राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। एक खुले पत्र में सिंह ने आरोप लगाया कि SIR की प्रक्रिया में चुनावी कानूनों का उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने लिखा कि देश को लोकतंत्र बनाए रखना है तो यह समझना जरूरी है कि ज्ञानेश कुमार और उनके “बॉस” क्या कर रहे हैं। सिंह ने विपक्षी दलों से एकजुट होने और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के इस्तीफे तक चुनावों का बहिष्कार करने की अपील भी की है।
सिंह ने अपने पत्र में मुख्य रूप से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 और 22 का हवाला दिया है। उनका दावा है कि देशव्यापी SIR को जिस तरीके से लागू किया गया, वह कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। सिंह के अनुसार, धारा 21 विशेष परिस्थितियों में, लिखित कारण दर्ज करने के बाद किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके हिस्से में विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है। उन्होंने सवाल उठाया कि पूरे देश में SIR कराने का निर्णय पूरी चुनाव आयोग ने लिया या मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिया गया।
मतदाता सूची से नाम हटाने पर गंभीर सवाल
आर.के. सिंह ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने धारा 22 का हवाला देते हुए कहा कि किसी मतदाता का नाम हटाने का अधिकार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी ERO के पास है और इसके लिए जांच तथा संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। सिंह का आरोप है कि कई मामलों में मतदाताओं के नाम बिना पर्याप्त जांच और नोटिस के प्रभावित हुए तथा बाद में उन्हें Form-6 के जरिए दोबारा आवेदन कर अपनी पात्रता साबित करने के लिए मजबूर किया गया।
सिंह ने अपने पत्र में यह भी दावा किया कि SIR के दौरान पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों के नाम हटाने की प्रक्रिया में संबंधित मतदाताओं पर ही पात्रता साबित करने का बोझ डाल दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जांच और आपत्ति की स्थिति में प्रमाण का दायित्व मतदाता के बजाय संबंधित प्राधिकारी या आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति पर होना चाहिए।
Form-6 के अतिरिक्त परिशिष्ट पर सवाल
आर.के. सिंह ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में जोड़े गए अतिरिक्त परिशिष्ट पर भी आपत्ति जताई। उनके अनुसार, नए आवेदकों से 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के नाम और उनके क्रमांक जैसी जानकारी मांगी जा रही है। सिंह ने सवाल उठाया कि वर्ष 2026 में 18 वर्ष का कोई नया मतदाता दो दशक से अधिक पुरानी मतदाता सूची तक कैसे आसानी से पहुंच पाएगा।
सिंह का आरोप है कि Form-6 में यह बदलाव उचित अधिकार के बिना किया गया और इस मुद्दे पर चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों की आपत्तियां भी थीं। उनका कहना है कि ऐसी प्रक्रिया युवा मतदाताओं के पंजीकरण में व्यावहारिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है।
Form-7 की आपत्तियों पर भी सवाल
सिंह ने Form-7 के जरिए बड़ी संख्या में दाखिल की गई आपत्तियों को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि इन आपत्तियों को किसने दाखिल किया और क्या आपत्ति दर्ज कराने वाले लोग संबंधित प्रक्रिया में व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए। उन्होंने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए करीब 16 लाख मतदाताओं से जुड़ी अपीलों का उल्लेख किया और दावा किया कि इनमें बड़ी संख्या में मतदाताओं को बाद की प्रक्रिया में वैध पाया गया। ये आंकड़े और दावे सिंह के पत्र में दिए गए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ पर भी निशाना
SIR के दौरान इस्तेमाल की जा रही “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की अवधारणा पर भी सिंह ने आपत्ति जताई। उनका तर्क है कि गरीब और ग्रामीण परिवारों में जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज हमेशा उपलब्ध नहीं होते और कई बार उम्र का रिकॉर्ड अनुमान के आधार पर दर्ज किया गया होता है। ऐसे में माता-पिता और बच्चों की उम्र के बीच अंतर को आधार बनाकर बिना पर्याप्त जांच किसी मतदाता की पात्रता पर सवाल उठाना उचित नहीं है, ऐसा उनका कहना है।
सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन को अत्यधिक केंद्रीकृत किया गया है और इससे स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हो सकती है। उन्होंने चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की ओर से कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्टों का भी उल्लेख किया। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए हैं।
13 करोड़ नाम हटाने का दावा
आर.के. सिंह ने दावा किया है कि SIR के दौरान करीब 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने इसे कुल मतदाताओं का लगभग 13 प्रतिशत बताया और कहा कि SIR की प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुई है। हालांकि, यह आंकड़ा आर.के. सिंह का दावा है। इसे आधिकारिक रूप से सत्यापित अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता। उपलब्ध कानूनी विश्लेषणों में भी इस आंकड़े को सावधानी से देखने की बात कही गई है, क्योंकि ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर रह गए नाम और अंतिम रूप से मतदाता सूची से स्थायी रूप से हटाए गए पात्र मतदाताओं की संख्या एक ही बात नहीं है।
सिंह ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर मतदाता नामों के हटने का चुनावी परिणामों पर प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि केंद्रीकृत व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से किसी खास क्षेत्र के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, इस आशंका के समर्थन में स्वतंत्र प्रमाण सामने आना अभी बाकी है।
क्रिमिनल केस दर्ज करने की मांग
आर.के. सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को संख्या बल के कारण व्यावहारिक रूप से मुश्किल बताते हुए विपक्षी दलों से क्रिमिनल केस दर्ज कराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों को एकजुट होकर तब तक चुनावों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए, जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अपने पदों से इस्तीफा नहीं देते।
उन्होंने यह भी मांग की कि जिन राज्यों में मतदाता सूची से जुड़े मामले और अपील लंबित रहने के दौरान चुनाव हो चुके हैं, वहां चुनाव दोबारा कराए जाएं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए पुराने चयन तंत्र को बहाल करने और EVM के बजाय मतपत्र से चुनाव कराने की मांग भी रखी।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण
SIR को लेकर कानूनी विवाद पहले से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। वहीं, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR से जुड़े फैसलों और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर नई याचिकाओं में भी सवाल उठाए गए हैं। एक नई याचिका में CEC और आयोग के अधिकारियों के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई तथा SIR से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इन याचिकाओं में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक जांच के अधीन हैं और उन्हें अदालत का स्थापित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आर.के. सिंह के पत्र ने SIR को लेकर चल रही राजनीतिक और कानूनी बहस को और तेज कर दिया है। उनके आरोपों का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र यही सवाल है कि SIR के तहत मतदाता सूची में किए जा रहे बदलाव कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप हैं या नहीं और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जा रही है।



