राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के आरोपों के बीच घिरा चुनाव आयोग अब चुनावी तैयारियों की कवायद तेज करता नजर आ रहा है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही आयोग के वरिष्ठ अधिकारी मैदान में उतरने वाले हैं। इसे लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या आयोग चुनावी तैयारियों की आड़ में अपने ऊपर उठ रहे गंभीर सवालों से ध्यान हटाने और फेस सेविंग की कोशिश कर रहा है?
पांच राज्यों में आयोग की टीम
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के उप चुनाव आयुक्तों के नेतृत्व में वरिष्ठ अधिकारियों की टीमें इस सप्ताह से चुनावी राज्यों का दौरा शुरू करेंगी। सबसे पहले गोवा में आयोग की टीम जाएगी। इसके बाद अगले सप्ताह उत्तराखंड का दौरा प्रस्तावित है।
आने वाले हफ्तों में आयोग की टीमें पंजाब और मणिपुर भी जाएंगी। इन दौरों का उद्देश्य जमीनी स्तर पर चुनावी तैयारियों का जायजा लेना और प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा करना बताया गया है।
लेकिन असली सवाल वोटर लिस्ट का
आयोग की यह सक्रियता ऐसे समय में सामने आई है, जब SIR यानी Special Intensive Revision को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों के गंभीर सवाल जारी हैं।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। इसे लेकर ‘वोट चोरी’ और मताधिकार से वंचित किए जाने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, BJP इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव कर रही है।
यानी विवाद का केंद्र अब सिर्फ चुनाव कराने की तैयारी नहीं, बल्कि कौन वोट देगा और किसका नाम मतदाता सूची में रहेगा, यह सवाल भी बन चुका है।
चुनाव की तैयारी जरूरी, लेकिन जवाब भी जरूरी
गोवा, उत्तराखंड, पंजाब और मणिपुर जैसे राज्यों में चुनावी तैयारियों की समीक्षा आयोग की नियमित जिम्मेदारी है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इन दौरों का महत्व सामान्य प्रशासनिक कवायद से कहीं बड़ा हो गया है।
आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर मतदाता सूची पर जनता का भरोसा डगमगा रहा है, तो सिर्फ चुनावी मशीनरी की तैयारी से भरोसा कैसे लौटेगा?
चुनाव आयोग जितनी तेजी से चुनावी तैयारियों के लिए मैदान में उतर रहा है, उतनी ही मजबूती से उससे यह भी पूछा जा रहा है कि वोटर लिस्ट को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
क्योंकि चुनाव सिर्फ मतदान केंद्र, सुरक्षा व्यवस्था और अधिकारियों की तैनाती से नहीं होता। लोकतंत्र की असली बुनियाद मतदाता सूची है—और उसी पर सवाल खड़े हों तो चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।


