राजनीति/ चुनाव | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 सितंबर 2026
चुनाव आयोग के भीतर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में शामिल सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और आयोग के कामकाज में दोनों आयुक्तों को पर्याप्त जानकारी नहीं दिए जाने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। इसके बाद इसे देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक लागू किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। इन नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस पहले से चल रही है। हालांकि केवल नाम हटने के आंकड़े से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसका किसी चुनाव के नतीजे पर क्या प्रभाव पड़ा। असली सवाल यह है कि नाम हटाने और जोड़ने की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और नियमों के मुताबिक हुई।
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच का सबसे अहम पहलू यह है कि इन सवालों को केवल राजनीतिक दलों ने नहीं उठाया, बल्कि चुनाव आयोग के अपने 2 आयुक्तों ने भी अलग-अलग मौकों पर लिखित रूप में दर्ज किया। संधू और जोशी ने कई मामलों में प्रक्रिया, अधिकारों के इस्तेमाल और तकनीकी व्यवस्था को लेकर चिंता जताई। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में उन्होंने संबंधित कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” तक बताया।
इन आपत्तियों में Form 6 का मामला खास तौर पर महत्वपूर्ण है। पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में SIR से जुड़ा नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से पूछा गया कि क्या उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में था। विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि Form 6 कानून के तहत निर्धारित फॉर्म है और इसे Registration of Electors Rules, 1960 में बदलाव किए बिना नहीं बदला जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी बाद में इस राय से सहमति जताई।
रिपोर्ट के अनुसार, इसके बावजूद Form 6 में किया गया बदलाव तुरंत वापस नहीं लिया गया। अगस्त में संधू ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर इस बदलाव को हटाने और मूल Form 6 बहाल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि पात्र युवा और पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों को बिना परेशानी कानून के अनुसार पंजीकरण का अवसर मिलना चाहिए। यह आपत्ति उस समय और महत्वपूर्ण हो जाती है जब पहली बार वोट देने वाले लाखों युवा सीधे इस फॉर्म पर निर्भर हैं।
आयोग के भीतर मतदाता सूची के डेटाबेस और ECINet के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठे। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर चिंता जताई कि तकनीकी व्यवस्था का ज्यादा केंद्रीकरण राज्य और जमीनी स्तर के अधिकारियों की भूमिका को कमजोर कर सकता है। गोवा में 97 पात्र मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल न हो पाने की घटना ने इसी तरह की तकनीकी चिंता को सामने ला दिया। स्थानीय अधिकारियों की ओर से कई बार संपर्क किए जाने के बावजूद तकनीकी व्यवस्था की समस्या के कारण नाम अंतिम सूची में नहीं पहुंच सके।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी चिंताएं आयोग के भीतर रखने के बाद कैबिनेट सचिव तक भी पहुंचाईं। इसका मतलब यह है कि उनके सवाल सिर्फ किसी एक फाइल या मामूली तकनीकी सुझाव तक सीमित नहीं थे। उन्होंने मतदाता सूची की प्रक्रिया, तकनीकी व्यवस्था और संस्थागत कामकाज से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से उठाया।
यहां एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू भी है। चुनाव आयोग 3 सदस्यों वाली संस्था है और कानून में अलग-अलग राय की स्थिति में निर्णय लेने की व्यवस्था मौजूद है। इसलिए 2 आयुक्तों की आपत्ति अपने आप किसी फैसले को अवैध साबित नहीं करती। लेकिन जब एक संवैधानिक संस्था के भीतर लगातार और रिकॉर्ड पर इतनी आपत्तियां दर्ज हों, तो उन आपत्तियों पर क्या जवाब दिया गया और अंतिम निर्णय किस आधार पर लिया गया, इसकी जानकारी सार्वजनिक होना संस्थागत पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग की ओर से इस तरह की असहमति को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है। आयोग का पक्ष रहा है कि अलग-अलग विचार, तकनीकी सुझाव और टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया में आती रहती हैं और अंतिम निर्णय कानून के अनुसार लिए जाते हैं। इसलिए केवल आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर आयोग के अंतिम फैसलों की वैधता पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फिर भी 14 लिखित आपत्तियों का सामने आना अपने आप में एक गंभीर संस्थागत घटनाक्रम है। खासकर तब, जब ये आपत्तियां मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और तकनीकी नियंत्रण जैसे सीधे चुनावी अधिकारों से जुड़े विषयों पर हों। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन सभी आपत्तियों पर आयोग के स्तर पर क्या जवाब दिया गया, किन सुझावों को स्वीकार किया गया और किन्हें खारिज किया गया।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और अद्यतन करना है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हर पात्र नागरिक के नाम और उसके मतदान के अधिकार की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए चुनाव आयोग के भीतर दर्ज इन 14 आपत्तियों का बिंदुवार जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव किस प्रक्रिया, किस तकनीकी व्यवस्था और किस संस्थागत निगरानी के तहत किए गए।



