क्रिकेट/ खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 सितंबर 2026
क्रिकेट में कुछ कहानियां रिकॉर्ड से बड़ी होती हैं। कुछ खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिनके आंकड़े उनकी महानता की गवाही देते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें वह मौका कभी नहीं मिलता जिसके वे हकदार होते हैं। भारतीय क्रिकेट के ऐसे ही एक दिग्गज हैं सैराज बहुतुले। घरेलू क्रिकेट में 630 विकेट, बल्ले से 6,100 से ज्यादा रन और 9 शतक, लेकिन भारत के लिए खेलने का मौका मिला तो सिर्फ 2 टेस्ट और 8 वनडे का। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जिस खिलाड़ी को अपने दौर में टीम इंडिया में जगह के लिए लगातार इंतजार करना पड़ा, उसी ने वर्षों बाद कोच के रूप में भारतीय टीम को Asian Games में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
90 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती वर्षों में भारतीय स्पिन गेंदबाजी की चर्चा होती थी तो दो नाम सबसे पहले सामने आते थे—अनिल कुंबले और हरभजन सिंह। दोनों ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक लंबा दौर तय किया और टेस्ट क्रिकेट में 1,000 से ज्यादा विकेट हासिल किए। ऐसे समय में किसी दूसरे स्पिनर के लिए भारतीय टीम में लगातार जगह बनाना बेहद मुश्किल था। इसी दौर में सैराज बहुतुले घरेलू क्रिकेट में लगातार अपनी छाप छोड़ रहे थे। वह लेग स्पिन गेंदबाजी के साथ निचले क्रम में उपयोगी बल्लेबाजी भी करते थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें बहुत सीमित मौके मिले।
बहुतुले की कहानी की शुरुआत ही एक ऐसे मैच से हुई जिसे शायद कोई युवा गेंदबाज कभी भूलना न चाहे। 1988 में मुंबई के आजाद मैदान में Harris Shield के सेमीफाइनल में St. Xavier’s High School की ओर से गेंदबाजी करते हुए बहुतुले ने सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली की बल्लेबाजी का सामना किया। दोनों ने मिलकर 664 रन की अविजित साझेदारी की, जो उस समय स्कूली क्रिकेट में विश्व रिकॉर्ड थी। एक युवा गेंदबाज के लिए दो दिन तक इतनी बड़ी साझेदारी को रोक नहीं पाना बेहद कठिन अनुभव रहा होगा, लेकिन यही अनुभव आगे चलकर बहुतुले के खेल में धैर्य और संघर्ष की पहचान बन गया।
इसके बाद बहुतुले ने घरेलू क्रिकेट में ऐसा सफर बनाया जिसे भारतीय क्रिकेट के इतिहास में नजरअंदाज करना मुश्किल है। करीब 18 घरेलू सत्रों में उन्होंने मुंबई के लिए लंबे समय तक शानदार प्रदर्शन किया और बाद में Vidarbha तथा Assam का भी प्रतिनिधित्व किया। 188 प्रथम श्रेणी मैचों में उनके नाम 630 विकेट रहे और उन्होंने 27 बार एक पारी में पांच या उससे ज्यादा विकेट लेने का कारनामा किया। यानी घरेलू क्रिकेट में वह सिर्फ एक उपयोगी खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि लगातार मैच जिताने वाले गेंदबाजों में शामिल थे।
बहुतुले की खासियत सिर्फ गेंदबाजी तक सीमित नहीं थी। वह निचले क्रम में बल्ले से भी योगदान देते थे। उनके नाम प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 6,100 से ज्यादा रन और 9 शतक दर्ज हैं। कई मौकों पर उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में बल्लेबाजी करते हुए अपनी टीम को संकट से बाहर निकाला। मुंबई के साथ उनका दौर कई Ranji Trophy खिताबों का हिस्सा रहा। आंकड़े बताते हैं कि घरेलू क्रिकेट में उन्होंने लंबी अवधि तक लगातार प्रदर्शन किया, लेकिन भारतीय टीम का दरवाजा उनके लिए लगभग हमेशा बंद ही रहा।
इसका सबसे बड़ा कारण उस दौर की भारतीय स्पिन गेंदबाजी की मजबूत स्थिति थी। अनिल कुंबले टीम इंडिया के प्रमुख लेग स्पिनर के रूप में स्थापित थे और बाद में हरभजन सिंह ने दूसरे स्पिनर की जगह मजबूत कर ली। ऐसे में बहुतुले को भारतीय टीम में लंबे समय तक लगातार खेलने का अवसर नहीं मिल पाया। 1997 से 2003 के बीच उन्हें भारत की ओर से सिर्फ 2 टेस्ट और 8 वनडे खेलने का मौका मिला। 630 प्रथम श्रेणी विकेट लेने वाले गेंदबाज के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इतना छोटा अध्याय उनके करियर की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक रहा।
लेकिन बहुतुले ने इसे अपने करियर का अंत नहीं बनने दिया। खिलाड़ी के रूप में जो अनुभव उन्हें मिला, उसे उन्होंने कोचिंग में बदलना शुरू किया। उन्होंने Bengal, Gujarat और Vidarbha जैसी घरेलू टीमों के साथ कोच के रूप में काम किया और IPL में Rajasthan Royals के स्पिन गेंदबाजी कोच की भूमिका भी निभाई। इसके बाद उनका जुड़ाव National Cricket Academy यानी NCA से हुआ, जहां उनका काम भारत के युवा स्पिनरों को तैयार करना था। यहां उनके सामने सिर्फ अपनी टीम को जिताने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि अगली पीढ़ी के गेंदबाजों को तैयार करने की चुनौती थी।
उनके कोचिंग करियर का एक खास पड़ाव 2023 Asian Games में आया। Hangzhou में भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम की गेंदबाजी इकाई की जिम्मेदारी बहुतुले के पास थी और टीम के अंतरिम कोच VVS Laxman थे। वहां की धीमी और चुनौतीपूर्ण पिचों पर स्पिन गेंदबाजों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। रवि बिश्नोई और आर साई किशोर ने मिलकर 9 विकेट लिए और भारतीय गेंदबाजी आक्रमण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत ने अंततः Asian Games में क्रिकेट का स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
बहुतुले की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें खिलाड़ी और कोच के दो अलग-अलग अध्याय दिखाई देते हैं। खिलाड़ी के रूप में उन्हें उस समय भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए कुंबले और हरभजन जैसे स्थापित सितारों के बीच अपनी जगह तलाशनी पड़ी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें सिर्फ कुछ ही मौके मिले, लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनके आंकड़े लगातार उनकी क्षमता की कहानी कहते रहे। बाद में वही क्रिकेट समझ उनके कोचिंग करियर की ताकत बनी और उन्होंने युवा गेंदबाजों के साथ काम करते हुए भारतीय क्रिकेट में एक अलग भूमिका निभाई।
सैराज बहुतुले के करियर को सिर्फ उनके 2 टेस्ट मैचों से नहीं समझा जा सकता। 630 प्रथम श्रेणी विकेट, 6,100 से ज्यादा रन, 9 शतक और फिर कोच के रूप में Asian Games का स्वर्ण—यह सफर बताता है कि क्रिकेट में हर खिलाड़ी की पहचान केवल अंतरराष्ट्रीय मैचों की संख्या से तय नहीं होती। कभी खिलाड़ी मैदान पर इतिहास बनाता है और कभी डगआउट से। बहुतुले ने दोनों भूमिकाओं में अपनी जगह बनाई और उनकी कहानी भारतीय घरेलू क्रिकेट की उस दुनिया की भी याद दिलाती है, जहां कई प्रतिभाएं चमकती हैं, भले ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर लंबा मौका न मिल पाए।



