राष्ट्रीय/ व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026
यूपीआई शुल्क के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने के केंद्र के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता अंजन दत्ता ने जनहित याचिका दायर कर केंद्र की 14 सितंबर की अधिसूचना और एमडीआर व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। याचिका में कहा गया है कि इतनी बड़ी वित्तीय व्यवस्था लागू करने से पहले पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श होना चाहिए था।
15 अक्टूबर से लागू होनी है 0.4% फीस
सरकार की नई व्यवस्था के अनुसार 15 अक्टूबर से दुकानदारों को किए जाने वाले ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाना है। वहीं ₹2,000 तक के यूपीआई भुगतान पर एमडीआर नहीं लगेगा। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई ट्रांसफर भी इस शुल्क के दायरे में नहीं बताए गए हैं।
छोटे कारोबारियों के लिए क्या व्यवस्था है?
याचिका में इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि छोटे व्यापारियों को कुछ राहत दी गई है। यूपीआई क्यूआर कोड के जरिए हर महीने ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को एमडीआर से छूट दी गई है। यानी नई व्यवस्था का असर मुख्य रूप से उन व्यापारी लेन-देन पर पड़ना है जो निर्धारित सीमा से ऊपर जाते हैं।
याचिका में पारदर्शिता और प्रक्रिया पर सवाल
याचिकाकर्ता का मुख्य सवाल सिर्फ शुल्क की दर को लेकर नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया को लेकर भी है जिसके जरिए यह व्यवस्था लाई गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि एमडीआर लागू करने से पहले पर्याप्त सार्वजनिक चर्चा और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। अब सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए अपनाई गई कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया उचित थी या नहीं।
आरबीआई का तर्क—यूपीआई को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना जरूरी
दूसरी तरफ, भारतीय रिजर्व बैंक ने बड़े मूल्य वाले यूपीआई लेन-देन पर एमडीआर की शुरुआत को यूपीआई की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता से जोड़ा है। आरबीआई के अनुसार इस तरह की व्यवस्था यूपीआई प्रणाली को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकती है। यानी सरकार और आरबीआई का पक्ष व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता पर केंद्रित है, जबकि याचिका में प्रक्रिया और उपभोक्ता-व्यापारी प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि ₹2,000 की सीमा के ऊपर शुल्क की व्यवस्था वास्तव में किस तरह लागू होगी और इसका अंतिम आर्थिक बोझ किस पर पड़ेगा। व्यापारी शुल्क का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूलते हैं या नहीं, यह बाजार की प्रतिस्पर्धा और भुगतान सेवा प्रदाताओं की व्यवस्था पर भी निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका ने इस बहस को अब सीधे न्यायिक जांच के दायरे में ला दिया है।
यूपीआई की सफलता के बाद शुल्क की नई बहस
यूपीआई ने भारत में डिजिटल भुगतान को बेहद व्यापक बनाया है। ऐसे में अब बहस सिर्फ 0.4 प्रतिशत शुल्क की नहीं है, बल्कि यह भी है कि डिजिटल भुगतान की लागत कौन उठाएगा और यूपीआई के भविष्य को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने का सबसे पारदर्शी तरीका क्या होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर आगे होने वाली सुनवाई इस विवाद की कानूनी दिशा तय करेगी।



