ओपिनियन/राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अक्टूबर 2026
देश बदल रहा है, राजधानी बदल रही है, इमारतें बदल रही हैं और सत्ता के गलियारे भी बदल रहे हैं। लेकिन इस बदलाव के बीच एक सवाल ऐसा खड़ा हो गया है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा—नई इमारतों के लिए जगह है, आधुनिक कार्यालयों के लिए जगह है, सत्ता के नए गलियारों के लिए जगह है, लेकिन 135 साल पुरानी उस लाइब्रेरी के लिए जगह क्यों नहीं है जिसमें 8.5 लाख से अधिक किताबें, दुर्लभ पुस्तकें, सरकारी रिकॉर्ड और ऐतिहासिक गजेटियर सुरक्षित हैं? और अगर तर्क यह है कि पुरानी इमारत में पानी छोटा हो, पानी लगता हो, ढांचा पुराना हो या आधुनिक जरूरतों के लायक न हो, तो भवन बदलिए, व्यवस्था सुधारिए—लेकिन क्या इसके साथ इतिहास भी बुलडोजर के नीचे चला जाएगा? आखिर “जैसी सरकार, वैसे विचार.. एंटायर पॉलिटिकल साइंस के ज्ञाता के अद्भुत कारनामे!” वाला सवाल इसलिए तो उठ रहा है कि जिस दौर में ज्ञान और विरासत की बातें सबसे ज्यादा की जा रही हैं, उसी दौर में देश के एक बड़े ज्ञान-संग्रह के भविष्य पर ही सवाल खड़ा हो गया है। शास्त्री भवन के प्रस्तावित पुनर्विकास और संभावित ध्वस्तीकरण के बीच सेंट्रल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के भविष्य को लेकर उठे सवाल अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं। 5 अक्टूबर को इस मामले पर सुनवाई होनी है।
135 साल पुरानी है, इसलिए क्या गैरजरूरी है?
यह कोई सामान्य सरकारी लाइब्रेरी नहीं है जिसे आज यहां से उठाया और कल वहां रख दिया जाए। इसकी कहानी भारत की राजधानी और प्रशासनिक इतिहास के साथ चलती है। 1911 में जब ब्रिटिश शासन ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला किया, तब यह लाइब्रेरी भी दिल्ली आई। उस समय इसे Imperial Secretariat Library के नाम से जाना जाता था। पुराने सचिवालय से शुरू हुआ सफर नॉर्थ ब्लॉक तक पहुंचा और बाद में यह शास्त्री भवन में आ गई। 1969 से यह वहीं मौजूद है। यानी इस लाइब्रेरी ने केवल इमारतें नहीं बदलीं, बल्कि भारत के प्रशासनिक इतिहास के कई दौर देखे हैं। इसमें मौजूद किताबें और दस्तावेज किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं हैं। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी शोध और संदर्भ का आधार हैं।
8.5 लाख किताबें कोई कबाड़ नहीं
करीब 5,500 वर्ग मीटर में चार मंजिलों पर फैली इस लाइब्रेरी में 8.5 लाख से अधिक किताबें और दस्तावेज बताए जाते हैं। इनमें दुर्लभ पुस्तकें, सरकारी प्रकाशन, आधिकारिक रिकॉर्ड और गजेटियर शामिल हैं। अब अगर कोई कहे कि किताबें हैं, दूसरी जगह रख दीजिए, तो सवाल यह है कि कहां और कैसे?
दुर्लभ किताबों को सामान्य गोदाम में नहीं रखा जा सकता। पुराने दस्तावेजों को नियंत्रित तापमान और नमी की जरूरत होती है। वैज्ञानिक संरक्षण, सुरक्षा, कैटलॉगिंग, डिजिटाइजेशन और शोधकर्ताओं के लिए व्यवस्थित पहुंच भी जरूरी है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि किताबों को ट्रक में भरकर दूसरी इमारत तक पहुंचाया जा सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या नई जगह पहले से तैयार है? क्या वहां पूरे संग्रह को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित करने की व्यवस्था है? और क्या उस संस्थान के भविष्य के लिए दीर्घकालिक योजना मौजूद है?
पानी लगता है तो इमारत सुधारिए, इतिहास क्यों हटाइए?
यहीं विकास की पूरी बहस थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। मान लीजिए किसी सरकारी भवन में पानी लगता है, रखरखाव की समस्या है, जगह कम है या आधुनिक सुविधाओं की कमी है। तो उसका समाधान क्या होना चाहिए? भवन की मरम्मत, पुनर्विकास, संरक्षण या बेहतर जगह पर संस्थान का स्थानांतरण। लेकिन समस्या अगर इमारत है तो समाधान भी इमारत का होना चाहिए, किताबों और इतिहास का नहीं।
पुराना भवन कमजोर हो सकता है, लेकिन उसमें मौजूद संस्थान जरूरी नहीं कि पुराना हो गया हो। पुरानी किताब अप्रासंगिक नहीं होती और पुराना दस्तावेज बेकार नहीं हो जाता। कई बार तो उसकी कीमत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि वह समय के साथ दुर्लभ होता जाता है।
नई इमारतों की चमक, पुरानी किताबों का अंधेरा?
सेंट्रल विस्टा को आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था और नए भारत की तस्वीर के रूप में देखा जाता है। आधुनिक कार्यालय बनें, बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार हो, राजधानी की जरूरतों के मुताबिक पुनर्गठन हो—इस पर बहस हो सकती है, लेकिन विकास की दिशा पर सवाल इसलिए उठता है जब उसी प्रक्रिया में ऐतिहासिक संस्थाओं का भविष्य स्पष्ट नहीं होता।
नई इमारत कुछ वर्षों में तैयार हो सकती है। लेकिन 135 साल की संस्थागत स्मृति 135 साल में ही बनती है। उसे किसी वास्तुकार के नक्शे, किसी ठेके या किसी बजट से दोबारा नहीं बनाया जा सकता।
यही फर्क विकास और विरासत के बीच है। कंक्रीट को बदला जा सकता है, इतिहास को नहीं।
सुप्रीम कोर्ट में मामला, अब जवाब जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है। मामला “In Re: 135-Yr-Old Library 8.5 Lakh Books–And No Room In The New Central Vista Plan” शीर्षक से दर्ज हुआ है और 5 अक्टूबर को सुनवाई होनी है। अदालत के सामने मूल प्रश्न यही है कि शास्त्री भवन के पुनर्विकास या संभावित ध्वस्तीकरण की स्थिति में इस विशाल पुस्तकालय के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक सरकारी भवन के इस्तेमाल का मामला नहीं है। यह उन लाखों किताबों और दस्तावेजों के भविष्य का सवाल है जिनमें देश के प्रशासनिक और बौद्धिक इतिहास की सामग्री सुरक्षित है।
‘सेंट्रल विस्टा’ में सबके लिए जगह, किताबों के लिए नहीं?
यही इस पूरे विवाद का सबसे तीखा सवाल है। जिस राजधानी में नई इमारतों के लिए विशाल योजनाएं बनाई जा सकती हैं, वहां 8.5 लाख किताबों वाली 135 साल पुरानी लाइब्रेरी के लिए स्थायी और उपयुक्त जगह क्यों नहीं निकल सकती?
अगर सेंट्रल विस्टा वास्तव में नए भारत का प्रतीक है, तो उसमें भारत की पुरानी बौद्धिक विरासत के लिए भी जगह होनी चाहिए। आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि जो पुराना है उसे हटाना ही प्रगति है।
और अगर किसी भवन में पानी लगता है, तो पानी रोकिए। अगर भवन कमजोर है, तो उसे मजबूत कीजिए। अगर जगह कम है, तो बेहतर जगह दीजिए। लेकिन किताबों को समस्या मत बनाइए।
क्योंकि असली सवाल यही है—क्या नए भारत को बनाने के लिए पुराने भारत की याददाश्त मिटानी जरूरी है?
इमारतें फिर बन सकती हैं। कार्यालय फिर बनाए जा सकते हैं। नई सड़कें फिर बन सकती हैं। लेकिन 135 साल की संस्थागत स्मृति, दुर्लभ दस्तावेज और लाखों किताबों से बना ज्ञान-संसार दोबारा पैदा नहीं किया जा सकता।इसलिए सेंट्रल विस्टा की चमक के बीच एक सवाल लगातार खड़ा रहेगा—नई इमारतों के इस नए भारत में किताबों के पुराने भारत के लिए आखिर कितनी जगह है?


