राष्ट्रीय/पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 सितंबर 2026
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर केंद्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट का रुख करने पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने केंद्र के इस कदम को “हैरान करने वाला यू-टर्न” बताया और आरोप लगाया कि सरकार ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों के बावजूद आगे बढ़ रही है। रमेश ने कहा कि इस परियोजना के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित याचिकाएं फिलहाल इस पूरे विवाद में न्यायिक जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
जयराम रमेश ने बुधवार को एक मीडिया रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए केंद्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने पर सवाल उठाए। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र ने कलकत्ता हाईकोर्ट में ग्रेट निकोबार परियोजना के खिलाफ लंबित याचिकाओं की सुनवाई पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि परियोजना के लिए वन अधिकार कानून यानी Forest Rights Act (FRA), 2006 के तहत आदिवासी सहमति हासिल करने की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।
ग्रेट निकोबार परियोजना एक बड़े बुनियादी ढांचा विकास कार्यक्रम के रूप में प्रस्तावित है। इसमें ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एकीकृत टाउनशिप, नागरिक-सैन्य उपयोग वाला हवाई अड्डा तथा ऊर्जा संयंत्र जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं। परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की ओर से इसके रणनीतिक और आर्थिक महत्व पर जोर दिया गया है। वहीं, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संगठनों तथा याचिकाकर्ताओं ने परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर अदालत का रुख किया है।
मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने पहले इन याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना था। मई 2026 में अदालत ने केंद्र और अंडमान-निकोबार प्रशासन की ओर से याचिकाओं की सुनवाई पर उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज करते हुए मामलों पर सुनवाई की अनुमति दी थी। अदालत ने कहा था कि बड़े खर्च और राष्ट्रीय महत्व वाली परियोजना भी संबंधित कानूनों के तहत आगे बढ़नी चाहिए और उचित न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।
याचिकाओं में खास तौर पर वन अधिकार कानून के तहत अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें 2022 में हुई कुछ ग्राम सभाओं की कार्यवाही, वन अधिकारों के निपटारे से संबंधित प्रक्रिया और परियोजना के लिए वन भूमि के इस्तेमाल को लेकर दी गई सहमति को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि जिन प्रक्रियाओं के आधार पर वन भूमि के डायवर्जन की अनुमति आगे बढ़ी, उनमें कानून के जरूरी प्रावधानों का पालन नहीं हुआ।
ग्रेट निकोबार परियोजना का पर्यावरणीय पक्ष भी पहले न्यायिक जांच के दायरे में आ चुका है। फरवरी 2026 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT ने परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। अधिकरण ने पर्यावरणीय मंजूरी में पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने की बात दर्ज की थी और परियोजना के रणनीतिक महत्व का भी उल्लेख किया था। हालांकि उसने सरकार को पर्यावरणीय मंजूरी में निर्धारित शर्तों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
कांग्रेस की ओर से उठाया गया मुख्य सवाल अब केंद्र के सुप्रीम कोर्ट जाने को लेकर है। जयराम रमेश ने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित पांच अलग-अलग याचिकाएं इस मामले में “उम्मीद की एक किरण” हैं। उनके अनुसार, नागरिकों और सिविल सोसायटी समूहों की ओर से दायर इन याचिकाओं में परियोजना से जुड़े कानूनी और पर्यावरणीय सवालों की न्यायिक जांच की मांग की गई है।
दूसरी ओर, ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर सरकार का पक्ष यह रहा है कि यह रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजना है और इसके पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़े मुद्दों पर निर्धारित प्रक्रियाओं और सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखा गया है। NGT के फरवरी के आदेश में भी परियोजना के रणनीतिक महत्व और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता का उल्लेख किया गया था।
अब केंद्र की सुप्रीम कोर्ट याचिका पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। खासतौर पर यह देखा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं की सुनवाई पर रोक लगाने की केंद्र की मांग पर क्या रुख अपनाता है। इस बीच, ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण, वन अधिकार कानून और आदिवासी समुदायों की सहमति से जुड़े सवाल न्यायिक बहस के केंद्र में बने हुए हैं।



