राष्ट्रीय/मध्य प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | इंदौर | 19 सितंबर 2026
राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर इंदौर में एक बार फिर राजनीतिक टकराव सामने है। कांग्रेस का आरोप है कि कार्यक्रम में छात्रों की भागीदारी रोकने के लिए कोचिंग सेंटरों और हॉस्टल संचालकों पर दबाव बनाया जा रहा है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया है कि कुछ संचालकों से छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने वाले स्व-प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश पुलिस का कहना है कि राहुल गांधी को Z-प्लस सुरक्षा प्राप्त है और कार्यक्रम की सुरक्षा के लिए आयोजकों से विस्तृत जानकारी और जरूरी इंतजाम मांगे गए हैं। पुलिस ने 29 बिंदुओं की सुरक्षा सूची भी दी है।
लेकिन इंदौर का यह विवाद सिर्फ एक दिन की घटना नहीं है। राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ मुहिम 17 जून को कोटा से शुरू हुई थी। इसके बाद देहरादून, प्रयागराज और पुणे में कार्यक्रम हुए। राहुल गांधी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इस अभियान का फोकस छात्रों की शिक्षा, पेपर लीक, फीस, रोजगार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों पर है। कोटा के बाद देहरादून, प्रयागराज और फिर पुणे में कार्यक्रम आगे बढ़े और अब इसका अगला पड़ाव इंदौर है।
पुणे में भी कार्यक्रम से पहले राजनीतिक विवाद हुआ था। BJP ने कार्यक्रम की फंडिंग और छात्रों की भागीदारी को लेकर सवाल उठाए थे। कांग्रेस ने इसे कार्यक्रम को लेकर BJP की बेचैनी के रूप में पेश किया। हालांकि, इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों को अलग-अलग पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पुणे पुलिस ने अंततः कार्यक्रम की अनुमति दी थी और करीब 30 शर्तें रखी थीं।
इंदौर में विवाद और बढ़ गया क्योंकि कार्यक्रम का स्थान भी बदला। कांग्रेस का कार्यक्रम पहले जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में होना था, लेकिन अनुमति से जुड़े मुद्दों के बाद इसे दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस ने रीजनल पार्क के पास वैकल्पिक जगह पर आयोजन की तैयारी की। इस जमीन के इस्तेमाल को लेकर भी प्रशासन और कांग्रेस के बीच भुगतान और निर्धारित अवधि से पहले जमीन के इस्तेमाल का विवाद सामने आया। इंदौर विकास प्राधिकरण ने कांग्रेस से करीब ₹4.03 लाख अतिरिक्त भुगतान की मांग की, जबकि कांग्रेस ने इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव से जोड़कर सवाल उठाए।
अब कार्यक्रम से ठीक पहले कोचिंग सेंटर और हॉस्टल संचालकों से जुड़े स्व-प्रमाणपत्र ने विवाद को और गंभीर बना दिया है। पवन खेड़ा ने आरोप लगाया कि पहले राहुल गांधी के कार्यक्रम के लिए सुरक्षा निर्देशों में उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से जुड़े वर्मा आयोग का संदर्भ आया और अब कोचिंग सेंटरों तथा हॉस्टल संचालकों से छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को कहा जा रहा है। कांग्रेस इसे दबाव की कड़ी बता रही है।
वहीं मध्य प्रदेश पुलिस का पक्ष अलग है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार वर्मा आयोग की सिफारिशें देश में हाई-प्रोफाइल लोगों की सुरक्षा से जुड़े Advanced Security Liaison यानी ASL प्रोटोकॉल का हिस्सा हैं। पुलिस का कहना है कि 29 बिंदुओं वाली सूची राहुल गांधी की Z-प्लस सुरक्षा और कार्यक्रम की भीड़ को ध्यान में रखते हुए जारी की गई है। BJP के राज्य प्रवक्ता ने भी कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि कार्यक्रम की सुरक्षा और भीड़ से जुड़ी जानकारी प्रशासन को सही तरीके से देना जरूरी है।
कांग्रेस का सवाल हालांकि राजनीतिक रूप से बड़ा है—अगर किसी कार्यक्रम में हजारों छात्र शामिल होने वाले हैं तो सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रशासन और आयोजकों के बीच किस तरह तय होगी? क्या सुरक्षा के नाम पर ऐसी शर्तें लगाई जानी चाहिए जिनसे छात्र कार्यक्रम में आने से पहले ही पीछे हट जाएं? और क्या किसी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होना छात्रों के लिए इतना जटिल बनाया जाना चाहिए कि कोचिंग और हॉस्टल संचालकों को अलग से जिम्मेदारी के दस्तावेज देने पड़ें? इन सवालों पर कांग्रेस सरकार और पुलिस से जवाब मांग रही है।
राहुल गांधी के समर्थकों के लिए ‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ एक राजनीतिक सभा नहीं, बल्कि युवाओं के सवालों का मंच है। कांग्रेस का कहना है कि पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, महंगी शिक्षा और रोजगार की कमी जैसे मुद्दों से जूझ रही युवा पीढ़ी को अपनी बात सीधे रखने का मौका मिलना चाहिए। राहुल गांधी की मुहिम की आधिकारिक वेबसाइट भी पेपर लीक, शिक्षा की लागत और रोजगार के सवालों को अभियान के प्रमुख मुद्दों के तौर पर रखती है।
यही वजह है कि इंदौर में उठे विवाद का असर सिर्फ एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। एक तरफ BJP और प्रशासन सुरक्षा, अनुमति और नियमों की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस इसे छात्रों की आवाज और राजनीतिक भागीदारी के सवाल से जोड़ रही है। किस पक्ष का दावा सही है, इसका अंतिम निष्कर्ष उपलब्ध दस्तावेजों और प्रशासनिक कार्रवाई के पूरे रिकॉर्ड से ही निकलेगा। लेकिन इतना साफ है कि ‘छात्रों की गूंज’ अब मध्य प्रदेश की राजनीति में भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है।



