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महंगा ही बेहतर नहीं: भारतीय थाली में लौट रहे देसी अनाज और पारंपरिक स्वाद

लाइफस्टाइल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 सितंबर 2026

भारतीय खाने की दुनिया में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। शहरों में रहने वाले कई उपभोक्ता अब सिर्फ स्वाद और कीमत देखकर सामान नहीं खरीद रहे, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि उनका खाना कहां से आया, कैसे तैयार हुआ और उसमें कितनी प्रोसेसिंग हुई है। ठंड में निकाला गया तेल, देसी चावल, पुराने अनाज, स्थानीय दालें, प्राकृतिक मसाले और छोटे किसानों से सीधे मिलने वाले उत्पाद अब कुछ शहरी परिवारों की रसोई का हिस्सा बन रहे हैं।

दक्षिण दिल्ली में हुई एक हालिया डिनर पार्टी इसका छोटा-सा उदाहरण बनी। टेक कंसल्टेंट और होम कुक नीरज सिंह ने बताया कि उन्होंने खाना बनाने में सामान्य रिफाइंड तेल की जगह कोल्ड-प्रेस्ड मूंगफली तेल का इस्तेमाल शुरू किया है। उनका मानना है कि कम प्रोसेस किए गए विकल्प उनकी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बेहतर हो सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उन्हें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।

इसी बातचीत में विज्ञापन क्षेत्र से जुड़ी पाखी शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपनी रसोई में बासमती चावल की जगह असम की पारंपरिक जोha चावल जैसी किस्मों को जगह दी है। पहले वह घर जाते समय यह चावल साथ लाती थीं, लेकिन अब ऑनलाइन खरीदती हैं। उनकी शिकायत यह है कि स्थानीय और पारंपरिक किस्म के लिए उन्हें सामान्य चावल की तुलना में लगभग दोगुनी कीमत तक देनी पड़ती है।

कॉफी की दुनिया में भी यही बदलाव दिखाई दे रहा है। कुछ उपभोक्ता अब बड़े ब्रांड की कॉफी के बजाय किसी खास इलाके या छोटे फार्म से आने वाली single-origin coffee खरीदना पसंद कर रहे हैं। यानी उपभोक्ता के लिए सिर्फ पैकेट पर लिखा ‘ऑर्गेनिक’, ‘नेचुरल’ या ‘प्रीमियम’ काफी नहीं है। वह यह भी जानना चाहता है कि उत्पाद वास्तव में कहां पैदा हुआ और किसान से लेकर उसकी रसोई तक वह किस रास्ते से पहुंचा।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। एक तरफ लोगों में भोजन की गुणवत्ता और उसकी उत्पत्ति को लेकर जागरूकता बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया और ऑनलाइन खरीदारी ने देश के अलग-अलग हिस्सों के पारंपरिक उत्पादों को शहरों के उपभोक्ताओं तक पहुंचाना आसान कर दिया है। अब असम का पारंपरिक चावल, कर्नाटक के किसी छोटे फार्म की कॉफी या किसी इलाके का पारंपरिक अनाज दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में बैठे ग्राहक के लिए कुछ क्लिक की दूरी पर मिल सकता है।

लेकिन यहां एक जरूरी सवाल भी है—क्या महंगा मतलब बेहतर? इसका जवाब हमेशा ‘हां’ नहीं हो सकता। किसी उत्पाद की कीमत अधिक होने के कई कारण हो सकते हैं। छोटी मात्रा में उत्पादन, किसानों से सीधे खरीद, पैकेजिंग, परिवहन और कम उत्पादन वाली पारंपरिक किस्में महंगी हो सकती हैं। लेकिन केवल महंगी कीमत देखकर किसी खाद्य पदार्थ को अपने आप ज्यादा पौष्टिक या स्वास्थ्य के लिए बेहतर मान लेना सही नहीं होगा।

मसलन, कोल्ड-प्रेस्ड तेल का उत्पादन तरीका अलग हो सकता है, लेकिन किसी भी तेल की कुल मात्रा और इस्तेमाल का तरीका भी महत्वपूर्ण है। इसी तरह पारंपरिक चावल की किसी किस्म का स्वाद और सांस्कृतिक महत्व अलग हो सकता है, लेकिन उसे सिर्फ ‘देसी’ या ‘ऑर्गेनिक’ कह देने से वह अपने आप हर व्यक्ति के लिए ज्यादा पौष्टिक साबित नहीं हो जाता। उपभोक्ता को लेबल, प्रमाणन, उत्पादन की जानकारी और उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता भी देखनी चाहिए।

इस नए चलन का एक दूसरा पहलू किसानों से भी जुड़ा है। अगर उपभोक्ता पारंपरिक फसलों और स्थानीय किस्मों की मांग बढ़ाता है तो किसानों के लिए ऐसी फसलों को बचाए रखने का आर्थिक कारण मजबूत हो सकता है। भारत में कई पारंपरिक अनाज और चावल की किस्में सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की कृषि परंपरा और स्थानीय संस्कृति का हिस्सा भी हैं।

साथ ही, ‘organic’ और ‘indigenous’ जैसे शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच traceability यानी उत्पाद की पूरी यात्रा को समझना भी जरूरी हो जाता है। ग्राहक को यह पता होना चाहिए कि जिस चीज के लिए वह सामान्य बाजार से दो या तीन गुना ज्यादा पैसा दे रहा है, उसके पीछे वास्तव में क्या अतिरिक्त मूल्य है।

इसलिए भारतीय रसोई में लौटते देसी अनाज, पारंपरिक तेल और स्थानीय उत्पाद सिर्फ एक फैशन नहीं, बल्कि भोजन के साथ उपभोक्ता के बदलते रिश्ते का संकेत हैं। लोग अब अपनी थाली के पीछे की कहानी जानना चाहते हैं। लेकिन समझदारी यही होगी कि ‘पारंपरिक’, ‘ऑर्गेनिक’ और ‘महंगा’—इन तीनों को अपने आप ‘बेहतर’ मानने के बजाय जानकारी के आधार पर चुनाव किया जाए।

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