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पिछड़ा से पंडित तक: यूपी में बदलता गया अखिलेश के ‘PDA’ का मतलब

राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | लखनऊ | 29 सितंबर 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘PDA’ अब केवल एक राजनीतिक संक्षिप्त नाम नहीं रह गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जून 2023 में जब पहली बार ‘PDA’ का इस्तेमाल किया था, तब इसका अर्थ ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ था। समाजवादी पार्टी ने इसे अपने व्यापक सामाजिक गठबंधन के रूप में पेश किया और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले NDA के राजनीतिक मुकाबले के तौर पर सामने रखा। अखिलेश यादव लगातार यह कहते रहे कि “PDA ही NDA को हराएगा।” इस नारे के जरिए समाजवादी पार्टी ने पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों को एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन के रूप में जोड़ने की कोशिश की। लेकिन समय के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसी ‘PDA’ शब्द की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आने लगी हैं और अब विरोधी दल इसे अपने-अपने राजनीतिक संदेश के मुताबिक नए अर्थों में इस्तेमाल कर रहे हैं।

अखिलेश यादव द्वारा पेश किया गया PDA मूल रूप से एक सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के तौर पर देखा गया था। इसका उद्देश्य उन सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाना था, जिन्हें समाजवादी पार्टी अपने राजनीतिक आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती रही है। ‘पिछड़ा’ के जरिए अन्य पिछड़ा वर्ग, ‘दलित’ के जरिए अनुसूचित जातियां और ‘अल्पसंख्यक’ के जरिए मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय को इस राजनीतिक समीकरण में शामिल किया गया। समाजवादी पार्टी ने इसे केवल चुनावी नारे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सत्ता में हिस्सेदारी से जोड़कर पेश किया। अखिलेश यादव के भाषणों में PDA का उल्लेख लगातार बढ़ता गया और पार्टी ने इसे उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाया। खास तौर पर जातीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी के मुद्दों को PDA के साथ जोड़कर जनता के बीच रखने की कोशिश की गई।

हालांकि, उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी भी प्रभावशाली राजनीतिक नारे या शब्द का लंबे समय तक एक ही अर्थ में रहना आसान नहीं होता। PDA को लेकर भी यही देखने को मिला। राजनीतिक विरोधियों ने अखिलेश यादव के बनाए इस संक्षिप्त नाम को अलग-अलग तरीके से परिभाषित करना शुरू किया। यही वजह है कि अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘PDA’ का अर्थ राजनीतिक दलों और नेताओं के हिसाब से बदलता दिखाई दे रहा है। कभी इसे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ के रूप में पेश किया जाता है, तो कभी इसके अक्षरों को नए राजनीतिक समूहों और सामाजिक वर्गों से जोड़ने की कोशिश की जाती है। इस पूरी कवायद का मकसद केवल शब्दों का अर्थ बदलना नहीं है, बल्कि PDA से जुड़े राजनीतिक संदेश को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना भी है।

इस राजनीतिक शब्द-युद्ध का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश में जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। अलग-अलग दल अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने के लिए विभिन्न वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का भरोसा देते रहे हैं। ऐसे में किसी राजनीतिक गठबंधन को एक छोटे और आसानी से याद रहने वाले शब्द में बांध देना चुनावी संचार का प्रभावी तरीका हो सकता है। अखिलेश यादव ने PDA के जरिए इसी तरह का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी। इसके जवाब में उनके राजनीतिक विरोधियों की ओर से उसी शब्द की नई व्याख्याएं सामने आना यह दिखाता है कि राजनीतिक नारों और संक्षिप्त शब्दों की लड़ाई भी अब चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी है।

PDA की नई-नई व्याख्याओं के बीच मूल सवाल यही है कि क्या कोई राजनीतिक संक्षिप्त नाम वास्तव में किसी स्थायी सामाजिक गठबंधन को परिभाषित कर सकता है या चुनावी राजनीति बदलने के साथ उसका अर्थ भी बदलता रहता है। समाजवादी पार्टी के लिए PDA की मूल परिभाषा स्पष्ट है—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। पार्टी इसे सामाजिक न्याय और व्यापक प्रतिनिधित्व की अपनी राजनीतिक सोच से जोड़ती है। वहीं विरोधी दल इसी शब्द को अलग संदर्भों में रखकर अपनी राजनीतिक व्याख्या सामने ला रहे हैं। इसलिए ‘PDA’ को लेकर चल रही बहस केवल शब्दों की बहस नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक गठबंधनों, प्रतिनिधित्व और चुनावी संदेशों की प्रतिस्पर्धा को भी सामने लाती है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘PDA’ का सफर इस बात का उदाहरण है कि एक राजनीतिक नेता द्वारा गढ़ा गया नारा समय के साथ उसके मूल अर्थ से आगे निकल सकता है। 2023 में अखिलेश यादव ने PDA को ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ के सामाजिक गठबंधन के रूप में सामने रखा था, लेकिन अब राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उसी शब्द को अलग-अलग अर्थों में इस्तेमाल कर रहे हैं। आने वाले चुनावी दौर में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि PDA की कौन-सी व्याख्या राजनीतिक विमर्श में प्रमुख रहती है और अलग-अलग दल इसे अपने सामाजिक और राजनीतिक संदेश के साथ किस तरह जोड़ते हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में PDA एक शब्द से बढ़कर राजनीतिक संदेश और सामाजिक समीकरण की बहस का केंद्र बन चुका है।

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