ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | पश्चिम बंगाल | 19 सितंबर 2026
राजनीति में कुछ रिश्ते कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। वे बदलते हैं, टूटते हैं, रास्ते अलग करते हैं और फिर किसी मोड़ पर पुराने रास्ते से दोबारा जुड़ जाते हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और कांग्रेस का रिश्ता ऐसी ही कहानी है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली ममता बनर्जी आज उसी कांग्रेस के उम्मीदवार को नंदीग्राम उपचुनाव में समर्थन दे रही हैं। लगभग तीन दशक की इस राजनीतिक यात्रा को सिर्फ एक उपचुनाव की कहानी मानना शायद इसके बड़े अर्थ को छोटा कर देना होगा।
ममता बनर्जी कभी पश्चिम बंगाल कांग्रेस की तेजतर्रार और उभरती हुई नेताओं में गिनी जाती थीं। लेकिन कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़े और 1998 में उन्होंने अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई। इसके बाद बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और तृणमूल कई बार सहयोगी भी बने और प्रतिद्वंद्वी भी। 2011 में दोनों दलों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त किया। लेकिन बाद के वर्षों में दोनों के रास्ते फिर अलग हो गए। तृणमूल बंगाल में कांग्रेस की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बन गई और कांग्रेस ने भी कई मौकों पर ममता की राजनीति को चुनौती दी।
यही इतिहास आज के घटनाक्रम को दिलचस्प बनाता है। 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर में विधानसभा उपचुनाव होने हैं। शुरुआत में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े ने नंदीग्राम से अपनी उम्मीदवार संचित प्रधान डे को मैदान में उतारा था। लेकिन 18 सितंबर को उन्होंने नामांकन वापस ले लिया। यह फैसला उस समय आया जब चुनाव आयोग ने तृणमूल के दोनों प्रतिद्वंद्वी धड़ों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए थे। इसके बाद ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया।
ममता ने अपने फैसले को खुद INDIA गठबंधन को मजबूत करने से जोड़ा। उनका कहना था कि बेहतर संबंधों के लिए उनकी पार्टी ने नंदीग्राम में कांग्रेस का समर्थन करने का फैसला किया है। रेजीनगर को लेकर उन्होंने कहा कि उस पर बाद में फैसला लिया जाएगा। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और ममता के बीच संवाद की एक नई गुंजाइश पैदा हुई है। लेकिन इसे स्थायी गठबंधन मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
इस घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—राहुल गांधी और ममता बनर्जी के बीच बातचीत। मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम के बीच दोनों नेताओं के संपर्क में आने की बात सामने आई है। तृणमूल के चुनाव चिन्ह और नाम को लेकर चुनाव आयोग के फैसले के बाद राहुल गांधी ने ममता के समर्थन में सार्वजनिक बयान भी दिया था। राहुल ने चुनाव आयोग और BJP पर पार्टियों को विभाजित करने और चुनाव चिन्ह छीनने के आरोप लगाए। ये राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप हैं; चुनाव आयोग ने अपने फैसले को TMC के अंदर चल रहे संगठनात्मक विवाद के संदर्भ में लिया है और अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
यहीं से कहानी और संवेदनशील हो जाती है। ममता द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने के कुछ ही घंटों बाद मिलन प्रधान की गिरफ्तारी हो गई। उन्हें 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक पुराने हत्या मामले में गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट है। ममता और कांग्रेस नेताओं ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक दबाव से जोड़ा। दूसरी ओर, गिरफ्तारी पुलिस की कानूनी कार्रवाई के रूप में सामने आई है। इसलिए इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य था या नहीं, इसका निष्कर्ष केवल गिरफ्तारी के समय के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा।
लेकिन राजनीति का अर्थ केवल आरोप और जवाब नहीं होता। कई बार घटनाओं का क्रम भी राजनीतिक संदेश देता है। एक तरफ चुनाव आयोग के फैसले से तृणमूल का पुराना नाम और चिन्ह तत्काल इस्तेमाल से बाहर हो गया, दूसरी तरफ ममता खेमे के उम्मीदवार ने नंदीग्राम से नामांकन वापस ले लिया और उसके बाद कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन मिला। इसी बीच कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी ने विवाद को और बढ़ा दिया। इन घटनाओं ने बंगाल के आगामी उपचुनाव को सामान्य चुनावी मुकाबले से कहीं ज्यादा चर्चा का विषय बना दिया है।
ममता के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तृणमूल के भीतर संगठनात्मक संकट चल रहा है। चुनाव आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी धड़ों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए हैं, जबकि मूल नाम और आरक्षित चिन्ह पर अंतिम विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। ममता के नेतृत्व वाले धड़े ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए भी नंदीग्राम का घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। लंबे समय से बंगाल में उसका राजनीतिक आधार कमजोर हुआ है और तृणमूल के साथ उसका संबंध लगातार उतार-चढ़ाव से गुजरता रहा है। ऐसे में ममता का कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा होना दोनों दलों के संबंधों में एक नया अध्याय खोल सकता है। लेकिन इसका वास्तविक राजनीतिक अर्थ उपचुनाव के बाद ही ज्यादा साफ होगा।
यहां इतिहास एक अजीब चक्र पूरा करता दिखाई देता है। 1998 में ममता कांग्रेस से अलग होकर अपना राजनीतिक रास्ता बनाने निकली थीं। आज वही ममता कांग्रेस के उम्मीदवार के समर्थन में खड़ी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब वह कांग्रेस से अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की लड़ाई लड़ रही थीं और आज उनका फैसला विपक्षी राजनीति के व्यापक समीकरण और बदलते राजनीतिक हालात के बीच लिया गया है।
फिर भी इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक नेता की जीत या किसी दूसरे की हार के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। राजनीति में गठबंधन परिस्थितियों के साथ बदलते हैं। आज का सहयोग कल स्थायी रिश्ता बने, यह जरूरी नहीं; और आज का प्रतिद्वंद्वी भविष्य में सहयोगी न बने, यह भी राजनीति में असंभव नहीं।
ममता और कांग्रेस की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह केवल दो दलों की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की बदलती प्रकृति की कहानी है—जहां पुराने विरोधी नए सवालों के सामने फिर बातचीत की मेज पर आ सकते हैं। नंदीग्राम का उपचुनाव इस नए समीकरण की पहली बड़ी परीक्षा नहीं, बल्कि उसके उभरने का एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है।



