राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 7 अक्टूबर 2026
मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर अहम सवाल उठाए हैं। अदालत ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर चुनाव आयोग से सवाल करते हुए कहा कि मौजूदा मतदाता सूची तब तक वैध रहती है, जब तक नई ड्राफ्ट सूची अंतिम रूप से प्रकाशित नहीं हो जाती।
कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR के दौरान मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने को लेकर विपक्ष और विभिन्न संगठनों की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं।
हाईकोर्ट ने ECI से पूछा—नाम हटाने का आधार क्या?
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की डिवीजन बेंच एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका सालगांवकर परिवार की ओर से दाखिल की गई थी।
परिवार का कहना था कि उन्होंने पता बदलने के लिए Form 8 जमा किया था, इसके बावजूद उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटा दिए गए।
इसी मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने SIR के तहत नाम हटाने की प्रक्रिया पर चुनाव आयोग से सवाल किए।
पुरानी मतदाता सूची कब तक वैध?
हाईकोर्ट ने Registration of Electors Rules, 1960 का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान में लागू मतदाता सूची तब तक वैध रहती है, जब तक ड्राफ्ट मतदाता सूची को अंतिम रूप नहीं दे दिया जाता।
इस टिप्पणी का सीधा अर्थ यह है कि केवल ड्राफ्ट सूची तैयार होने के दौरान किसी मतदाता का नाम गायब हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि उसकी पुरानी प्रविष्टि स्वतः समाप्त हो गई।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में नियमों के पालन को महत्वपूर्ण बताया।
पता बदलने वाले मतदाता पर भी सवाल
पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी मतदाता ने अपना निवास स्थान बदल लिया है तो चुनाव आयोग उससे उसी पुराने स्थान की प्रक्रिया के तहत Enumeration Form जमा करने के लिए नहीं कह सकता।
यानी मतदाता के पते में बदलाव और मतदाता सूची में उसके नाम की स्थिति को लेकर प्रक्रिया स्पष्ट और नियमों के अनुरूप होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया जिसमें चुनाव आयोग पर यह दायित्व बताया गया है कि पात्र भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाएं।
मतदाता सूची केवल चुनाव कराने की प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि मतदान के संवैधानिक अधिकार से सीधे जुड़ी प्रक्रिया है। इसलिए नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में नियमों का पालन महत्वपूर्ण हो जाता है।
SIR विवाद के बीच बड़ा कानूनी सवाल
SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि किस आधार पर किसी मतदाता का नाम सूची से हटाया जा सकता है और उस प्रक्रिया में मतदाता को अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिलता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ में हुई सुनवाई ने इस बहस को एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार दिया है। अदालत ने मौजूदा मतदाता सूची की वैधता और ड्राफ्ट सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बीच अंतर को रेखांकित किया है।
विपक्ष लगातार उठा रहा है SIR का मुद्दा
देश के कई हिस्सों में SIR को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग की प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को संशोधित और अद्यतन करना है।
ऐसे में अदालतों में चल रही याचिकाओं से यह तय होना महत्वपूर्ण होगा कि SIR के दौरान नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया में किन कानूनी मानकों का पालन किया जाना चाहिए।
अब निगाह आगे की सुनवाई पर
गोवा में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR को लेकर देशभर में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज है।
सबसे अहम सवाल यही है—ड्राफ्ट सूची तैयार होने से पहले किसी मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी वैध है और उसके अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?
सालगांवकर परिवार की याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की टिप्पणियों ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अब मामले की आगे की सुनवाई में चुनाव आयोग की ओर से प्रक्रिया और नाम हटाए जाने के आधार पर दी जाने वाली दलीलों पर नजर रहेगी।



