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GDP के नए आंकड़ों की बाजीगरी पर बड़ा सवाल: पुराने अनुमान बदले, अर्थव्यवस्था का आकार घटा और विकास दर की तस्वीर हुई अलग

अर्थव्यवस्था/ भारत | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026

भारत की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका जवाब सिर्फ एक GDP आंकड़े से नहीं मिलता। असली कहानी उस तरीके में छिपी होती है, जिससे यह आंकड़ा तैयार किया जाता है। नई GDP सीरीज को लेकर अब यही बड़ा सवाल उठ रहा है। नई गणना पद्धति में कई अहम बदलाव किए गए हैं। मैन्युफैक्चरिंग की 30 में से 28 श्रेणियों में ‘डबल डिफ्लेशन’ लागू किया गया है, पुराने वर्षों के आंकड़ों में संशोधन हुआ है और 2022-23 में परिवारों की सोने-चांदी के आभूषणों के रूप में बचत का अनुमान ₹64,504 करोड़ से बढ़ाकर ₹1.65 लाख करोड़ कर दिया गया है। इन बदलावों को सरकार बेहतर और आधुनिक गणना पद्धति बता रही है, लेकिन आलोचकों का सवाल है कि जब गणना का तरीका बदलता है और पुराने आंकड़े भी बदल जाते हैं, तो आम आदमी कैसे तय करे कि अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर क्या है?

सबसे पहले समझिए कि मामला है क्या। GDP यानी देश में एक निश्चित अवधि के दौरान पैदा होने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कुल आर्थिक कीमत। लेकिन इस कीमत में महंगाई भी शामिल होती है। अगर किसी फैक्ट्री का उत्पादन उतना ही है लेकिन सामान की कीमत 10% बढ़ गई, तो केवल कीमत बढ़ने से GDP बढ़ी हुई दिखाई दे सकती है। इसलिए सरकार को यह निकालना पड़ता है कि वास्तव में उत्पादन कितना बढ़ा। इसी जगह ‘डबल डिफ्लेशन’ आता है। इसमें तैयार माल की कीमत और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल तथा दूसरे इनपुट की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। सरकार का कहना है कि इससे वास्तविक उत्पादन और वास्तविक आर्थिक वृद्धि का बेहतर अनुमान मिलता है।

लेकिन यहीं से बहस शुरू होती है। नई सीरीज से पहले मैन्युफैक्चरिंग सहित कई क्षेत्रों में कीमतों को समायोजित करने के लिए एक अलग तरीका इस्तेमाल किया जाता था। नई व्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग के लिए बड़े पैमाने पर ‘डबल डिफ्लेशन’ लाया गया है और अब ज्यादा बारीक स्तर के मूल्य सूचकांकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार इसे सुधार बता रही है। तकनीकी तौर पर यह तरीका वास्तविक उत्पादन मापने के लिए ज्यादा विस्तृत हो सकता है, लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल यह है कि नई पद्धति लागू करने के बाद पुराने आंकड़े कितने बदले और इन बदलावों से विकास दर की पूरी तस्वीर पर कितना असर पड़ा?

सबसे ज्यादा चर्चा पुराने GDP आंकड़ों में किए गए नीचे के संशोधन को लेकर है। नई सीरीज में 2022-23 को नया आधार वर्ष बनाया गया है और बेहतर आंकड़ों तथा नई पद्धति के आधार पर पुराने अनुमानों को भी दोबारा तैयार किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि असंगठित क्षेत्र यानी छोटे कारोबार और घरेलू उद्यमों को पहले की तुलना में अब ज्यादा प्रत्यक्ष सर्वेक्षणों के जरिए मापा जा रहा है। इसी वजह से कुछ क्षेत्रों में पहले के मुकाबले कम आर्थिक गतिविधि दर्ज हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘हाउसहोल्ड सेक्टर’ के नाममात्र GVA में 2022-23 के लिए पुराने अनुमान की तुलना में ₹2.9 लाख करोड़ की कमी की गई है।

अब आम आदमी के लिए इसे ऐसे समझिए—अगर पिछली गणना में किसी क्षेत्र का योगदान 100 माना गया था और नई गणना में वही योगदान 90 कर दिया गया, तो उस पुराने आधार पर बाद के वर्षों की वृद्धि दर का हिसाब भी बदल जाएगा। इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि आज GDP वृद्धि दर कितनी है। यह भी देखना जरूरी है कि जिस आधार से आज की वृद्धि दर निकाली गई है, उस आधार को नई गणना में कितना बदला गया है। यही वह तकनीकी बिंदु है जिसने नई GDP सीरीज पर बहस को जन्म दिया है।

इसी वजह से कुछ आलोचकों ने सवाल उठाया है कि पिछले वर्षों की नाममात्र GDP को नीचे संशोधित करने से अर्थव्यवस्था का आकार पहले की तुलना में छोटा दिखाई देता है और इससे बाद की वास्तविक वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से अधिक दिखाई दे सकती है। खास तौर पर अप्रैल-जून 2025 के नाममात्र GDP के नीचे संशोधन और अप्रैल-जून 2026 की 7.8% वास्तविक वृद्धि को लेकर सवाल उठे हैं। लेकिन यहां एक जरूरी तथ्य भी है—यह कहना कि सरकार ने जानबूझकर GDP बढ़ाकर दिखाने के लिए आंकड़े बदले हैं, उपलब्ध दस्तावेजों से साबित नहीं होता। सरकार और MoSPI का कहना है कि बेहतर तरीके से असंगठित क्षेत्र को मापने और नए आंकड़ों को शामिल करने के कारण पुराने अनुमान बदले हैं।

अब आते हैं सोने वाले आंकड़े पर। नई GDP सीरीज में 2022-23 में परिवारों की सोने और चांदी के आभूषणों के रूप में बचत का अनुमान बढ़कर ₹1.65 लाख करोड़ हो गया। पुरानी गणना में यही आंकड़ा ₹64,504 करोड़ था। यानी नया अनुमान दोगुने से भी ज्यादा है। 2023-24 में यह ₹1.72 लाख करोड़ और 2025-26 में ₹2.18 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसका मतलब यह नहीं कि एक रात में देश के लोगों के घरों में इतना नया सोना आ गया। इसका मतलब यह है कि सरकार ने परिवारों की आभूषणों में रखी बचत का अनुमान पहले की तुलना में बहुत बड़ा माना है।

यहीं पारदर्शिता का सवाल खड़ा होता है। जब किसी आंकड़े में इतना बड़ा बदलाव हो, तो जनता को साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि नया अनुमान किस सर्वे, किस डेटा और किस गणना से निकला। सरकार ने अपनी नई GDP सीरीज के लिए विस्तृत ‘सोर्सेज एंड मेथड्स’ दस्तावेज जारी किया है और उसका कहना है कि इसमें इस्तेमाल किए गए स्रोतों, परिभाषाओं और गणना की प्रक्रिया को विस्तार से रखा गया है। MoSPI के अनुसार नई सीरीज में GST, PFMS, e-Vahan, ASUSE और PLFS जैसे नए और विस्तृत डेटा स्रोतों का भी इस्तेमाल किया गया है।

इसलिए असली सवाल को ‘सरकार आंकड़ों में हेरफेर कर रही है या नहीं’ तक सीमित करना शायद पर्याप्त नहीं होगा। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सरकार द्वारा किए गए हर बड़े बदलाव को स्वतंत्र विशेषज्ञ उसी डेटा के आधार पर दोबारा जांच सकते हैं? क्या कोई अर्थशास्त्री यह देख सकता है कि 2022-23 का आंकड़ा पुराने तरीके से कितना था, नई पद्धति से कितना हुआ और अंतर की वजह क्या है? क्या अलग-अलग क्षेत्रों में हुए संशोधन पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किए गए हैं? और क्या जनता को सिर्फ अंतिम GDP दर बताने के बजाय उस दर तक पहुंचने का पूरा रास्ता भी समझाया जा रहा है?

सरकार का पक्ष भी साफ है। MoSPI का कहना है कि आधार वर्ष बदलना और नई जानकारी उपलब्ध होने पर पुराने आंकड़ों को संशोधित करना राष्ट्रीय खातों की सामान्य प्रक्रिया है। मंत्रालय यह भी कहता है कि पुराने अनुमान उस समय उपलब्ध सर्वोत्तम आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए थे और नई जानकारी मिलने पर उनमें सुधार किया जाना स्वाभाविक है। सरकार के अनुसार नई सीरीज का उद्देश्य GDP को कम या ज्यादा दिखाना नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को ज्यादा सही तरीके से मापना है।

लेकिन सरकार के इस स्पष्टीकरण के बावजूद बहस खत्म नहीं होती। क्योंकि अर्थव्यवस्था का आंकड़ा सिर्फ अर्थशास्त्रियों के लिए नहीं है। इसी से देश की विकास दर, प्रति व्यक्ति आय, निवेश, सरकारी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक स्थिति को समझा जाता है। इसलिए जब एक ही देश के पुराने आंकड़े नई पद्धति से बदलते हैं, तो सरकार पर यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह हर बड़े बदलाव का कारण इतनी सरल भाषा में बताए कि आम नागरिक भी समझ सके कि देश की अर्थव्यवस्था वास्तव में बढ़ी है या आंकड़ा निकालने का तरीका बदलने से तस्वीर बदली है।

इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि नई GDP सीरीज अपने आप में आंकड़ों की हेरफेर का सबूत नहीं है, लेकिन बड़े संशोधनों ने पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत जरूर बढ़ा दी है। 28 मैन्युफैक्चरिंग श्रेणियों में ‘डबल डिफ्लेशन’, घरेलू क्षेत्र के GVA में ₹2.9 लाख करोड़ की कमी और सोने-चांदी की घरेलू बचत के अनुमान में भारी बढ़ोतरी जैसे बदलावों को जनता के सामने सिर्फ तकनीकी शब्दों में नहीं, बल्कि पूरे हिसाब-किताब के साथ रखना जरूरी है।

आखिर GDP का सवाल सिर्फ सरकार का आंकड़ा नहीं है—यह देश की आर्थिक सेहत का आईना है। इसलिए आंकड़ा बदले तो कारण भी साफ होना चाहिए, तरीका बदले तो उसका असर भी बताया जाना चाहिए और दावा बड़ा हो तो उसका पूरा हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए। यही पारदर्शिता किसी भी GDP आंकड़े पर भरोसे की सबसे बड़ी कसौटी है।

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