राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष का हमला अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है। SIR, मतदाता सूची, वोटों की गिनती, चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां और मतदान के आंकड़ों में अंतर—इन सभी मुद्दों को जोड़कर विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठा रहा है। राहुल गांधी ने साफ कहा है कि कांग्रेस और विपक्ष चुप नहीं बैठेंगे और अगले 2-3 महीनों में आगे की कार्रवाई दिखाई देगी। राहुल गांधी के निशाने पर सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपने आरोपों को दोहराते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। ये राजनीतिक आरोप हैं, लेकिन चुनाव आयोग के भीतर 2 चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों ने इस विवाद को एक नया आयाम जरूर दिया है।
मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि चुनाव आयोग के 3 सदस्यीय ढांचे में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार अलग-अलग फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार इनमें मतदाता जोड़ने और हटाने, Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डाटाबेस तक पहुंच, IT व्यवस्था, पश्चिम बंगाल में अपील और SIR से जुड़े कई मुद्दे शामिल थे। कुछ मामलों में इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने कार्रवाई को “अनधिकृत” और “गैरकानूनी” बताया। यही वह बिंदु है जिसने ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा किया है।
Form 6 का मामला भी विवाद के केंद्र में है। रिपोर्ट के अनुसार जुलाई में नए मतदाता के आवेदन वाले Form 6 में ऐसा सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले SIR की मतदाता सूची में मौजूद होने की जानकारी मांगी गई। विवेक जोशी ने मई में ही इस तरह के बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की जरूरत बताई थी, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में इस बदलाव को “अनधिकृत और गैरकानूनी” बताते हुए इसे हटाने की बात दर्ज की। सवाल यही है कि जब आयोग के 2 सदस्यों ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी, तो इसे लागू करने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी?
इसके बाद सवाल पहुंचा मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण तक। विवेक जोशी ने मतदाता डाटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण पर चिंता जताई थी, जबकि संधू ने राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की ERONet तक पहुंच को लेकर सवाल उठाए। दोनों ने IT व्यवस्था और कार्य-विभाजन से जुड़ी चिंताओं को कैबिनेट सचिव तक पहुंचाया। यानी विवाद सिर्फ कागज पर नाम जोड़ने या काटने का नहीं है; सवाल उस डिजिटल व्यवस्था का भी है जिसके जरिए देश की मतदाता सूची तैयार और संचालित की जाती है।
पश्चिम बंगाल ने इस विवाद को और गहरा कर दिया। SIR के दौरान 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए और इनमें से 22 लाख से ज्यादा लोगों ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की। कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुईं, जिनमें 22.21 लाख नाम जोड़ने और 16.10 लाख नाम हटाने से जुड़ी थीं। संधू ने सवाल उठाया कि इन अपीलों को चुनाव आयोग की ओर से दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इन्हें किसने दाखिल किया।
अब बिहार की बारी। SIR के दौरान करीब 3 लाख आपत्तियों की बात सामने आई है। दावा है कि करीब 57% आपत्तियों पर उन्हीं लोगों के हस्ताक्षर पाए गए जिनके नाम से संबंधित आपत्ति जुड़ी थी। करीब 700 मामलों में खुद को विदेशी बताए जाने और 28 मामलों में व्यक्ति को मृत बताते हुए नाम हटाने की बात भी सामने आई है। अगर ये आंकड़े आधिकारिक रिकॉर्ड से सही साबित होते हैं तो सवाल बहुत सीधा है—एक ही व्यक्ति अपने नाम को मतदाता सूची में बनाए रखने के लिए प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसी नाम को हटाने वाली आपत्ति तक कैसे पहुंचा? इन मामलों की पूरी जांच और दस्तावेज सार्वजनिक होना जरूरी है।
और अब SIR को लेकर एक और आंकड़ा राजनीतिक बहस को और धार दे रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में SIR के दौरान करीब 51,000 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जबकि 2026 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी इसी सीट से 15,105 वोट के अंतर से हार गईं। यह आंकड़ा अपने आप यह साबित नहीं करता कि नाम हटने की वजह से चुनाव परिणाम बदला, लेकिन दोनों आंकड़ों की तुलना ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा किया है। उपलब्ध रिपोर्टों में भवानीपुर में SIR से जुड़े 51,000 से अधिक विलोपन और ममता बनर्जी की 15,105 वोट की हार का उल्लेख है।
तमिलनाडु में भी इसी तरह का सवाल उठाया जा रहा है। एम.के. स्टालिन के कोलाथुर विधानसभा क्षेत्र को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में 83,000 से ज्यादा मतदाता नाम हटने और स्टालिन के 8,795 वोट से हारने का उल्लेख है। कुछ राजनीतिक दावों में इसे करीब 1 लाख नाम और करीब 9 हजार वोट के अंतर के रूप में पेश किया जा रहा है। इसलिए यहां भी मूल SIR रिकॉर्ड और अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों का मिलान जरूरी है। सिर्फ नाम हटने और हार के अंतर को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोनों के बीच कारणात्मक संबंध साबित हो गया।
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की नई दिल्ली विधानसभा सीट को लेकर भी SIR के आंकड़ों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि 40,000 नाम हटने और करीब 4,000-5,000 वोट के अंतर वाला दावा स्वतंत्र रूप से स्थापित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र स्तर के आधिकारिक आंकड़ों का मिलान जरूरी है। मौजूदा SIR प्रक्रिया में केजरीवाल और उनके परिवार के सदस्यों को भी नोटिस जारी हुए हैं और दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची में करीब 47.6 लाख नाम हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
यही तुलना अब विपक्ष के सबसे बड़े सवाल को जन्म दे रही है—क्या SIR में हटाए गए नाम और चुनावी हार के बीच कोई संबंध है, या ये केवल आंकड़ों का संयोग है? इसका जवाब राजनीतिक भाषण से नहीं, बल्कि बूथ स्तर के आंकड़ों, हटाए गए मतदाताओं की सूची, आपत्तियों, अपीलों और अंतिम मतदाता सूची के मिलान से ही मिल सकता है। लेकिन यह भी तथ्य है कि जब किसी सीट पर हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से कई गुना ज्यादा हो, तो उस आंकड़े की सार्वजनिक जांच की मांग उठना स्वाभाविक है।
विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को अब एक बड़े राजनीतिक सवाल से जोड़ रहा है। अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर बेहद तीखा हमला किया है। योगेंद्र यादव ने Form 6, ERO की भूमिका और मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं। प्रशांत किशोर ने भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर राजनीतिक आरोप लगाए और कहा कि करीबी मुकाबलों में आयोग की भूमिका BJP के पक्ष में रही। इन बयानों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन अलग-अलग नेताओं की एक जैसी चिंता अब चुनाव आयोग की पारदर्शिता को लेकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुकी है।
2024 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को लेकर ADR की रिपोर्ट भी इसी बहस में बार-बार सामने आ रही है। ADR के अनुसार 538 लोकसभा क्षेत्रों में EVM पर दर्ज वोटों और गिने गए वोटों में अंतर था। 362 निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 5,54,598 वोट कम गिने गए, जबकि 176 निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 35,093 वोट ज्यादा गिने गए। ADR ने इन आंकड़ों को लेकर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा था। हालांकि इन अंतर से कितने चुनावी परिणाम प्रभावित हुए, ADR ने इसका निष्कर्ष नहीं दिया था।
इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार दिबांग ने हरियाणा के मतदान आंकड़ों को लेकर सवाल उठाया है। उनके उठाए मुद्दे में मतदान के दिन शाम 5:30 बजे, रात 12:30 बजे और मतगणना से पहले सामने आए आंकड़ों के बीच अंतर का जिक्र है और 11% तक वोट बढ़ने का सवाल उठाया गया है। इन दावों की पुष्टि के लिए निर्वाचन क्षेत्र और मतदान केंद्र स्तर के मूल रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है। लेकिन सवाल फिर वही है—अगर आंकड़े बदले तो बदलाव की वजह, समय और अधिकृत प्रक्रिया जनता के सामने क्यों नहीं होनी चाहिए?
और अब सबसे बड़ा सवाल ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर उठ रहा है। 2 चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां, Form 6 विवाद, मतदाता डाटाबेस के केंद्रीकरण पर सवाल, पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर आपत्ति और SIR की व्यापक प्रक्रिया—इन सबके बीच मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में है। वहीं चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियां सामान्य संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और SIR समेत प्रमुख फैसले आयोग ने सर्वसम्मति से लिए हैं।
लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। 25 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई और SIR से जुड़े मामलों की SIT जांच की मांग की गई। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ फैसले 2 अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। ये याचिकाकर्ता के आरोप हैं और अदालत ने अभी इन आरोपों को सही ठहराने वाला कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि SIR में कितने नाम जुड़े या कितने हटे। सवाल यह है कि मतदाता सूची कौन नियंत्रित कर रहा है, डिजिटल सिस्टम में बदलाव कौन कर रहा है, आपत्तियां किसके आदेश पर दाखिल हो रही हैं, आंकड़ों में अंतर क्यों है और चुनाव आयोग के भीतर उठाई गई आपत्तियों का निपटारा कैसे हुआ।
भवानीपुर में 51 हजार से ज्यादा नाम हटने के सामने 15 हजार की हार, कोलाथुर में 83 हजार से ज्यादा विलोपन के सामने करीब 9 हजार का अंतर और दिल्ली में भी उठते ऐसे ही सवाल—इन आंकड़ों को एक साथ रखकर राजनीतिक आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन असली जवाब आंकड़ों की स्वतंत्र और बूथ-स्तरीय जांच से ही निकलेगा।
लोकतंत्र में हर वोट का हिसाब होना चाहिए। मतदाता सूची से लेकर मतदान और मतदान से लेकर मतगणना तक—हर आंकड़े का रिकॉर्ड साफ होना चाहिए। क्योंकि चुनाव पर सवाल उठने से पहले सवालों का जवाब उपलब्ध होना चाहिए।



