राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की नीति को लेकर ऐसी टिप्पणी की है, जिसने देश में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की नीति पर एक बार फिर बड़ी बहस छेड़ दी है। गुजरात का उदाहरण सामने रखते हुए अदालत ने कहा कि केवल शराब की बिक्री और सेवन पर पूरी तरह रोक लगा देने से शराब की समस्या खत्म नहीं होती। अगर लोगों में शराब की मांग बनी रहती है, तो कारोबार भूमिगत हो सकता है और उसके साथ अवैध तथा जहरीली शराब का खतरा भी बढ़ सकता है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुजरात में लंबे समय से लागू शराबबंदी के बावजूद सामने आई जहरीली शराब की घटनाओं और उनसे हुई मौतों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल जबरन शराब से दूर रखना शराब की लत का पूरा समाधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य बनने के बाद से कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब की घटनाएं हुई हैं, जिनमें 600 से ज्यादा लोगों की जान गई। अदालत के अनुसार गुजरात में 1960 से सख्त शराबबंदी लागू है, लेकिन इसके बावजूद मेथनॉल से जहरीली शराब तैयार करने और उसके अवैध कारोबार की घटनाएं सामने आती रही हैं। यानी जिस राज्य में शराब की बिक्री पर कानूनन कड़ा प्रतिबंध है, वहां भी शराब से जुड़ी मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इसका एक नतीजा अवैध बाजार और जहरीली शराब के रूप में सामने आया। अदालत ने इसे गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा।
सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के पांच ऐसे पहलुओं की भी चर्चा की जिन्हें वह नीति के संभावित नुकसान के रूप में देखता है। इनमें शराब से मिलने वाले कर राजस्व का नुकसान, शराबबंदी लागू करने में सरकार का अतिरिक्त खर्च, पुलिस और आबकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की संभावना, अवैध तरीके से शराब बनाने का बढ़ना और इसके साथ दूसरे नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार का खतरा शामिल है। अदालत की टिप्पणी का मतलब यह है कि किसी सामाजिक समस्या पर केवल प्रतिबंध लगा देना पर्याप्त नहीं है। प्रतिबंध लागू करने के बाद जमीन पर उसका क्या असर हो रहा है, यह देखना भी उतना ही जरूरी है।
गुजरात की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। शराबबंदी के बावजूद वहां समय-समय पर जहरीली शराब की घटनाएं सामने आती रही हैं। अवैध शराब में मेथनॉल जैसे खतरनाक रसायन की मौजूदगी इसे बेहद जानलेवा बना सकती है। सामान्य शराब की तरह अवैध शराब में गुणवत्ता की कोई भरोसेमंद जांच नहीं होती। यही वजह है कि जब ऐसी शराब किसी इलाके में पहुंचती है तो एक साथ बड़ी संख्या में लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यावहारिक समस्या की ओर ध्यान दिलाया है कि प्रतिबंध के बावजूद अगर मांग बनी रहती है तो कारोबार पूरी तरह गायब होने के बजाय छिपे हुए रास्तों पर जा सकता है।
और अब बात बिहार की। बिहार में 2016 से शराबबंदी लागू है और वहां का अनुभव भी इस बहस को और गंभीर बनाता है। शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब की बरामदगी लगातार होती रही है। 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2016 से बिहार पुलिस औसतन हर दिन करीब 10 हजार लीटर शराब जब्त करती रही है। 2025 में अवैध शराब की बरामदगी करीब 36.39 लाख लीटर तक पहुंची थी, जबकि 2024 में यह करीब 34.61 लाख लीटर थी। यह आंकड़े बताते हैं कि कानूनी प्रतिबंध के बावजूद शराब का अवैध बाजार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
बिहार में मामला केवल अवैध शराब तक भी सीमित नहीं है। शराब की उपलब्धता पर प्रतिबंध के बाद कोडीन वाली खांसी की दवाओं और दूसरे नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को लेकर भी चिंता सामने आई है। 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में शराब के विकल्प के तौर पर कोडीन आधारित कफ सिरप का इस्तेमाल बढ़ने की बात सामने आई और पुलिस तथा दूसरी एजेंसियों ने बड़ी मात्रा में इसकी बरामदगी की। रिपोर्ट के अनुसार शराबबंदी लागू होने के बाद अवैध शराब के साथ-साथ नशीले पदार्थों का कारोबार भी कानून-व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है।
बिहार में जहरीली शराब से होने वाली मौतों का रिकॉर्ड भी इस बहस को और गंभीर बनाता है। अप्रैल 2026 में पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में कथित जहरीली शराब पीने के बाद पांच लोगों की मौत की सूचना सामने आई थी। इस मामले में पुलिस ने कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया था। विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि 2016 में शराबबंदी लागू होने के बाद से राज्य में जहरीली शराब से 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। यह आंकड़ा उनका राजनीतिक दावा है, इसलिए इसे सरकारी आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
बिहार में पहले भी जहरीली शराब की बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। पुलिस के पुराने आंकड़ों के अनुसार 2016 से 2023 के बीच राज्य में जहरीली शराब से जुड़ी 30 घटनाओं में 199 आधिकारिक मौतें दर्ज की गई थीं, जबकि संदिग्ध मौतों को जोड़ने पर संख्या 269 तक बताई गई थी। उसी रिपोर्ट में 2022 में 114 मौतों का आंकड़ा सामने आया था। बाद के वर्षों में भी जहरीली शराब की घटनाएं सामने आती रही हैं।
बिहार की शराबबंदी ने अदालतों पर पड़ने वाले बोझ का सवाल भी खड़ा किया है। जनवरी 2026 में पटना हाईकोर्ट ने एक ही दिन में 463 मामलों में जमानत दी थी और इनमें बड़ी संख्या शराबबंदी कानून से जुड़े मामलों की थी। अदालत ने शराब कानून के मामलों की भारी संख्या के कारण न्यायिक व्यवस्था पर पड़ रहे दबाव का उल्लेख किया था। इससे यह सवाल भी सामने आता है कि शराबबंदी लागू करने के लिए बनाए गए कानून का कितना हिस्सा वास्तविक शराब तस्करों और अवैध कारोबारियों तक पहुंचता है और कितना हिस्सा शराब रखने या पीने के आरोपों में गिरफ्तार लोगों से जुड़े मामलों में अदालतों तक पहुंचता है।
यही वह जगह है जहां गुजरात और बिहार के अनुभव एक बड़े सवाल की ओर ले जाते हैं। शराबबंदी का उद्देश्य शराब की उपलब्धता और उसके कारण होने वाले सामाजिक नुकसान को कम करना हो सकता है, लेकिन अगर शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं होती तो अवैध बाजार के लिए जगह बन सकती है। वहां न गुणवत्ता की गारंटी होती है, न सुरक्षा की और न ही उपभोक्ता को यह पता होता है कि उसे वास्तव में क्या दिया जा रहा है। ऐसी स्थिति में शराबबंदी का सवाल केवल कानून का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पुलिस व्यवस्था, न्यायपालिका, भ्रष्टाचार और अवैध कारोबार का सवाल भी बन जाता है।
हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शराब के अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य और परिवारों पर गंभीर असर पड़ सकता है और शराब की उपलब्धता कम करना कई सरकारों की सार्वजनिक नीति का हिस्सा रहा है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को शराब के सेवन के समर्थन के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत का सवाल यह है कि क्या केवल प्रतिबंध शराब की लत और उससे जुड़ी समस्याओं का पूरा समाधान है। अगर प्रतिबंध के बावजूद मांग और अवैध कारोबार बना रहता है, तो सरकार को यह भी देखना होगा कि उससे पैदा होने वाले दूसरे खतरों को कैसे रोका जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने असल बहस को शराब की दुकान खोलने या बंद करने से कहीं आगे पहुंचा दिया है। सवाल अब यह है कि शराबबंदी के बाद जमीन पर क्या हो रहा है? क्या शराब पूरी तरह खत्म हो रही है या अवैध रास्तों से लोगों तक पहुंच रही है? क्या जहरीली शराब की घटनाएं कम हो रही हैं? क्या पुलिस और अदालतों पर मामलों का बोझ बढ़ रहा है? क्या शराब के स्थान पर दूसरे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ रहा है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या शराब की लत से जूझ रहे लोगों के लिए इलाज, परामर्श और पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था है?
गुजरात और बिहार के अनुभव इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। दोनों राज्यों में शराबबंदी लंबे समय से लागू है, लेकिन अवैध शराब की बरामदगी और जहरीली शराब की घटनाएं यह दिखाती हैं कि कानून के बावजूद अवैध बाजार को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है। बिहार में पुलिस और आबकारी विभाग की लगातार कार्रवाई और बड़ी मात्रा में बरामदगी भी इसी चुनौती को सामने लाती है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक सीधा सवाल देश के सामने रख दिया है—क्या सिर्फ शराबबंदी कर देने से शराब की समस्या खत्म हो जाती है? गुजरात का अनुभव अदालत के सामने है और बिहार में भी प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब, जहरीली शराब और दूसरे नशीले पदार्थों से जुड़ी चुनौतियां सामने आती रही हैं। अब बहस केवल शराब बंद करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि प्रतिबंध के बाद शराब का कारोबार भूमिगत न हो, जहरीली शराब लोगों की जान न ले और शराब की लत से जूझ रहे लोगों को इलाज और मदद भी मिले।



