ओपिनियन/ छत्तीसगढ़ | ABC NATIONAL NEWS | रायपुर | 20 सितंबर 2026
35 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली ई-पॉस मशीनों के लिए 140 करोड़ रुपये से ज्यादा का किराया—अगर सामने आए आंकड़े सही हैं तो इससे बड़ा सवाल सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर क्या हो सकता है? छत्तीसगढ़ की राशन दुकानों में उपभोक्ताओं की पहचान और राशन वितरण के लिए इस्तेमाल हो रही 14,085 ई-पॉस मशीनों को लेकर सामने आई यह जानकारी अब सरकार से सीधे हिसाब मांगती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चार साल में इन मशीनों के लिए करीब 91.78 करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका है और पांच साल के अनुबंध के अंत तक यह राशि 140 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकती है। वहीं मशीनों की सीधी खरीद, डेटा और तकनीकी व्यवस्था की अनुमानित लागत करीब 35 करोड़ रुपये बताई गई है।
अब जरा रुककर सोचिए। करीब 35 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत और 140 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित भुगतान के बीच लगभग 105 करोड़ रुपये का अंतर है। यह कोई छोटी रकम नहीं है। यह वही पैसा है जो सरकार के खजाने में आता है और जिसके पीछे आम आदमी का टैक्स, उसकी मेहनत और उसकी रोजमर्रा की कमाई जुड़ी होती है। इसलिए सवाल बिल्कुल सीधा है—अगर मशीनें खरीदी जा सकती थीं तो पांच साल तक उन्हें किराये पर लेने का फैसला किस आर्थिक गणित के आधार पर किया गया?
सरकार यह जरूर कह सकती है कि किराये में सिर्फ मशीन शामिल नहीं थी, बल्कि सॉफ्टवेयर, 4जी कनेक्टिविटी, तकनीकी सहायता और रखरखाव जैसी सेवाएं भी शामिल थीं। लेकिन फिर सरकार को पूरा हिसाब जनता के सामने रखने में परेशानी क्या है? बताया जाए कि मशीन की कीमत कितनी थी, सॉफ्टवेयर और कनेक्टिविटी पर कितना खर्च था, रखरखाव की लागत कितनी थी, निविदा में कितनी कंपनियां शामिल हुईं और खरीद के मुकाबले रेंटल मॉडल को आर्थिक रूप से बेहतर क्यों माना गया। करोड़ों रुपये के सरकारी खर्च का जवाब भी करोड़ों रुपये के हिसाब से ही होना चाहिए।
मामला सिर्फ 140 करोड़ रुपये तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में 2022 से अब तक मशीन बंद होने, सर्वर डाउन रहने और बायोमीट्रिक रीडर में खराबी जैसी 84 हजार से अधिक शिकायतों का भी जिक्र है। इसके बावजूद 2024 में कंपनी से पेनाल्टी के रूप में केवल 27,218 रुपये काटे जाने की जानकारी सामने आई है। अगर ये आंकड़े सही हैं तो सवाल और गंभीर है। इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें आईं, लोगों को परेशानी हुई, मशीनें बंद हुईं, लेकिन जवाबदेही के नाम पर इतनी मामूली रकम क्यों?
राशन की दुकान कोई सामान्य जगह नहीं है। वहां वह परिवार पहुंचता है जिसके लिए सरकारी राशन उसके महीने की रसोई का सहारा होता है। अगर मशीन खराब है, सर्वर बंद है या बायोमीट्रिक काम नहीं कर रहा है तो परेशानी किसी कॉरपोरेट कार्यालय में बैठे अधिकारी को नहीं, उस गरीब परिवार को होती है जो अपना हक लेने दुकान तक पहुंचा है। इसलिए तकनीकी खराबी को महज तकनीकी समस्या मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार 14,085 मशीनों के लिए करीब 80 इंजीनियरों की व्यवस्था है। यानी औसतन एक इंजीनियर के जिम्मे लगभग 176 मशीनें आती हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में मशीन खराब होने पर उसे ब्लॉक या जिला मुख्यालय तक ले जाने और मरम्मत में समय लगने की बात भी सामने आई है। अगर सरकार करोड़ों रुपये का भुगतान कर रही है तो सेवा व्यवस्था भी उसी स्तर की होनी चाहिए। जनता को यह समझना जरूरी है कि वह किस सुविधा के लिए कितना भुगतान कर रही है और बदले में उसे क्या मिल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी विभागों में खरीद और किराये के फैसले आखिर किस आधार पर होते हैं। निजी कंपनी अपने पैसे से कोई चीज खरीदती है तो वह लागत, उपयोग और भविष्य के खर्च का हिसाब लगाती है। सरकार को तो इससे भी ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि यहां जोखिम किसी निजी व्यक्ति के पैसे का नहीं, करोड़ों नागरिकों के पैसे का होता है। अगर कोई फैसला सरकारी खजाने पर लंबे समय तक बड़ा बोझ डालता है तो उसकी आर्थिक उपयोगिता की जांच भी उतनी ही गंभीर होनी चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल का अनुबंध इसी वर्ष समाप्त होने वाला है और खाद्य विभाग अब मशीनों की सीधी खरीद पर विचार कर रहा है। अगर ऐसा होता है तो पिछले पूरे मॉडल का निष्पक्ष वित्तीय मूल्यांकन होना चाहिए। कितनी मशीनें खरीदी जा सकती थीं? कुल किराया कितना दिया गया? रखरखाव पर कितना खर्च हुआ? कितनी शिकायतें आईं? कितनी पेनाल्टी वसूली गई? अनुबंध की शर्तें क्या थीं? इन सभी सवालों के जवाब दस्तावेजों के साथ जनता के सामने आने चाहिए।
यही वह जगह है जहां विपक्ष से लेकर मीडिया और आम नागरिक तक सभी की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सवाल पूछना किसी सरकार के खिलाफ होना नहीं है। सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है। आज सवाल छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार से है तो कल किसी दूसरी सरकार से भी हो सकता है। जनता को किसी सरकार का बचाव नहीं चाहिए, उसे अपने पैसे का हिसाब चाहिए। सत्ता चाहे किसी की हो, सरकारी खजाना किसी पार्टी की निजी संपत्ति नहीं है।
और अगर सरकार के पास इस खर्च को सही साबित करने के ठोस कारण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अगर रेंटल मॉडल वास्तव में खरीद से बेहतर था तो सरकार को आंकड़ों के साथ यह बताना चाहिए। अगर अनुबंध में सभी जरूरी सेवाएं शामिल थीं तो उनका पूरा लागत विवरण सामने आना चाहिए। और अगर कहीं वित्तीय निर्णय में लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। यही पारदर्शिता है और यही जवाबदेही।
35 करोड़ की मशीन और 140 करोड़ रुपये से ज्यादा के संभावित किराये का यह अंतर अब सिर्फ एक अखबार की पड़ताल का आंकड़ा नहीं रहना चाहिए। यह सरकार के सामने रखा गया सीधा सवाल है—जनता के पैसे का इतना बड़ा अंतर क्यों? 84 हजार से ज्यादा शिकायतों के बाद जवाबदेही इतनी कमजोर क्यों रही? और अगर अब सीधी खरीद पर विचार हो रहा है तो पिछले फैसले का पूरा हिसाब जनता को कब मिलेगा? सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता का पैसा जनता का ही रहता है। उस पैसे का हिसाब मांगना किसी दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, लोकतंत्र में नागरिक होने का अधिकार है।



