राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मदुरै | 8 अक्टूबर 2026
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने विदेशी चंदे और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि ऐसे धार्मिक संगठन जिनकी गतिविधियां देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित नहीं करतीं, वे Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA के तहत पंजीकरण पाने के पात्र हो सकते हैं। वहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संगठन जो एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म में परिवर्तित करने की गतिविधियों में शामिल हैं, उन्हें FCRA पंजीकरण नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी कोडाइकनाल स्थित Kanzeon Public Charitable Trust की उस अपील पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें ट्रस्ट ने FCRA, 2010 के तहत पंजीकरण प्रमाणपत्र देने से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी।
मामले की सुनवाई मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ की एक खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता ट्रस्ट की स्थापना वर्ष 2021 में हुई थी और वह आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12AB तथा 80G के तहत पंजीकृत था। ट्रस्ट ने विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए FCRA के तहत पंजीकरण की मांग की थी, लेकिन उसका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद ट्रस्ट ने इस फैसले को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने FCRA के तहत विदेशी योगदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं की गतिविधियों और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे तथा सामाजिक सद्भाव से जुड़े पहलुओं पर विचार किया।
अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि केवल धार्मिक संस्था होना अपने आप में FCRA पंजीकरण से वंचित करने का आधार नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि किसी धार्मिक संगठन की गतिविधियां देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित नहीं करतीं, तो वह FCRA पंजीकरण के लिए पात्र हो सकता है। हालांकि, अदालत ने धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल संगठनों को अलग श्रेणी में रखते हुए कहा कि एक धार्मिक विश्वास से दूसरे धार्मिक विश्वास में लोगों के परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल संगठनों को FCRA पंजीकरण नहीं दिया जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने विदेशी योगदान प्राप्त करने की पात्रता को संगठन की घोषित गतिविधियों और उनके संभावित सामाजिक प्रभाव से जोड़कर देखा है।
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 भारत में विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों और संस्थाओं के लिए नियामक ढांचा प्रदान करता है। इसका उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी योगदान का इस्तेमाल देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, सार्वजनिक हित तथा सामाजिक सौहार्द के प्रतिकूल तरीके से न हो। FCRA के तहत पंजीकरण प्राप्त करने वाली संस्थाओं को विदेशी योगदान के इस्तेमाल और उससे संबंधित वित्तीय गतिविधियों के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना होता है। इसलिए किसी संस्था को केवल एक ट्रस्ट या गैर-लाभकारी संस्था के रूप में पंजीकृत होना अपने आप में विदेशी चंदा प्राप्त करने की अनुमति नहीं देता; इसके लिए FCRA के तहत अलग नियामकीय प्रक्रिया और पात्रता आवश्यक होती है।
इस मामले में Kanzeon Public Charitable Trust ने अपनी कानूनी और आयकर संबंधी पंजीकरण स्थिति का हवाला देते हुए FCRA प्रमाणपत्र की मांग की थी। ट्रस्ट पहले से आयकर कानून की धारा 12AB और 80G के तहत पंजीकृत था, लेकिन FCRA के तहत उसका आवेदन स्वीकार नहीं किया गया। हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए FCRA पंजीकरण की पात्रता और संगठन की गतिविधियों के बीच संबंध का था। अदालत की टिप्पणी इसी संदर्भ में आई है और इसे धार्मिक संस्थाओं के विदेशी वित्तपोषण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आवेदन में किसी भी प्रकार की जानकारी छिपाने या गलत जानकारी देने की स्थिति में आवेदन स्वयं अस्वीकृति का आधार बन सकता है। यानी FCRA पंजीकरण की प्रक्रिया में संगठन द्वारा दी गई जानकारी और उसकी वास्तविक गतिविधियों के बीच पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। किसी संस्था को अपने उद्देश्य, गतिविधियों और विदेशी योगदान के संभावित इस्तेमाल से संबंधित विवरण सही और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना होगा। अदालत की टिप्पणी ऐसे मामलों में आवेदन प्रक्रिया और संस्था की वास्तविक गतिविधियों के बीच सामंजस्य की आवश्यकता को भी सामने लाती है।
यह फैसला धार्मिक संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कई संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा, राहत कार्य और धार्मिक गतिविधियों के क्षेत्र में काम करती हैं और कुछ संस्थाएं विदेशी स्रोतों से योगदान प्राप्त करने की इच्छा रखती हैं। FCRA के तहत विदेशी धन प्राप्त करने के लिए उन्हें कानून में निर्धारित पात्रता और शर्तों को पूरा करना होता है। हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी इस बात पर जोर देती है कि विदेशी योगदान प्राप्त करने की अनुमति केवल संस्था की कानूनी संरचना देखकर नहीं, बल्कि उसकी गतिविधियों और उनके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए देखी जा सकती है।
फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि अदालत ने धार्मिक संस्थाओं को एक समान श्रेणी में नहीं रखा। अदालत के अनुसार ऐसी धार्मिक संस्थाएं जिनकी गतिविधियां धर्मनिरपेक्ष ढांचे और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित नहीं करतीं, FCRA पंजीकरण के लिए पात्र हो सकती हैं, जबकि धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल संगठनों के लिए अदालत ने अलग रुख अपनाया है। इस तरह अदालत ने धार्मिक गतिविधियों, विदेशी योगदान और सामाजिक सौहार्द से जुड़े पहलुओं के बीच एक कानूनी अंतर रेखांकित किया है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में विदेशी चंदे से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों को लेकर लंबे समय से नियामकीय और कानूनी बहस चलती रही है। FCRA के तहत पंजीकरण, नवीनीकरण, विदेशी धन के इस्तेमाल और नियमों के अनुपालन को लेकर सरकार और विभिन्न संस्थाओं के बीच कई विवाद अदालतों तक पहुंचे हैं। ऐसे मामलों में अदालतें आम तौर पर यह देखती हैं कि संबंधित संस्था कानून में निर्धारित शर्तों का पालन कर रही है या नहीं और विदेशी योगदान का इस्तेमाल घोषित उद्देश्यों के अनुरूप किया जा रहा है या नहीं।
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सौहार्द और विदेशी वित्तीय योगदान से जुड़े अलग-अलग कानूनी पहलुओं को एक साथ देखा गया है। हालांकि, इस फैसले को सभी धार्मिक संगठनों पर स्वतः लागू होने वाला व्यापक प्रतिबंध समझना उचित नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट रूप से ऐसी धार्मिक संस्थाओं के लिए भी FCRA पंजीकरण की संभावना स्वीकार की है जिनकी गतिविधियां देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और सामाजिक सद्भाव को प्रभावित नहीं करतीं। इसलिए फैसले का केंद्र धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों और FCRA पंजीकरण की पात्रता है, न कि धार्मिक संगठनों पर सामान्य प्रतिबंध।
मामला अब विदेशी योगदान प्राप्त करने की कानूनी प्रक्रिया में संगठन की गतिविधियों, घोषित उद्देश्यों और सामाजिक प्रभाव के महत्व को सामने लाता है। FCRA के तहत पंजीकरण चाहने वाले संगठनों के लिए अदालत की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण न्यायिक संकेत है कि आवेदन में पारदर्शिता, गतिविधियों की वास्तविक प्रकृति और कानून में निर्धारित शर्तों का पालन बेहद महत्वपूर्ण रहेगा।



