[the_ad id="179"]
Home » National » ECI में TCS की एंट्री, मोदी के खास गुजरात कैडर IAS अजय भादू की भूमिका और उठते सवाल: वोटर डेटा के सिस्टम पर अब जवाबदेही की बारी

ECI में TCS की एंट्री, मोदी के खास गुजरात कैडर IAS अजय भादू की भूमिका और उठते सवाल: वोटर डेटा के सिस्टम पर अब जवाबदेही की बारी

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

भारत की चुनावी व्यवस्था में अब सवाल केवल मतदाता सूची में नाम जुड़ने या कटने तक सीमित नहीं है। असली सवाल उस डिजिटल सिस्टम का भी है, जिसके जरिए करोड़ों भारतीय मतदाताओं का रिकॉर्ड तैयार, अपडेट और प्रबंधित किया जाता है। इसी कड़ी में गुजरात कैडर के IAS अधिकारी अजय भादू, निर्वाचन आयोग में उनकी प्रतिनियुक्ति और उसी दौर में TCS द्वारा ERO Net 2.0 विकसित किए जाने की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ रही है। भादू 3 अक्टूबर 2022 से निर्वाचन आयोग में Deputy Election Commissioner रहे और इससे पहले गुजरात सरकार में मुख्यमंत्री कार्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके थे। यही पृष्ठभूमि अब इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती है।

अजय भादू की निर्वाचन आयोग में नियुक्ति कोई गुप्त प्रक्रिया नहीं थी। केंद्र सरकार के आदेश के तहत उन्हें Deputy Election Commissioner बनाया गया था। लेकिन सवाल नियुक्ति के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उस दौर में लिए गए फैसलों की पारदर्शिता और जवाबदेही का है। जब कोई अधिकारी संवैधानिक संस्था में महत्वपूर्ण पद पर हो और उसी अवधि में उस संस्था के करोड़ों मतदाताओं से जुड़े डिजिटल सिस्टम में बड़ा तकनीकी बदलाव हो, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि निर्णय किस स्तर पर लिए गए, किसने मंजूरी दी और पूरी प्रक्रिया किस नियम के तहत आगे बढ़ी।

सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है ERO Net 2.0। TCS की अपनी कॉरपोरेट रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने Election Commission के साथ मिलकर electoral-roll management के लिए ERO Net 2.0 नाम का web-based application विकसित किया। यानी मामला किसी सामान्य सरकारी वेबसाइट के निर्माण का नहीं था। यह उस डिजिटल ढांचे से जुड़ा था जिसके जरिए मतदाता पंजीकरण और electoral-roll management जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को तकनीकी रूप दिया गया।

यहीं से सवाल और तीखे हो जाते हैं—TCS को यह काम आखिर किस प्रक्रिया से मिला? क्या खुला tender हुआ? कौन-कौन कंपनियां प्रक्रिया में शामिल थीं? चयन के मानदंड क्या थे? Scope of Work किसने तैयार किया? Data architecture किसने तय किया? Software में बदलावों की मंजूरी किस स्तर पर हुई? और सबसे बड़ा सवाल—इस पूरे सिस्टम की स्वतंत्र निगरानी और audit किसने किया?

अगर पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत हुई है तो उसे सार्वजनिक करने में समस्या नहीं होनी चाहिए। बल्कि दस्तावेज सामने आने से विवाद समाप्त होगा। लेकिन यदि चुनावी डेटा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण डिजिटल infrastructure के निर्माण की प्रक्रिया अस्पष्ट रहती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

2024 की सरकारी डायरी में भी निर्वाचन आयोग के अधिकारियों की सूची में Ajay Bhadoo को Deputy Election Commissioner और H.R. Srinivasa को Special Officer (IT) के रूप में दर्ज किया गया था। इसका मतलब यह नहीं कि किसी अधिकारी ने कोई गलत काम किया। लेकिन यह जरूर बताता है कि उस दौर में चुनाव आयोग के भीतर IT और electoral-roll infrastructure से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकारी कौन थे। इसलिए अब सवाल केवल राजनीतिक बयान का नहीं, बल्कि decision trail का है।

ERO Net 2.0 की कल्पना किसने की? तकनीकी बदलाव का प्रस्ताव किसने रखा? TCS के साथ काम करने का निर्णय किसने लिया? किस अधिकारी ने उसे approve किया? किस committee ने इसकी समीक्षा की? और क्या software तथा electoral database का स्वतंत्र security audit कराया गया?

यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब राजनीतिक भाषणों से नहीं, सरकारी फाइलों और आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।

क्योंकि निर्वाचन आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित संवैधानिक संस्था है। मतदाता सूची उसके सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों में शामिल है। ऐसे में करोड़ों नागरिकों से जुड़े electoral data के digital infrastructure में data security, privacy, auditability, accountability और institutional control केवल तकनीकी मुद्दे नहीं हैं। ये सीधे लोकतांत्रिक भरोसे से जुड़े मुद्दे हैं।

यहां एक और सावधानी जरूरी है। TCS का निर्वाचन आयोग के साथ काम करना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। इसी तरह अजय भादू का गुजरात कैडर का अधिकारी होना और गुजरात मुख्यमंत्री कार्यालय में पहले काम करना भी अपने आप किसी राजनीतिक प्रभाव या गलत निर्णय का प्रमाण नहीं है। इन दोनों तथ्यों को जोड़कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया की जांच जरूरी है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सवाल पूछना बंद कर दिया जाए।

बल्कि सवाल और स्पष्ट होना चाहिए—अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ, तो पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?

चुनावी व्यवस्था में जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके मतदाता डेटा से जुड़ा software किसने बनाया, किस प्रक्रिया से vendor चुना गया, किसने उसकी तकनीकी जांच की, कौन उसका administrator है और अंतिम नियंत्रण किस संवैधानिक संस्था के पास है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2026 में SIR, Form-6 और electoral-roll management को लेकर डिजिटल प्रक्रियाओं पर राजनीतिक विवाद तेज हुआ है। ERO Net 2.0 और आगे के ECINET ecosystem में TCS की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। ऐसे माहौल में चुनाव आयोग के लिए सबसे प्रभावी जवाब राजनीतिक सफाई नहीं, बल्कि पूरी तकनीकी और प्रशासनिक पारदर्शिता होगी।

इसलिए बहस को सिर्फ इस सवाल तक सीमित करना कि “TCS को किसने बुलाया?” पर्याप्त नहीं है। असली सवालों की पूरी सूची सामने रखनी होगी—

TCS का चयन किस प्रक्रिया से हुआ?
आधिकारिक work order कब जारी हुआ?
Tender या procurement mechanism क्या था?
ERO Net 2.0 का पूरा Scope of Work क्या था?
किस अधिकारी और किस समिति ने इसे मंजूरी दी?
मतदाता डेटा का ownership और control किसके पास रहा?
Software का independent security audit किसने किया?
और क्या पूरी decision trail आज सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध है?

अगर इन सभी सवालों के जवाब दस्तावेजों के साथ सामने आते हैं और प्रक्रिया नियमसम्मत पाई जाती है, तो आरोपों की गुंजाइश स्वतः कम हो जाएगी। लेकिन यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया, oversight या transparency में कमी सामने आती है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

और यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।

चुनाव आयोग में किसी अधिकारी की राजनीतिक पसंद या किसी कंपनी की प्रतिष्ठा से ज्यादा महत्वपूर्ण है—मतदाता का डेटा और उस पर जनता का भरोसा। चुनावी लोकतंत्र में software भी उतना ही जवाबदेह होना चाहिए जितनी वह संस्था जो चुनाव कराती है।

आज सवाल किसी एक अधिकारी या किसी एक कंपनी को दोषी ठहराने का नहीं है। सवाल यह है कि भारत के करोड़ों मतदाताओं से जुड़े डिजिटल सिस्टम के पीछे निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

क्योंकि वोट सिर्फ EVM का बटन नहीं है। उसके पीछे मतदाता सूची है, उसके पीछे डेटा है, उस डेटा के पीछे software है और उस software के पीछे निर्णय लेने वाली संस्थाएं हैं।

इस पूरी श्रृंखला में जहां भी पर्दा है, वहां सवाल उठेंगे। और जहां सवाल करोड़ों मतदाताओं के डेटा से जुड़े हों, वहां जवाबदेही से बचने की गुंजाइश और भी कम हो जाती है।

ERO Net 2.0 का पूरा procurement trail सार्वजनिक कीजिए। निर्णय लेने वालों की भूमिका स्पष्ट कीजिए। Audit record सामने रखिए। तभी पता चलेगा कि चुनावी डिजिटल सिस्टम वास्तव में कितना पारदर्शी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *