं, जबकि उसकी आबादी को खत्म होने में कुछ गलत फैसले ही पर्याप्त होते हैं। इसलिए संरक्षण में निरंतरता सबसे महत्वपूर्ण है। सरकार बदल सकती है, योजनाओं के नाम बदल सकते हैं, बजट की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं, लेकिन जंगल, घासभूमि, समुद्र और उनमें रहने वाली प्रजातियों को लगातार संरक्षण की जरूरत रहती है। आज जो चूजा कच्छ में पैदा हुआ है, वह केवल एक नई जिंदगी नहीं है; वह यह संदेश भी है कि प्रकृति को यदि अवसर दिया जाए तो वह वापस लौट सकती है।
भारत के वन्यजीवों की यह वापसी हमें एक बहुत सरल लेकिन गहरी बात सिखाती है—प्रकृति को बचाना केवल जानवरों को बचाना नहीं है, बल्कि अपने भविष्य को बचाना है। स्वस्थ जंगल पानी के स्रोतों को सुरक्षित रखते हैं, घासभूमियां मिट्टी और जैव विविधता को बचाती हैं, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तटीय जीवन और अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं और वन्यजीव पूरे पर्यावरण के संतुलन में भूमिका निभाते हैं। इसलिए गोडावण का चूजा, हिमालय का स्नो लेपर्ड, मणिपुर का संगाई, कश्मीर का हंगुल और समुद्र का डुगोंग—ये सभी भारत के प्राकृतिक भविष्य के अलग-अलग चेहरे हैं। इनके लिए लड़ाई केवल संरक्षणवादियों की लड़ाई नहीं होनी चाहिए; यह सरकार, वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों, उद्योग और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए। विलुप्ति के किनारे से वापसी संभव है—लेकिन इस उम्मीद को स्थायी सफलता में बदलने के लिए संरक्षण को परियोजना नहीं, पीढ़ियों की प्रतिबद्धता बनाना होगा।



