राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 2 अक्टूबर 2026
मुंबई से आंदोलन शुरू करने का फैसला
Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने आंदोलन का केंद्र दिल्ली के बजाय मुंबई को बनाया है। शुक्रवार को मुंबई के शिवाजी पार्क में CJP ने ‘जेल भरो आंदोलन’ का ऐलान किया। दीपके के मुताबिक यह आंदोलन केवल मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाया जाएगा और अंततः दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने के रूप में इसका समापन होगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक ज्ञानेश कुमार अपने पद से इस्तीफा नहीं देते।
महाराष्ट्र से उठेगा चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
अभिजीत दीपके ने मुंबई को आंदोलन की शुरुआत के लिए चुनने के पीछे महाराष्ट्र के चुनावी घटनाक्रम को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके कुछ महीनों बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजों के बीच आए बड़े बदलाव का हवाला देते हुए चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, इसी बदलाव के संदर्भ में CJP ने मुंबई से आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है।
दीपके ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में BJP ने 48 में से 9 सीटें जीती थीं, जबकि छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में BJP राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई और 132 सीटें हासिल कीं। उनके अनुसार, इसी चुनावी बदलाव को लेकर सवाल उठते हैं और इन्हीं सवालों को लेकर CJP महाराष्ट्र से अपनी मुहिम शुरू कर रही है।
लोकसभा से विधानसभा तक बदले चुनावी आंकड़े
2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 सीटों में BJP ने 9 सीटें जीती थीं। उसके सहयोगी दलों शिवसेना ने 7 और NCP ने 1 सीट जीती थी। दूसरी ओर कांग्रेस ने 13, शिवसेना (UBT) ने 9 और NCP (SP) ने 8 सीटें हासिल की थीं। एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार के खाते में गई थी।
इसके लगभग छह महीने बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में तस्वीर काफी अलग रही। BJP ने 132 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में प्रदर्शन किया। उसके सहयोगी शिवसेना ने 57 और NCP ने 41 सीटें जीतीं। इस तरह महायुति गठबंधन ने 288 सदस्यीय विधानसभा में कुल 230 सीटें हासिल कीं। विपक्षी MVA में कांग्रेस को 16, शिवसेना (UBT) को 20 और NCP (SP) को 10 सीटें मिलीं।
इन्हीं आंकड़ों को सामने रखते हुए CJP चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को लेकर सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांग रही है। हालांकि चुनावी नतीजों में अंतर अपने आप में किसी चुनावी अनियमितता का प्रमाण नहीं है; CJP के आरोप और उनके आधार अलग-अलग जांच और कानूनी प्रक्रिया का विषय हैं।
राहुल गांधी भी उठा चुके हैं ‘वोट चोरी’ का मुद्दा
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कथित ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाया था। उन्होंने महाराष्ट्र के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों का हवाला देते हुए चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए थे।
CJP अब इसी व्यापक राजनीतिक विवाद को अपने आंदोलन से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची, SIR और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब मिलना चाहिए।
2 अक्टूबर को ही क्यों चुना गया?
CJP ने आंदोलन के लिए गांधी जयंती का दिन चुना है। अभिजीत दीपके ने इसकी तुलना महात्मा गांधी के ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों से की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या गांधी को ब्रिटिश सरकार से आंदोलन की अनुमति लेकर सत्याग्रह करना पड़ा था।
दीपके ने मुंबई के ऐतिहासिक राजनीतिक महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मुंबई का महात्मा गांधी के आंदोलन से गहरा संबंध रहा है। 9 अगस्त 1942 को तत्कालीन बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान, जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान कहा जाता है, से भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक आह्वान हुआ था।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ को आधार बनाकर CJP ने 2 अक्टूबर को मुंबई में आंदोलन करने का निर्णय लिया।
पुलिस ने नहीं दी अनुमति
हालांकि मुंबई पुलिस ने शिवाजी पार्क में प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने मैदान के इस्तेमाल से जुड़े प्रतिबंधों, आवश्यक नागरिक अनुमति के अभाव तथा शोर और यातायात संबंधी चिंताओं का हवाला दिया।
इसके बावजूद CJP ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि यह प्रदर्शन आगे देश के दूसरे शहरों तक भी ले जाया जाएगा।
गोवा से कोलकाता और बेंगलुरु तक आंदोलन
अभिजीत दीपके के अनुसार CJP का आंदोलन मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा। संगठन ने आगे गोवा, कोलकाता, बेंगलुरु और रांची जैसे शहरों में भी विरोध प्रदर्शन करने की योजना बताई है। इसके बाद आंदोलन को दिल्ली लाकर जंतर-मंतर पर धरना देने की बात कही गई है।
CJP का दावा है कि यह अभियान तब तक चलेगा जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते।
फडणवीस के बयान पर दीपके का पलटवार
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि यदि प्रदर्शन अनुमति के बिना आगे बढ़ता है तो प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर तीन दिन जेल में रखा जा सकता है, जिसके बाद उन्हें जमानत मिलेगी।
फडणवीस के इस बयान पर अभिजीत दीपके ने जवाब देते हुए कहा—“मी पुन्हा येईन”, यानी “मैं फिर आऊंगा।” यह वही चर्चित राजनीतिक वाक्य है जिसका इस्तेमाल फडणवीस ने 2019 के विधानसभा चुनावों से पहले किया था।
दीपके का यह जवाब अब CJP के आंदोलन का राजनीतिक संदेश भी बन गया है—प्रशासन द्वारा कार्रवाई किए जाने के बावजूद आंदोलन को आगे बढ़ाने का दावा।
दिल्ली की जगह मुंबई क्यों?
CJP के आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि संगठन ने इस बार सीधे दिल्ली से शुरुआत नहीं की। अभिजीत दीपके का तर्क है कि महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के नतीजों में आया बड़ा बदलाव चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने का आधार देता है।
उनके मुताबिक, यदि चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो आंदोलन की शुरुआत उसी राज्य से होनी चाहिए जहां इन सवालों को लेकर राजनीतिक बहस सबसे अधिक तीखी हुई है। इसी कारण मुंबई को चुना गया।
सवाल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर
CJP का आंदोलन ऐसे समय हो रहा है जब चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और SIR को लेकर राजनीतिक विवाद पहले से जारी है। विपक्षी दल चुनाव आयोग से अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, जबकि BJP और चुनाव आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते।
BJP का कहना है कि निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है और किसी राजनीतिक प्रभाव में काम नहीं करता। इसलिए इस पूरे विवाद में आरोपों, राजनीतिक दावों और प्रमाणित तथ्यों को अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण है।
आंदोलन अब राष्ट्रीय रूप लेने की तैयारी में
मुंबई से शुरू होने वाला CJP का यह अभियान आने वाले दिनों में कई राज्यों और शहरों तक पहुंचाने की घोषणा की गई है। अभिजीत दीपके ने साफ किया है कि मुंबई के बाद आंदोलन गोवा, कोलकाता, बेंगलुरु और रांची तक जाएगा और अंततः दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया जाएगा।
गांधी जयंती पर शुरू हुआ यह आंदोलन अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR, मतदाता सूची और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों को लेकर जारी राजनीतिक बहस का एक नया अध्याय बन गया है। CJP का कहना है कि उसकी लड़ाई ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक जारी रहेगी। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और सरकार के पक्ष को भी इस पूरे विवाद में निर्णायक रूप से सामने रखना आवश्यक होगा, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया पर उठे सवालों का अंतिम जवाब राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, प्रक्रियाओं और संवैधानिक संस्थाओं की जांच से तय होगा।



