अंतरराष्ट्रीय/ व्यापार/ रोजगार | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 19 सितंबर 2026
अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे भारतीय IT प्रोफेशनल्स और विदेशी कुशल कर्मचारियों के लिए H-1B वीजा को लेकर नई चुनौती सामने आई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने $100,000 की अतिरिक्त H-1B भुगतान शर्त को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है, यानी यह व्यवस्था अब सितंबर 2027 तक जारी रहेगी। यह फैसला ऐसे समय आया है जब इस शुल्क को लेकर अमेरिकी अदालतों में कानूनी लड़ाई चल रही है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि $100,000 कोई सामान्य H-1B आवेदन शुल्क नहीं है। यह ट्रंप प्रशासन द्वारा कुछ नए H-1B कर्मचारियों के अमेरिका में प्रवेश पर लगाई गई अतिरिक्त भुगतान शर्त है। 2025 में लागू की गई मूल व्यवस्था के तहत अमेरिका के बाहर मौजूद कुछ नए H-1B कर्मचारियों के लिए नियोक्ता को यह भुगतान करना पड़ता है। मौजूदा विस्तार इसे सितंबर 21, 2027 तक जारी रखता है। कुछ श्रेणियों को इससे अपवाद भी दिया गया है।
इस फैसले के साथ ट्रंप ने एक और महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अब H-1B आवेदन पर विचार करते समय संबंधित अमेरिकी एजेंसियों को यह देखना होगा कि जिस कंपनी ने विदेशी कर्मचारी के लिए आवेदन किया है, उसने पिछले एक साल में समान पदों पर अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना बनाई है। यानी किसी कंपनी द्वारा अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरी कम करने और उसी समय H-1B कर्मचारियों को नियुक्त करने के मामले में ज्यादा जांच हो सकती है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि H-1B कार्यक्रम का कुछ नियोक्ताओं और IT आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा दुरुपयोग हुआ है। व्हाइट हाउस का आरोप है कि कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों के इस्तेमाल से अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियों और वेतन पर दबाव पड़ता है। प्रशासन का कहना है कि $100,000 भुगतान और H-1B चयन प्रक्रिया में किए गए बदलावों से कम वेतन वाली नियुक्तियों में कमी आई है। व्हाइट हाउस के अनुसार, बड़ी IT आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा दाखिल H-1B registrations में 92% की कमी आई है। यह आंकड़ा प्रशासन का अपना आकलन है।
दूसरी तरफ, इस नीति के खिलाफ कारोबारी समूह और अन्य पक्षों का तर्क है कि अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और दूसरे उद्योगों को उच्च-कुशल विदेशी कर्मचारियों की जरूरत होती है। भारतीय IT उद्योग संगठन Nasscom ने भी अमेरिका से H-1B कार्यक्रम के जरिए मिलने वाले कौशल लाभ को ध्यान में रखने की अपील की है। उसके अनुसार H-1B व्यवस्था अमेरिका में मौजूद कुछ कौशल संबंधी कमियों को पूरा करने में मदद करती है।
सबसे बड़ा सवाल फिलहाल अदालत में चल रही लड़ाई है। जून 2026 में एक अमेरिकी संघीय अदालत ने $100,000 H-1B शुल्क व्यवस्था को गैरकानूनी करार देते हुए उसे रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला अपील अदालत तक पहुंचा और सरकार शुल्क व्यवस्था को बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है। इसलिए ट्रंप का नया आदेश जारी हो जाने के बावजूद इसकी वास्तविक कानूनी स्थिति अदालतों के फैसलों पर निर्भर करेगी।
भारतीयों के लिए यह मुद्दा इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से H-1B कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी देश रहा है। भारतीय IT कंपनियां और भारतीय पेशेवर अमेरिकी टेक्नोलॉजी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। हालांकि, मौजूदा व्यवस्था का असर हर भारतीय H-1B धारक पर समान रूप से नहीं पड़ेगा। खास तौर पर पहली बार अमेरिका जाने वाले और अमेरिका के बाहर मौजूद नए H-1B कर्मचारियों पर इसका प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है, जबकि मौजूदा H-1B धारकों के विस्तार या कुछ अन्य श्रेणियों के लिए अलग नियम लागू हैं।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। अगस्त 2026 में ट्रंप प्रशासन ने H-1B के लिए $103,265 के स्थायी शुल्क का प्रस्ताव भी रखा था। यह अलग प्रक्रिया के तहत प्रस्तावित नियम है और अभी इसे अंतिम नियम नहीं माना जा सकता। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो H-1B कार्यक्रम की लागत को लेकर बहस और तेज हो सकती है।
इस पूरी कहानी का असली सवाल अमेरिका की जरूरत और उसकी इमिग्रेशन नीति के बीच संतुलन का है। ट्रंप प्रशासन अमेरिकी नौकरियों और वेतन की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है, जबकि अमेरिकी उद्योगों और भारतीय IT क्षेत्र की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि उच्च-कुशल विदेशी कर्मचारियों की जरूरत को नजरअंदाज करने से कंपनियों की क्षमता प्रभावित हो सकती है। आने वाले महीनों में अदालतों के फैसले, प्रस्तावित नए शुल्क और अमेरिकी कंपनियों की भर्ती रणनीति तय करेंगे कि H-1B कार्यक्रम का भविष्य किस दिशा में जाता है।



