इन्फ्रास्ट्रक्चर/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 सितंबर 2026
भारत में हाई-स्पीड हाईवे नेटवर्क को तेजी से बढ़ाने की तैयारी शुरू हो गई है। देश में एक्सेस-कंट्रोल्ड नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे के निर्माण को एक समान मानकों पर करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI ने नए विस्तृत डिजाइन नियम और मानक जारी किए हैं। इन नियमों का मकसद हाई-स्पीड कॉरिडोर के निर्माण में एकरूपता लाना और अलग-अलग परियोजनाओं में इस्तेमाल होने वाले डिजाइन, तकनीकी मानकों और निर्माण प्रक्रिया को एक समान बनाना है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने विजन 2047 के तहत वर्ष 2036-37 तक देश में 50,000 किमी हाई-स्पीड कॉरिडोर विकसित करने का लक्ष्य रखा है। हाई-स्पीड कॉरिडोर ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग होते हैं जहां प्रवेश और निकास नियंत्रित होता है और वाहनों को रास्ते में अनावश्यक रुकावटों के बिना एक छोर से दूसरे छोर तक तेज और सुगम यात्रा की सुविधा मिलती है।
दिसंबर 2025 तक देश में हाई-स्पीड कॉरिडोर की कुल लंबाई 3,052 किमी थी। यानी मौजूदा नेटवर्क और 2037 के लक्ष्य के बीच बहुत बड़ा अंतर है। इस अंतर को भरने के लिए आने वाले वर्षों में हजारों किलोमीटर नए हाई-स्पीड कॉरिडोर का निर्माण करना होगा। नए नियम इसी बड़े विस्तार को व्यवस्थित और एक समान तरीके से आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
अब तक अलग-अलग परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR तैयार करने वाले सलाहकार कई बार अलग-अलग मानकों और तकनीकी जरूरतों के आधार पर डिजाइन तैयार करते थे। इससे परियोजनाओं के डिजाइन और निर्माण मानकों में अंतर आ सकता था। NHAI की नई गाइडलाइन का उद्देश्य इस अंतर को कम करना और हाई-स्पीड कॉरिडोर के लिए एक स्पष्ट और समान ढांचा तैयार करना है।
नए नियमों में सबसे महत्वपूर्ण जोर ट्रैफिक आकलन पर दिया गया है। किसी भी नए हाई-स्पीड कॉरिडोर की योजना बनाते समय सिर्फ मौजूदा वाहनों की संख्या को आधार नहीं बनाया जाएगा। ट्रैफिक मॉडलिंग में मौजूदा ट्रैफिक के साथ नया पैदा होने वाला ट्रैफिक, विकास के कारण बढ़ने वाला ट्रैफिक और दूसरे मार्गों से इस नए कॉरिडोर पर आने वाला ट्रैफिक भी शामिल करना होगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि भविष्य में सड़क पर वाहनों का दबाव कितना बढ़ सकता है।
हाई-स्पीड कॉरिडोर की योजना केवल सड़क की लंबाई तय करने तक सीमित नहीं होती। सड़क की लेन क्षमता, भविष्य की यातायात जरूरत, प्रवेश और निकास व्यवस्था, इंटरचेंज, टोलिंग और सुरक्षा मानकों को भी शुरुआत से ध्यान में रखना पड़ता है। नए नियमों के जरिए इन सभी पहलुओं को एक व्यवस्थित ढांचे में लाने की कोशिश की गई है, ताकि सड़क बनने के कुछ वर्षों बाद ही उसकी क्षमता कम न पड़ जाए।
इस पूरे कार्यक्रम का असर देश के परिवहन नेटवर्क पर भी दिखाई दे सकता है। हाई-स्पीड कॉरिडोर का उद्देश्य लंबी दूरी की यात्रा के समय को कम करना, बड़े शहरों और आर्थिक केंद्रों के बीच बेहतर संपर्क बनाना तथा माल ढुलाई को अधिक सुगम बनाना है। बेहतर हाई-स्पीड कनेक्टिविटी से औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स केंद्रों और प्रमुख शहरों के बीच आवाजाही को भी मजबूती मिल सकती है।
हालांकि 50,000 किमी का लक्ष्य बड़ा है और इसे हासिल करने के लिए केवल निर्माण की गति पर्याप्त नहीं होगी। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी, परियोजना लागत, वित्तीय संसाधन, निर्माण की गुणवत्ता और समय पर परियोजनाएं पूरी करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा लंबे समय तक सड़कों के रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था पर भी लगातार ध्यान देना होगा।
भारत में हाई-स्पीड सड़क नेटवर्क का विस्तार आने वाले वर्षों में देश के बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाओं में शामिल रहेगा। NHAI के नए डिजाइन और तकनीकी नियम इस विस्तार को एक समान मानकों के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश हैं। अब असली चुनौती यह होगी कि 3,052 किमी के मौजूदा नेटवर्क से 2036-37 तक 50,000 किमी के लक्ष्य तक पहुंचने की रफ्तार कितनी रहती है और इस दौरान सड़कों की गुणवत्ता, सुरक्षा और यातायात क्षमता को किस तरह बनाए रखा जाता है।



