राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 सितंबर 2026
विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA संशोधन विधेयक, 2026 पर संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की पहली बैठक में कई अहम सवाल उठे। बैठक में गृह मंत्रालय ने प्रस्तावित बदलावों को विदेशी योगदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बताया, जबकि विपक्षी सदस्यों ने खास तौर पर उस प्रावधान पर सवाल उठाए जिसके तहत किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या अपने-आप समाप्त होने पर उसकी विदेशी सहायता और उससे बनाई गई संपत्तियां एक सरकारी नियुक्त ‘नामित प्राधिकरण’ (Designated Authority) के अधीन चली जाएंगी।
बैठक में सत्तापक्ष के सदस्यों के सवाल मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहे कि विदेशी चंदे का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है और उसकी निगरानी कैसे बेहतर बनाई जा सकती है। वहीं विपक्षी सदस्यों ने संपत्तियों पर सरकार के प्रस्तावित अधिकार और संगठन को अपना पक्ष रखने के अवसर को लेकर सवाल उठाए।
विवाद का प्रमुख बिंदु ‘Designated Authority’ से जुड़ा प्रावधान है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संगठन खुद उसे वापस कर देता है या प्रमाणपत्र की अवधि समाप्त होने पर वह स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, तो उसके पास मौजूद विदेशी योगदान और उस पैसे से बनाई गई संपत्तियां नामित प्राधिकरण के अधीन जा सकती हैं।
विपक्षी सदस्यों ने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में संगठन को पहले सुनवाई का मौका किस तरह मिलेगा और संपत्तियों पर अंतिम फैसला किस प्रक्रिया के तहत होगा। बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि क्या किसी संगठन की संपत्ति अपने कब्जे में लेने से पहले न्यायिक निर्धारण या स्वतंत्र प्रक्रिया जरूरी होनी चाहिए।
गृह मंत्रालय ने अपनी ओर से प्रस्तावित संशोधनों का बचाव करते हुए कहा कि इनका उद्देश्य विदेशी योगदान के इस्तेमाल को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। मंत्रालय का तर्क है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल नियमों के मुताबिक हो और उसका दुरुपयोग न हो, इसके लिए निगरानी की व्यवस्था मजबूत होना जरूरी है।
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act भारत में विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए नियम तय करता है। इसके तहत गैर-सरकारी संगठन और अन्य पात्र संस्थाएं विदेश से मिलने वाले चंदे का इस्तेमाल निर्धारित नियमों और उद्देश्यों के अनुसार कर सकती हैं। इसलिए इसमें होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सामाजिक संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और विदेशी फंड प्राप्त करने वाली अन्य संस्थाओं के कामकाज पर असर डाल सकता है।
JPC की पहली बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अब प्रस्तावित कानून के अलग-अलग प्रावधानों पर सदस्यों के सवाल सामने आ रहे हैं। खासकर विदेशी फंड के इस्तेमाल, लाइसेंस की स्थिति और फंड से बनाई गई संपत्तियों को लेकर समिति के सामने आगे और चर्चा होने की संभावना है।
फिलहाल यह विधेयक संसदीय जांच और विचार-विमर्श की प्रक्रिया में है। JPC की चर्चाओं और मंत्रालय के जवाबों के आधार पर आगे इसमें बदलाव की संभावना भी बनी हुई है। इसलिए प्रस्तावित प्रावधानों को अंतिम कानून मानना अभी उचित नहीं होगा। समिति की आगे की बैठकों में यह स्पष्ट हो सकता है कि ‘Designated Authority’ की शक्तियों, सुनवाई की प्रक्रिया और संपत्तियों पर कार्रवाई के लिए कौन-से सुरक्षा उपाय प्रस्तावित किए जाते हैं।



