राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | पणजी | 1 अक्टूबर 2026
गोवा में SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने जिस तरह के सवाल उठाए हैं, उसने पूरी प्रक्रिया की कानूनी और तकनीकी जवाबदेही को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छह मतदाताओं के नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए जाने के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस वाल्मीकि मेनेजस और जस्टिस अमित जामशेदकर की पीठ ने चुनाव आयोग से साफ पूछा कि आखिर कानून चलेगा या सॉफ्टवेयर? अदालत ने कहा कि SIR के लिए अपनाई गई प्रक्रिया ने प्रभावी तौर पर कानून और नियमों को किनारे कर दिया और अब व्यवस्था सॉफ्टवेयर के निर्देशों के हिसाब से चलती दिखाई दे रही है।
मामला सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र के एक परिवार के छह सदस्यों से जुड़ा है। इन लोगों ने अपने पते में बदलाव के लिए Form-8 दाखिल किया था, लेकिन SIR के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। चुनाव आयोग की ओर से अदालत में कहा गया कि SIR की अवधि में सिस्टम Form-8 को प्रोसेस करने की अनुमति नहीं दे रहा था। यहीं से अदालत का गुस्सा सामने आया। अगर कानून मतदाता को Form-8 के जरिए अपना पता बदलने की सुविधा देता है, तो केवल कंप्यूटर सिस्टम की तकनीकी व्यवस्था के कारण उस अधिकार को रोका कैसे जा सकता है? क्या चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर अब कानून से ऊपर हो गया है?
हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की दलील को स्वीकार करने के बजाय उसकी बुनियाद पर ही सवाल खड़ा कर दिया। पीठ ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने की योजना है तो उसे पहले सुनवाई का अवसर देना होगा। अदालत ने सीधे पूछा कि कानून में ऐसा कौन-सा प्रावधान है जो चुनाव आयोग को किसी मतदाता को सुने बिना उसका नाम हटाने की अनुमति देता है। यह सवाल इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना महज एक प्रशासनिक एंट्री नहीं है; यह व्यक्ति के चुनावी अधिकार से जुड़ा हुआ है।
अदालत ने चुनाव आयोग की तकनीकी व्यवस्था पर सबसे तीखा सवाल ERO यानी Electoral Registration Officer की भूमिका को लेकर उठाया। पीठ ने कहा कि कानून हर समय लागू होना चाहिए और ERO के पास सॉफ्टवेयर की ‘चाबी’ होनी चाहिए। यानी अधिकृत अधिकारी अपने वैध आदेश के मुताबिक किसी प्रविष्टि को खोल सके, दर्ज कर सके या हटाने की कार्रवाई कर सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नियंत्रण किसी तीसरे व्यक्ति के पास नहीं हो सकता। अगर ERO ही सॉफ्टवेयर के आदेशों के सामने बेबस है, तो फिर चुनावी प्रक्रिया की वास्तविक कमान किसके हाथ में है—यह सवाल अपने आप खड़ा होता है।
सबसे विस्फोटक टिप्पणी तब सामने आई जब अदालत ने कहा कि SIR की मौजूदा व्यवस्था का प्रभाव ऐसा दिखाई देता है जैसे कानून और नियमों को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया हो और एक बिल्कुल अलग प्रक्रिया शुरू कर दी गई हो। पीठ ने अपनी नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि अगर कानून कुछ कहता है और सॉफ्टवेयर कुछ और करता है, तो चुनाव आयोग किसका पालन कर रहा है। अदालत ने यह भी कहा कि उसके सामने छह मतदाता आए हैं और सवाल यह है कि कितने ऐसे मतदाता होंगे जो अदालत तक पहुंच ही नहीं पाए?
यह सवाल चुनाव आयोग की पूरी व्यवस्था के लिए असहज करने वाला है। क्योंकि यदि छह लोगों के मामले में तकनीकी प्रक्रिया और वैधानिक अधिकार के बीच टकराव सामने आ सकता है, तो व्यापक SIR प्रक्रिया में ऐसी कितनी परिस्थितियां पैदा हुई होंगी—यह जांच का विषय बन सकता है। अदालत ने इसी चिंता की ओर इशारा किया है। यानी मामला केवल छह नामों का नहीं, बल्कि उस सिस्टम की जवाबदेही का है जिसके जरिए लाखों मतदाताओं की जानकारी और मतदाता सूची में बदलाव किया जा रहा है।
चुनाव आयोग की ओर से यह दलील दी गई कि SIR के दौरान Form-8 को प्रोसेस नहीं किया जा सकता था और कुछ मतदाताओं के नाम बाद में Form-6 भरने के बाद शामिल किए गए। लेकिन अदालत ने इस पर भी कड़ा सवाल किया। पीठ ने कहा कि जब सिस्टम ने Form-8 स्वीकार ही नहीं किया तो मतदाताओं को Form-6 भरने के लिए कहना समस्या का समाधान नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR अपने आप में ऐसी प्रक्रिया नहीं हो सकती जो कानून में मौजूद Form-6, Form-7 और Form-8 की व्यवस्था को खत्म कर दे।
यानी हाईकोर्ट का संदेश बेहद सीधा है—सॉफ्टवेयर चुनावी कानून नहीं लिख सकता। कंप्यूटर स्क्रीन पर कोई विकल्प मौजूद है या नहीं, इससे यह तय नहीं हो सकता कि नागरिक का कानूनी अधिकार मौजूद है या नहीं। अगर सॉफ्टवेयर कानून के मुताबिक काम नहीं कर रहा है तो सॉफ्टवेयर को बदला जाना चाहिए, न कि कानून को। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी व्यवस्था कानून के अधीन काम करे और किसी पात्र मतदाता को सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया के कारण मतदाता सूची से बाहर न किया जाए।
इस मामले ने चुनाव आयोग के सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर सॉफ्टवेयर की कमान किसके हाथ में है? अगर ERO किसी वैधानिक आदेश के बावजूद सिस्टम में जरूरी बदलाव नहीं कर सकता, तो फिर निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति कहां है? अदालत ने इसी वजह से कहा कि सॉफ्टवेयर की आवश्यक ‘की’ अधिकृत चुनाव अधिकारी के पास होनी चाहिए। यह केवल तकनीकी सवाल नहीं है; यह सीधे प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है।
और यहीं SIR पर चल रही पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पहलू सामने आता है। मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम जोड़ना, हटाना या स्थानांतरित करना कोई सामान्य डिजिटल अपडेट नहीं है। इसके पीछे कानून, नियम, नोटिस, सुनवाई और अधिकृत अधिकारी की प्रक्रिया होती है। यदि तकनीकी सिस्टम इन प्रक्रियाओं को रोक देता है, तो जिम्मेदारी सिस्टम की नहीं बल्कि उस व्यवस्था की होगी जिसने सिस्टम को कानून के अनुरूप काम करने योग्य बनाया या नहीं बनाया।
हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को इसी बुनियादी सवाल के सामने खड़ा कर दिया है। अदालत ने न तो अभी SIR को अंतिम रूप से अवैध घोषित किया है और न ही पूरे चुनावी तंत्र पर कोई अंतिम फैसला दिया है। लेकिन उसकी टिप्पणियां चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर न्यायिक चिंता जरूर दर्ज करती हैं। अगली सुनवाई में आयोग को अपनी प्रक्रिया और तकनीकी व्यवस्था को और स्पष्ट करना होगा।
सबसे बड़ा सवाल अब यही है—मतदाता का नाम हटाने का फैसला कानून करेगा या सॉफ्टवेयर?
गोवा हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगकर चुनावी तकनीक की उस दीवार पर दस्तक दी है जिसके पीछे आम मतदाता के लिए जवाबदेही का सवाल अक्सर धुंधला हो जाता है। सॉफ्टवेयर कोई संवैधानिक प्राधिकारी नहीं है। वह केवल आदेशों और नियमों के मुताबिक काम करने वाला माध्यम है। अगर सिस्टम कानून के रास्ते में खड़ा हो रहा है, तो सवाल सिस्टम से ज्यादा उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो उस सिस्टम को संचालित, नियंत्रित और अधिकृत करते हैं।
और यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक है—चुनाव तकनीक से हो सकता है, लेकिन चुनावी अधिकार तकनीक के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते।



