[the_ad id="179"]
Home » Opinion » पढ़ाई का दबाव या व्यवस्था की विफलता? भारत के छात्रों की बढ़ती आत्महत्याओं के पीछे छिपी पूरी कहानी

पढ़ाई का दबाव या व्यवस्था की विफलता? भारत के छात्रों की बढ़ती आत्महत्याओं के पीछे छिपी पूरी कहानी

ओपिनियन/विश्लेषण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 सितंबर 2026

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। हम अक्सर युवाओं को देश की सबसे बड़ी ताकत, भविष्य की उम्मीद और “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहते हैं। लेकिन इसी युवा पीढ़ी के सामने एक ऐसी त्रासदी खड़ी है जिसे केवल परीक्षा, नंबर या किसी एक घटना से समझना संभव नहीं है। NCRB के Accidental Deaths and Suicides in India (ADSI) 2024 रिपोर्ट (मई 2026 में जारी) के अनुसार, 2024 में भारत में 14,488 छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई, जो 2023 के 13,892 से 4.3% अधिक है। 2014 में यह संख्या 8,068 थी—एक दशक में लगभग 80% की बढ़ोतरी। 2015 से 2024 के बीच 1.15 लाख से अधिक (लगभग 1,15,850) छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जबकि 2014-2024 की पूरी अवधि का कुल आंकड़ा 1,23,918 है।

2024 में छात्रों की आत्महत्याएं देश में दर्ज कुल 1,70,746 आत्महत्याओं का 8.5% थीं (2023 में 8.1%)। यह आंकड़ा लगभग रोजाना 40 छात्र मौतों के बराबर बैठता है—यानी हर घंटे करीब 1.65 और हर 36 मिनट में लगभग एक छात्र। कुल आत्महत्याओं की संख्या 2023 के 1,71,418 से घटकर 2024 में 1,70,746 हुई (0.4% गिरावट), और राष्ट्रीय दर 12.3 से 12.2 प्रति लाख हो गई, फिर भी छात्र आत्महत्याएं तेजी से बढ़ीं। 2020 से 2024 के बीच छात्र आत्महत्याओं में 15.7% वृद्धि हुई (12,526 से 14,488), जबकि कुल आत्महत्याओं में 11.6%।

इन आंकड़ों को पढ़ते समय सावधानी जरूरी है। 14,488 मौतें भयावह हैं, लेकिन इसे सीधे “छात्र आत्महत्या दर” कहना सही नहीं क्योंकि NCRB संख्या बताता है, जबकि उस साल स्कूल-कॉलेज-कोचिंग में कुल छात्रों का एकसमान denominator उपलब्ध नहीं। फिर भी चिंता इसलिए गहरी है कि समस्या को केवल आबादी बढ़ने से नहीं समझाया जा सकता। 2021 में पहली बार छात्र आत्महत्याएं किसानों की संख्या से आगे निकल गईं, और 2021-2024 के बीच छात्रों की 54,513 मौतें किसानों की 43,503 से लगभग 25% अधिक रहीं।

राज्यों की तस्वीर भी महत्वपूर्ण है। 2024 में महाराष्ट्र में 1,909 (13.2%), उत्तर प्रदेश में 1,585 (10.9%), मध्य प्रदेश में 1,447 (10%) और तमिलनाडु में 1,287 (8.9%) छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुईं—ये चार राज्य अकेले लगभग 43% हिस्सा बनाते हैं। इनमें से कई मामलों का संबंध कोचिंग हब, शहरीकरण और रिपोर्टिंग व्यवस्था से भी जुड़ा हो सकता है। लिंग के हिसाब से 7,669 पुरुष और 6,819 महिलाएं थीं—कुल आत्महत्याओं के 73.5:26.5 अनुपात की तुलना में छात्र वर्ग में लैंगिक अंतर कम है। शिक्षा स्तर पर सबसे अधिक मौतें Class 10/secondary (25.6%), Class 12/higher secondary (18.3%), middle (17.7%) और primary (14.4%) स्तर पर हुईं; स्नातक और ऊपर केवल 5.6%।

हर आत्महत्या के पीछे सिर्फ परीक्षा नहीं होती

परीक्षा का दबाव महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी कहानी इससे बड़ी है। 2019-2023 के अखबारी मामलों के विश्लेषण में academic stress, failure, bullying, जाति भेदभाव, ragging, toxic culture, depression, anxiety, financial crisis और online gaming जैसे कई कारण सामने आए। 16-21 वर्ष के छात्र सबसे अधिक प्रभावित थे। NCRB 2024 में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 11,184 आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जिनमें family problems (3,101), love affairs (1,671), illness (1,347) और examination failure (1,071) प्रमुख कारण रहे। समग्र छात्र आत्महत्याओं में examination failure को कुछ रिपोर्टों में 2024 में महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है।

एक छात्र की परेशानी अक्सर कई परतों में बनती है—परीक्षा का दबाव, माता-पिता की उम्मीद, सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता, कोचिंग रैंक, कॉलेज attendance, नौकरी की चिंता और अकेलापन। एक असफल परीक्षा इन दबावों को अचानक बढ़ा सकती है, लेकिन समस्या को सिर्फ “परीक्षा में फेल” कहकर छोटा नहीं किया जा सकता।

माता-पिता की उम्मीद और बच्चे का डर

भारतीय परिवारों में शिक्षा को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का रास्ता माना जाता है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार बचत, शहर बदलाव, hostel फीस और कभी-कभी कर्ज तक लेते हैं। बच्चे को लगता है कि वह पूरे परिवार की उम्मीदों का जवाब दे रहा है—“अगर मैं असफल हुआ तो सब खत्म” वाली सोच यहीं से पैदा होती है। असली जरूरत यह है कि परिवार सिर्फ “कितने नंबर आए?” न पूछे, बल्कि “तुम ठीक हो?” भी पूछे। असफलता को जीवन का अंत नहीं, एक पड़ाव समझाने की संस्कृति बनानी होगी।

Kota सिर्फ एक शहर नहीं, एक warning है

Kota का नाम बार-बार आता है। 2023 में वहां लगभग 26-29 छात्र आत्महत्याएं दर्ज हुईं। प्रशासन के प्रयासों (WHO नॉर्म्स पर gatekeeper ट्रेनिंग, SOS हेल्पलाइन, interactive sessions, Kalika Squad आदि) से 2024 में यह संख्या 17 रह गई—लगभग 50% गिरावट। फिर भी 2025 में मई तक ही 14 मामले सामने आ चुके थे, और NEET-JEE दबाव से जुड़े मामलों की रिपोर्टें जारी रहीं। Kota को पूरी समस्या मान लेना गलत होगा। IIT, NIT, medical colleges, central और private universities तथा स्कूलों से लगातार मामले आ रहे हैं। सवाल उस पूरी educational culture का है जिसमें सफलता को अक्सर score, rank, package या college नाम से मापा जाता है।

IIT जैसे संस्थानों में भी सवाल वही हैं

यह संकट सिर्फ “कमजोर” छात्रों का नहीं। IIT Bombay में 2026 में सात महीनों के अंदर तीन छात्र आत्महत्याएं हुईं। सितंबर 2026 में एक दूसरे वर्ष के छात्र की मौत (परीक्षा में AI/ChatGPT इस्तेमाल से जुड़े आरोप के बाद) के बाद 400 से अधिक छात्रों ने प्रदर्शन किया और transparency तथा accountability की मांग की। संस्थान ने कहा कि disciplinary action शुरू नहीं किया गया था और counselling की गई थी; जांच जारी है।

Supreme Court ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। जुलाई 2025 के आदेश में academic pressure और institutional safeguards पर विस्तृत निर्देश दिए। जनवरी 2026 में Higher Education Institutions के लिए और ठोस निर्देश जारी किए—छात्र की suicide या unnatural death की तुरंत reporting (campus/hostel/PG कहीं भी), residential institutions में 24×7 qualified medical help, vacant faculty और administrative posts भरना, NCRB में school और higher education छात्रों का अलग वर्गीकरण, तथा equity और discrimination रोकने पर जोर। Mental health को केवल counsellor के कमरे तक सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षक कम हों, scholarship देर से मिले, grievance mechanism कमजोर हो, rules कठोर हों और छात्र समस्या कहने में डरे—तो एक counsellor पर्याप्त नहीं।

जाति, भेदभाव और ragging को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

हर छात्र समान पृष्ठभूमि से नहीं आता। पहली पीढ़ी के university students, ग्रामीण/छोटे शहरों से आने वाले, scholarship पर पढ़ने वाले और reserved categories के छात्र campus में पूर्वाग्रह, ragging, bullying या harassment का सामना करते हैं। SC के मामलों में caste-based discrimination से जुड़े आरोप भी महत्वपूर्ण रहे हैं। जनवरी 2026 के निर्देशों में equity पर विशेष ध्यान दिया गया। छात्र की परेशानी को सिर्फ व्यक्तिगत कमजोरी मान लेना गलत है—institutional environment भी distress बढ़ा सकता है।

सबसे बड़ी समस्या: मदद मांगने में शर्म

मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी बाधा stigma है। Anxiety, depression, loneliness या suicidal thoughts के बारे में बात करने में डर होता है कि परिवार कमजोर समझेगा, दोस्त मजाक उड़ाएंगे या कॉलेज “problem student” मानेगा। Counselling को punishment नहीं, routine support की तरह देखना होगा। शिक्षक psychiatrist नहीं बन सकते, लेकिन व्यवहार में गंभीर बदलाव पहचानकर professional help तक पहुंचा सकते हैं।

एक और बड़ा दबाव—पैसा और भविष्य

आज का छात्र सिर्फ परीक्षा नहीं दे रहा। फीस, hostel, coaching, education loan, परिवार की आर्थिक स्थिति और graduation के बाद रोजगार की चिंता साथ चलती है। SC ने scholarship delays और financial distress को चिंता का विषय माना। Career counselling का मतलब सिर्फ “कौन सा course” नहीं होना चाहिए—एक करियर में असफल होने के बाद कई दूसरे रास्ते बताए जाने चाहिए।

परीक्षा में असफलता के बाद दूसरा मौका जिंदगी बचा सकता है

तमिलनाडु का उदाहरण महत्वपूर्ण है। Lancet Regional Health – Southeast Asia विश्लेषण के अनुसार, supplementary examinations जैसी व्यवस्था के बाद exam-failure से जुड़ी आत्महत्याओं में बड़ी गिरावट आई। एक परीक्षा को अंतिम फैसला मत बनाइए। अगर छात्र को पता हो कि वह फिर परीक्षा दे सकता है, course/stream बदल सकता है, gap ले सकता है या दूसरे करियर में जा सकता है, तो failure का psychological weight कम हो सकता है।

सरकार ने कदम उठाए हैं, लेकिन implementation सबसे बड़ा सवाल है

केंद्र सरकार ने National Suicide Prevention Strategy शुरू की है। Tele-MANAS (14416 / 1800-89-14416) 24×7 मानसिक स्वास्थ्य सहायता देता है। अक्टूबर 2022 से मार्च 2026 तक 34 लाख से अधिक कॉल हैंडल किए गए; 53 केंद्र 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 20 भाषाओं में सेवा देते हैं। ज्यादातर कॉलर 18-45 आयु वर्ग के हैं; anxiety, sleep, relationship stress आम हैं, जबकि 3-5% संकट (suicidal thoughts सहित) वाले होते हैं। स्कूलों में life-skills और counselling तथा कॉलेज स्तर पर सेवाओं को National Mental Health Programme के तहत मजबूत करने की बात है।

लेकिन नीति की परीक्षा implementation में होती है। SC के सामने National Task Force survey में Higher Education Institutions की भागीदारी कम रही। जनवरी 2026 के आदेश में data collection और institutional reporting मजबूत करने पर जोर दिया गया।

अब सवाल यह नहीं कि छात्र क्यों मर रहे हैं, सवाल है हम उन्हें बचाने के लिए क्या बदलेंगे

भारत को multi-layered system की जरूरत है—स्कूल स्तर पर trained counsellors, teachers की gatekeeper training, confidential complaint mechanisms और career counselling; coaching centres में student well-being की निगरानी; colleges/universities में independent grievance redressal, anti-ragging, जाति भेदभाव पर प्रभावी कार्रवाई, accessible counselling और emergency medical support; समय पर scholarships; और parents को parenting support।

सबसे जरूरी—सफलता की परिभाषा बदलनी होगी। एक बच्चे का मूल्य marks से नहीं तय हो सकता। एक NEET attempt, JEE rank, semester backlog, failed subject या interview असफलता किसी की पूरी जिंदगी का फैसला नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी वाली मशीन तैयार करना नहीं; ऐसा इंसान तैयार करना है जो असफलता, तनाव, बदलाव और अनिश्चितता से निपटना सीख सके।

भारत के सामने दो रास्ते हैं। एक—हर घटना के बाद कुछ दिन बहस, सोशल मीडिया आक्रोश, committees और फिर सामान्य। दूसरा कठिन—स्कूल से IIT तक व्यवस्था बदलना ताकि मदद मांगना कमजोरी न हो, असफल होना अपराध न हो और किसी छात्र को यह महसूस न हो कि कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।

14,488 का आंकड़ा सिर्फ NCRB की संख्या नहीं। इसके पीछे हजारों परिवार, अधूरे सपने, खाली कमरे और ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल बच्चे से मांगना अन्याय होगा। अगर भारत युवाओं को भविष्य कहता है, तो उस भविष्य की रक्षा केवल रोजगार और आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि उनके मानसिक और सामाजिक सुरक्षा तंत्र से भी करनी होगी।

जरूरी मदद: अगर कोई छात्र या युवा खुद को तत्काल खतरे में महसूस कर रहा है या आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, तो उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत स्थानीय emergency medical service/अस्पताल या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से संपर्क करें। भारत में सरकारी Tele-MANAS 14416 / 1800-89-14416 पर 24×7 मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *