राष्ट्रीय/पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अक्टूबर 2026
दिल्ली में सर्दियां आने से पहले प्रदूषण का खतरा फिर बढ़ने लगा है और सरकार ने इससे निपटने के लिए पार्किंग शुल्क दोगुना करने का फैसला किया है। प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर अधिकृत पार्किंग में गाड़ी खड़ी करना महंगा होगा। सरकार की दलील है कि महंगी पार्किंग से निजी वाहनों का इस्तेमाल घटेगा और लोग बस, मेट्रो तथा सार्वजनिक परिवहन की ओर जाएंगे। लेकिन दिल्ली की हवा में हर साल घुलते जहरीले धुएं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पार्किंग महंगी होने से सचमुच दिल्ली की हवा साफ होगी या यह सिर्फ एक और मौसमी उपाय बनकर रह जाएगा?
इस सवाल की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि दिल्ली की जहरीली हवा का सबसे बड़ा खामियाजा बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी परेशानी झेल रहे लोगों को उठाना पड़ता है। प्रदूषण बढ़ने के साथ स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर रोज सड़क पर काम करने वाले लोगों तक की जिंदगी प्रभावित होती है। ऐसे में सवाल सिर्फ पार्किंग फीस का नहीं, बल्कि दिल्ली की सांसों का है। क्या इस बार सरकार की कार्रवाई इतनी प्रभावी होगी कि सर्दियों में बच्चों और बुजुर्गों को राहत मिल सके?
दिल्ली में प्रदूषण के मौसम में पार्किंग शुल्क बढ़ाने का प्रयोग नया नहीं है। वर्ष 2017 में GRAP के तहत MCD क्षेत्रों में पार्किंग शुल्क चार गुना तक बढ़ाया गया था। लेकिन उस समय अधिकृत पार्किंग महंगी होने के बाद कई वाहन सड़कों पर खड़े किए जाने लगे। इससे कई इलाकों में ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था की स्थिति बनी और बाद में बढ़ी हुई पार्किंग दरों का फैसला वापस लेना पड़ा। यही पुराना अनुभव अब सरकार के मौजूदा फैसले के सामने बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।
अगर पार्किंग महंगी होगी तो क्या लोग कार घर छोड़ देंगे? या फिर पार्किंग का पैसा बचाने के लिए सड़कों और गलियों में गाड़ियां खड़ी करेंगे? अगर अवैध पार्किंग पर सख्ती नहीं हुई और सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त सुविधाजनक नहीं हुआ, तो सिर्फ पार्किंग शुल्क बढ़ाने का प्रदूषण पर कितना असर पड़ेगा, यह बड़ा सवाल है। दिल्ली को ऐसी नीति की जरूरत है जिसमें नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें बेहतर और आसान विकल्प भी उपलब्ध हों।
Hindustan Times की रिपोर्ट में भी पिछले अनुभव का हवाला देते हुए बताया गया है कि NDMC में पार्किंग शुल्क बढ़ाने से पार्किंग स्थलों के इस्तेमाल में केवल मामूली कमी देखी गई। विशेषज्ञों ने भी कहा है कि दिल्ली में अवैध पार्किंग पर सख्त कार्रवाई, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और पूरे शहर के लिए एक समान ट्रैफिक नीति जरूरी है। यानी सिर्फ पार्किंग की कीमत बढ़ाना काफी नहीं है; लोगों को निजी वाहन छोड़ने का व्यावहारिक विकल्प भी देना होगा।
दिल्ली सरकार की सर्दियों की प्रदूषण रणनीति में पार्किंग शुल्क के अलावा कई दूसरे कदम भी शामिल हैं। 1 अक्टूबर से वैध PUC के बिना वाहनों को पेट्रोल-डीजल नहीं देने की व्यवस्था लागू करने की तैयारी है। 1 नवंबर से दिल्ली के बाहर पंजीकृत BS-VI से नीचे के पेट्रोल-डीजल वाहनों के प्रवेश पर रोक का प्रावधान है। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त इलेक्ट्रिक बसें चलाने और बस-मेट्रो के इस्तेमाल को बढ़ाने की योजना भी बनाई गई है।
इसके अलावा दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम, निर्माण गतिविधियों पर मौसमी प्रतिबंध और धूल नियंत्रण जैसे उपाय भी योजना का हिस्सा हैं। सरकार का दावा है कि प्रदूषण के खिलाफ बहुस्तरीय कार्रवाई की जा रही है। लेकिन दिल्ली के लोगों का अनुभव यह रहा है कि हर साल सर्दियों में कई योजनाएं सामने आती हैं और असली सवाल उनके प्रभावी क्रियान्वयन का रहता है।
क्योंकि दिल्ली का प्रदूषण केवल निजी वाहनों की वजह से नहीं है। सड़क की धूल, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक उत्सर्जन और दूसरे स्रोत भी प्रदूषण की समस्या में योगदान करते हैं। इसलिए पार्किंग शुल्क बढ़ाना रणनीति का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे अकेले समाधान नहीं माना जा सकता।
अब असली परीक्षा जमीन पर होगी। क्या पार्किंग महंगी होने के बाद निजी वाहनों की संख्या घटेगी? क्या सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल बढ़ेगा? क्या अवैध पार्किंग पर कार्रवाई होगी? और सबसे अहम—क्या इस बार दिल्ली की हवा में इतना सुधार होगा कि बच्चों और बुजुर्गों को राहत की सांस मिल सके?
वरना सवाल दिल्लीवालों के सामने फिर वही रहेगा—जेब पर बोझ बढ़ा, लेकिन सांसों का बोझ कितना घटा?



