राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले “प्रधान सेवक” और “गरीबों का मसीहा” जैसे नारों पर सवाल उठाए हैं। खेड़ा ने कहा कि ऐसे दावे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते और उन्होंने इन्हें “खोखला पेड PR” करार दिया।
खेड़ा ने उत्तर प्रदेश के भदोही में सामने आई एक घटना का हवाला देते हुए कहा कि देश में आज भी ऐसी स्थिति मौजूद है, जहां एक दलित महिला को अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाता और उसे सड़क किनारे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उनके मुताबिक, यह घटना उन बड़े दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें गरीबों के कल्याण, सामाजिक न्याय और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की बात की जाती है।
नारे बड़े-बड़े, लेकिन गरीब की हकीकत क्या है?
पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि अगर गरीबों के लिए सरकार की योजनाएं और दावे वास्तव में जमीन पर प्रभावी हैं, तो फिर किसी जरूरतमंद महिला को इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचने और वहां उपचार पाने में ऐसी मुश्किल क्यों झेलनी पड़ती है। उनका कहना है कि गरीबों के लिए सरकार की किसी भी नीति की असली परीक्षा विज्ञापनों और नारों में नहीं, बल्कि उस समय होती है जब कोई गरीब परिवार अस्पताल, स्कूल, रोजगार या दूसरी बुनियादी सुविधा के लिए सरकारी व्यवस्था के सामने खड़ा होता है।
उन्होंने कहा कि देश में गरीबों और वंचित तबकों की वास्तविक स्थिति को केवल सरकारी प्रचार के जरिए नहीं समझा जा सकता। उनके मुताबिक, जमीन पर मौजूद घटनाएं यह देखने का आधार बनती हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक कितना पहुंच रहा है।
भदोही की घटना को लेकर सरकार पर सवाल
भदोही की घटना का जिक्र करते हुए खेड़ा ने इसे केवल एक महिला की परेशानी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़ा गंभीर सवाल बताया। उनका कहना है कि किसी महिला का अस्पताल के बजाय सड़क किनारे बच्चे को जन्म देना स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पहुंच पर सवाल खड़ा करता है।
हालांकि, इस घटना से जुड़े सभी तथ्य और परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि अलग से आवश्यक है। खेड़ा ने इसे सरकार के गरीब कल्याण संबंधी दावों के संदर्भ में उठाया है।
मोदी की 2024 की जीत पर भी टिप्पणी
खेड़ा ने भदोही का राजनीतिक संदर्भ देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2024 की चुनावी जीत पर भी टिप्पणी की और इसे लेकर “जबरदस्ती जीत” का आरोप लगाया। यह कांग्रेस नेता का राजनीतिक आरोप है। किसी चुनावी जीत को लेकर तथ्यात्मक स्थिति जानने के लिए आधिकारिक चुनाव परिणाम और निर्वाचन आयोग के आंकड़े आधार होते हैं।
गरीबों के लिए योजनाओं से ज्यादा जरूरी उनका जमीन पर असर
पवन खेड़ा के बयान का मूल सवाल यही है कि सरकार गरीबों के लिए कितने बड़े दावे करती है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि गरीब व्यक्ति को संकट के समय वास्तविक मदद कितनी मिलती है। अस्पताल में इलाज, बच्चों के लिए शिक्षा, महिलाओं के लिए सुरक्षित प्रसव और कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की जमीनी तस्वीर सामने लाती हैं।
खेड़ा ने इसी आधार पर सरकार के “प्रधान सेवक” और “गरीबों का मसीहा” जैसे दावों को निशाने पर लिया है। उनका आरोप है कि नारों और प्रचार की तस्वीर अलग हो सकती है, लेकिन गरीब की रोजमर्रा की जिंदगी में मौजूद समस्याएं सरकार के दावों की वास्तविक परीक्षा लेती हैं।



