राजनीति/ दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 सितंबर 2026
दिल्ली की वोटर लिस्ट को लेकर इस समय जो तस्वीर सामने आ रही है, उसने चुनावी प्रक्रिया को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी है। Special Intensive Revision यानी SIR के दौरान दिल्ली में 33,12,919 मतदाताओं के रिकॉर्ड में या तो पुरानी मतदाता सूची से मैपिंग नहीं मिली या उनके विवरण में तार्किक विसंगतियां दर्ज की गईं। इस सूची में आम मतदाता ही नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व उपराष्ट्रपति, पूर्व उपप्रधानमंत्री, चुनाव आयुक्त, वरिष्ठ वकील, पूर्व सेना प्रमुख और कई बड़े सार्वजनिक पदों पर रह चुके लोगों के नाम भी शामिल हैं।
सबसे चौंकाने वाले नामों में विदेश मंत्री एस जयशंकर, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और BJP के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी शामिल हैं। जयशंकर और उनकी पत्नी क्योको जयशंकर का नाम पिछली SIR सूची से मैपिंग नहीं होने वाली श्रेणी में आया है। दोनों नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के सुनेहरी बाग इलाके के मतदाता हैं। यानी रिकॉर्ड में यह पता नहीं चल पाया कि उनकी वर्तमान प्रविष्टि को पिछली SIR की मतदाता सूची से कैसे जोड़ा जाए।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का मामला इससे अलग था। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक उनके रिकॉर्ड में उनकी और उनके माता-पिता की उम्र के बीच 15 वर्ष से कम का अंतर दर्ज था, जिसे तार्किक विसंगति माना गया। लेकिन उनके मामले में दस्तावेजों और भौतिक सत्यापन के बाद प्रविष्टि को वैध कर दिया गया और उनका नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल किए जाने के लिए रख दिया गया। यानी नोटिस आने के बाद जांच हुई और उनका रिकॉर्ड सत्यापन के बाद आगे बढ़ गया।
अरविंद केजरीवाल और उनके परिवार का मामला भी इसी प्रक्रिया में सामने आया। केजरीवाल, उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल, उनके माता-पिता गोविंद राम केजरीवाल और गीता देवी तथा उनके बेटे पुलकित केजरीवाल के रिकॉर्ड पिछली SIR सूची से मैप नहीं हो सके। वे नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में पंजीकृत हैं। निर्वाचन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि दस्तावेजों और तथ्यों के सत्यापन के बाद इन प्रविष्टियों को अंतिम सूची में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
BJP के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी तथा उनकी बेटी प्रतिभा और बहू गीतिका को भी नोटिस मिला है। उनके नाम 2002 की SIR मतदाता सूची से मैप नहीं हो सके। आडवाणी के बेटे जयंत की प्रविष्टि हालांकि मैपिंग प्रक्रिया में साफ पाई गई। आडवाणी परिवार के सभी संबंधित मतदाता नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में दर्ज हैं। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि SIR में दर्ज विसंगतियां किसी एक राजनीतिक दल या एक वर्ग तक सीमित नहीं हैं।
सूची यहीं खत्म नहीं होती। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, BJP विधायक और पूर्व मंत्री कैलाश गहलोत, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, विदेश सचिव विक्रम मिस्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी, BJP सांसद बांसुरी स्वराज, वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, पूर्व JNU कुलपति एम जगदीश कुमार, पूर्व दिल्ली उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व NITI Aayog उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, SEBI अध्यक्ष तुहिन कांत पांडे, पूर्व सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी और CBI निदेशक प्रवीण सूद समेत कई प्रमुख नाम भी नोटिस सूची में हैं।
इसके अलावा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विचारक आशीष नंदी, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर तथा संचार सलाहकार दिलीप चेरियन के नाम भी सूची में बताए गए हैं। चुनाव आयुक्त एसएस संधू को नाम में विसंगति के आधार पर नोटिस मिला, जबकि उनके बेटे के रिकॉर्ड में माता-पिता के नाम को लेकर अंतर दर्ज किया गया। संधू की अपनी प्रविष्टि बाद में सत्यापन के बाद अंतिम सूची में शामिल किए जाने के लिए वैध कर दी गई।
अब सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर नोटिस क्यों भेजे गए? चुनाव अधिकारियों के मुताबिक दो मुख्य श्रेणियां बनाई गई हैं—‘नो मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’। करीब 13,79,785 मतदाताओं का रिकॉर्ड पिछली SIR सूची से मैप नहीं हो पाया, जबकि 19,33,134 मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां दर्ज की गईं। दोनों आंकड़ों को जोड़ने पर संख्या 33,12,919 पहुंचती है। विसंगतियों में मतदाता के अपने नाम या माता-पिता के नाम में अंतर, उम्र से जुड़े असामान्य विवरण और पुराने रिकॉर्ड से जानकारी का मेल न बैठना शामिल है।
यहां एक और बड़ा आंकड़ा सामने आता है। 31 अगस्त को प्रकाशित दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 97,53,577 मतदाता दर्ज थे, जबकि 30 जून की सूची में यह संख्या 1,45,10,299 थी। यानी ड्राफ्ट सूची में करीब 32.8 प्रतिशत की कमी दिखाई गई। इसी पृष्ठभूमि में SIR नोटिसों का मामला सामने आया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली SIR से जुड़ी एक याचिका पर तत्काल सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख तय की है। याचिका में करीब 33.1 लाख मतदाताओं को नोटिस दिए जाने और उनके नाम सार्वजनिक किए जाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
लेकिन यहां एक बात बेहद महत्वपूर्ण है—नोटिस मिलना वोटर लिस्ट से नाम कट जाना नहीं है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR नोटिस का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम अपने आप हटा दिया जाएगा। संबंधित मतदाता को जवाब देने और जरूरी दस्तावेज जमा करने का अवसर मिलेगा। अंतिम फैसला निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही होगा। चुनाव अधिकारियों ने भी कहा है कि किसी नाम को हटाने से पहले संबंधित मतदाता को सुनवाई का अवसर और उचित आदेश दिया जाना जरूरी है।
यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को केवल ‘नाम कटने’ की खबर के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि 3.3 करोड़ नहीं, बल्कि 33 लाख से ज्यादा मतदाताओं के रिकॉर्ड में एक साथ इतनी बड़ी संख्या में विसंगतियां क्यों सामने आईं? पिछली SIR से मैपिंग में इतनी बड़ी संख्या क्यों छूटी? रिकॉर्ड में नाम, माता-पिता के नाम और उम्र जैसी जानकारियों में इतने अंतर कैसे आए? और जिन लोगों को नोटिस मिला है, उनके दस्तावेजों की जांच कितनी तेजी और पारदर्शिता से होगी?
एक लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी कागज नहीं होती। यही वह दस्तावेज है जो तय करता है कि कौन अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा। इसलिए एक-एक नाम की शुद्धता महत्वपूर्ण है। गलत नाम शामिल नहीं होना चाहिए, लेकिन किसी योग्य नागरिक का नाम भी प्रक्रिया की खामी के कारण बाहर नहीं होना चाहिए। यही संतुलन SIR की सबसे बड़ी परीक्षा है। चुनाव आयोग खुद अपने SIR कार्यक्रम का उद्देश्य यह बताता है कि कोई योग्य नागरिक छूटे नहीं और कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो।
दिल्ली की यह SIR प्रक्रिया अब सिर्फ मतदाता सूची की तकनीकी कवायद नहीं रह गई है। 33 लाख से ज्यादा नोटिस, ड्राफ्ट सूची में 32.8 प्रतिशत की कमी, बड़े राजनीतिक और सार्वजनिक नामों का सामने आना और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना—इन सबने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के केंद्र में ला दिया है। अब सबसे जरूरी चीज है पारदर्शिता: किसका नाम क्यों चिन्हित हुआ, किसका रिकॉर्ड कैसे ठीक हुआ और अंतिम सूची में किसका नाम क्यों रखा या हटाया गया—हर सवाल का स्पष्ट रिकॉर्ड जनता के सामने होना चाहिए। क्योंकि वोटर लिस्ट में एक छोटी सी गलती भी सिर्फ एक नाम की गलती नहीं होती, वह किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा सवाल बन जाती है।



