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इतिहास की किताबों की समस्या सिर्फ तथ्य नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या नहीं पढ़ाया जा रहा

शिक्षा/विचार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 6 अक्टूबर

भारत में स्कूलों की इतिहास की किताबों में समय-समय पर होने वाले बदलाव एक बार फिर गंभीर बहस का विषय बन गए हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किताबों में कौन-से तथ्य सही हैं और कौन-से गलत, बल्कि उससे भी बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को इतिहास के नाम पर क्या पढ़ाया जा रहा है और क्या लगातार पाठ्यक्रम से बाहर किया जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन और संशोधन के दौरान ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं, जिनमें कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दौर को संक्षिप्त कर दिया गया, कुछ घटनाओं और व्यक्तियों को नए नजरिए से प्रस्तुत किया गया और कई बार ऐसे आख्यान सामने आए जो स्थापित ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाते। इससे इतिहास शिक्षा के उद्देश्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

इतिहास केवल तारीखों, युद्धों, राजाओं और शासन करने वाले लोगों की सूची नहीं है। इतिहास यह समझने का माध्यम है कि आज का समाज किन प्रक्रियाओं से होकर यहां तक पहुंचा और अलग-अलग समय में लोगों का जीवन कैसा था। मानव सभ्यता का विकास केवल राजनीतिक सत्ता के संघर्ष से नहीं हुआ। धातुओं, औजारों और हथियारों के इस्तेमाल, आग के विस्तार, कृषि और पशुपालन, पहिए, लेखन और संख्याओं, मुद्रा, व्यापार, नगरों और स्मारकीय स्थापत्य जैसी प्रक्रियाओं ने मनुष्य के जीवन को गहराई से बदला। इसी तरह ईश्वर, नैतिकता, वीरता, सामाजिक पदानुक्रम, न्याय, समानता, लोकतंत्र और शांति जैसे विचारों ने भी समाजों के निर्माण और परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन जब इतिहास को लगातार केवल धार्मिक समूहों के बीच संघर्ष के चश्मे से देखने की आदत विकसित की जाती है, तो इतिहास की जटिलता कम होकर एक सरल और टकरावपूर्ण कहानी में बदल जाती है। अतीत में विभिन्न समुदायों के बीच संघर्ष हुए, सत्ता के लिए युद्ध हुए और धार्मिक पहचान भी कई राजनीतिक संघर्षों का हिस्सा रही। लेकिन भारत का इतिहास केवल धार्मिक विरोध की कहानी नहीं है। इसमें सह-अस्तित्व, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, भाषाओं का मेल, कला और स्थापत्य का विकास, व्यापारिक संपर्क, सामाजिक सुधार, वैज्ञानिक उपलब्धियां और अलग-अलग परंपराओं के बीच संवाद की उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। किसी एक पहलू को अत्यधिक महत्व देकर बाकी को पीछे कर देना इतिहास की व्यापक तस्वीर को कमजोर करता है।

इतिहास की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसका प्रश्न पूछने वाला स्वभाव है। विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताया जाना चाहिए कि अतीत में क्या हुआ, बल्कि उसे यह भी समझने का अवसर मिलना चाहिए कि इतिहासकार किसी निष्कर्ष तक कैसे पहुंचते हैं, अलग-अलग स्रोतों में क्या अंतर होता है, किसी घटना की अलग-अलग व्याख्याएं क्यों हो सकती हैं और किसी दावे की सत्यता को किस तरह परखा जाता है। जब पाठ्यपुस्तक खुद को अंतिम और निर्विवाद सत्य के रूप में प्रस्तुत करने लगती है, तो इतिहास अध्ययन की आलोचनात्मक प्रकृति कमजोर पड़ जाती है।

पाठ्यपुस्तकों में संशोधन अपने आप में गलत नहीं है। इतिहास की किताबों को नए शोध, नए पुरातात्विक प्रमाण और बेहतर अकादमिक समझ के आधार पर लगातार अपडेट किया जाना चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब बदलाव अकादमिक शोध के बजाय किसी राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्य से प्रेरित दिखाई देने लगें। इतिहास को किसी खास विचारधारा को स्थापित करने या किसी समुदाय के प्रति गौरव अथवा विरोध पैदा करने का माध्यम बना देना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।

भारत जैसे बहुलतावादी देश में इतिहास पढ़ाने की जिम्मेदारी और भी बड़ी है। यहां अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, जातीय समूहों, संस्कृतियों और परंपराओं ने सदियों से एक-दूसरे को प्रभावित किया है। इस साझा इतिहास को केवल संघर्ष और धार्मिक पहचान के आधार पर समझना भारत की वास्तविक ऐतिहासिक जटिलता को छोटा कर देना होगा। विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि अतीत में मतभेद और संघर्ष थे, लेकिन सहयोग और सांस्कृतिक मेल भी उतना ही वास्तविक था।

आज जरूरत ऐसी इतिहास की किताबों की है जो न तो अतीत को महिमामंडित करें और न ही उसे राजनीतिक आरोप-पत्र में बदलें। बच्चों को तथ्य, स्रोत, संदर्भ और अलग-अलग दृष्टिकोणों के आधार पर इतिहास समझने की क्षमता दी जानी चाहिए। इतिहास को याद करने का विषय नहीं, समझने और सवाल पूछने का विषय बनाया जाना चाहिए। क्योंकि जिस पीढ़ी को अपने अतीत के बारे में अधूरी या एकतरफा तस्वीर दी जाएगी, उसके लिए वर्तमान को समझना और भविष्य के बारे में विवेकपूर्ण निर्णय लेना भी मुश्किल होगा।

इतिहास की किताबों में सबसे बड़ा सवाल इसलिए केवल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या लिखा गया है?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि “क्या हटाया गया, क्या छोटा किया गया और क्यों?” यही सवाल इतिहास शिक्षा को राजनीतिक आख्यान से निकालकर फिर से एक गंभीर अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।

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