ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 19 सितंबर 2026
ग्रीनलैंड दुनिया के नक्शे पर बर्फ से ढका एक विशाल द्वीप दिखाई देता है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह सिर्फ बर्फ और समुद्र का इलाका नहीं है। यह सुरक्षा, आर्कटिक की रणनीति, रूस-चीन की बढ़ती मौजूदगी, खनिज संसाधनों और भविष्य की वैश्विक ताकत से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। यही वजह है कि ट्रंप पिछले कई वर्षों से ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की बात करते रहे हैं। 2019 में भी उन्होंने इसे खरीदने की संभावना पर चर्चा कराई थी और सत्ता में लौटने के बाद उनकी भाषा और ज्यादा स्पष्ट और आक्रामक हुई। हालांकि आज की स्थिति यह है कि अमेरिका ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक सुरक्षा समझौते की घोषणा की है, ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा या उसका अमेरिका में विलय नहीं हुआ है।
तो आखिर सवाल यही है—ट्रंप ग्रीनलैंड को लेकर इतने गंभीर क्यों हैं?
सबसे पहली वजह है भूगोल। ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच आर्कटिक क्षेत्र में ऐसी जगह स्थित है, जहां से उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अमेरिका के लिए यह रूस की गतिविधियों पर नजर रखने, मिसाइल चेतावनी प्रणाली और उत्तर अटलांटिक की सुरक्षा के लिहाज से अहम है। ग्रीनलैंड के पास से गुजरने वाला क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक संपर्क का हिस्सा है। अमेरिका के पास वहां पहले से ही Pituffik Space Base है, जिसे पहले Thule Air Base कहा जाता था। 1951 के अमेरिका-डेनमार्क समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य सुविधाएं रखने के व्यापक अधिकार मिले हुए हैं। यानी ट्रंप जिस जगह को अपने नियंत्रण में लाना चाहते हैं, वहां अमेरिका की सैन्य मौजूदगी पहले से है।
दूसरी वजह है रूस और चीन। आर्कटिक तेजी से बदल रहा है। बर्फ पिघलने के साथ नए समुद्री रास्तों और संसाधनों तक पहुंच की संभावना बढ़ रही है। अमेरिका नहीं चाहता कि रूस या चीन ग्रीनलैंड में ऐसी सैन्य या आर्थिक मौजूदगी बनाए जो भविष्य में अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए चुनौती बन सके। ट्रंप प्रशासन लगातार यही तर्क देता रहा है कि ग्रीनलैंड को पश्चिमी सुरक्षा ढांचे में मजबूती से बनाए रखना जरूरी है। नए प्रस्तावित समझौते में भी अमेरिका के विरोधियों को वहां सैन्य अड्डे बनाने और संवेदनशील निवेश करने से रोकने की बात सामने आई है।
तीसरी बड़ी वजह है खनिज संसाधन। ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों और rare earth elements के बड़े भंडार होने की संभावना है। आज की दुनिया में ये खनिज केवल मोबाइल फोन या इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि आधुनिक रक्षा तकनीक, ऊर्जा तकनीक और उन्नत औद्योगिक उत्पादन में भी इनका महत्व है। खास बात यह है कि चीन का rare earth supply chains में मजबूत स्थान है। ऐसे में अमेरिका के लिए वैकल्पिक संसाधनों तक पहुंच रणनीतिक महत्व रखती है। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि ग्रीनलैंड के अधिकांश खनिज संसाधनों का दोहन बेहद कठिन परिस्थितियों में होगा—कठोर मौसम, बर्फ, सीमित बुनियादी ढांचा और ऊंची लागत इसके बड़े कारण हैं।
चौथी वजह है आर्कटिक का भविष्य। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ में बदलाव हो रहा है और इससे भविष्य में समुद्री परिवहन तथा संसाधनों तक पहुंच के नए रास्ते खुल सकते हैं। इसका मतलब है कि आज जो इलाका दुनिया के दूर-दराज हिस्से जैसा लगता है, वह आने वाले दशकों में अंतरराष्ट्रीय रणनीति का प्रमुख क्षेत्र बन सकता है। अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय देश इसी बदलते आर्कटिक में अपने-अपने हित सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए ग्रीनलैंड का महत्व केवल आज की राजनीति तक सीमित नहीं है।
लेकिन यहां एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या रणनीतिक महत्व का मतलब किसी दूसरे देश की जमीन पर कब्जे का अधिकार है? इसका जवाब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इतना आसान नहीं है। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य का स्वशासी हिस्सा है और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को डेनमार्क भी स्वीकार करता है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने नए समझौते के संदर्भ में साफ कहा है कि उनकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता कायम रहेगी। समझौते को लागू होने से पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदीय प्रक्रिया से भी गुजरना होगा।
यही कारण है कि ट्रंप की ताजा घोषणा को सीधे ‘ग्रीनलैंड पर कब्जा’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। ट्रंप ने इसे अमेरिका की सुरक्षा पर स्थायी नियंत्रण और बड़ी सैन्य मौजूदगी के रूप में पेश किया है, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड इसे ऐसा समझौता बता रहे हैं जो उनकी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार को बनाए रखता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, समझौते का पूरा आधिकारिक पाठ अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है और अंतिम रूप से लागू होने के लिए संसदीय प्रक्रिया बाकी है।
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यही है कि ट्रंप का लक्ष्य और मौजूदा समझौता एक ही चीज नहीं हैं। ट्रंप लंबे समय से अमेरिकी नियंत्रण या अधिग्रहण की बात करते रहे हैं, लेकिन अब जो समझौता सामने आया है वह कम से कम अभी तक ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा नहीं बनाता। इसके बजाय अमेरिका को वहां सुरक्षा और सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का रास्ता मिलता दिखाई दे रहा है, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड अपनी संप्रभुता बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं।
इसलिए ग्रीनलैंड की कहानी को सिर्फ ‘ट्रंप को एक बड़ा द्वीप चाहिए’ के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके पीछे आर्कटिक की बदलती भू-राजनीति, रूस और चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, सैन्य निगरानी, दुर्लभ खनिजों की दौड़ और भविष्य के समुद्री रास्तों की अहमियत—सब एक साथ काम कर रहे हैं। लेकिन अंतिम सवाल फिर भी वही रहेगा: क्या किसी इलाके की रणनीतिक कीमत उसके लोगों की इच्छा और संप्रभुता से बड़ी हो सकती है? ग्रीनलैंड का आने वाला राजनीतिक भविष्य इसी सवाल के जवाब से तय होगा।



