अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 16 सितंबर 2026
रूस से तेल खरीदना भारत के लिए पड़ सकता है भारी
रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव अब अमेरिकी संसद तक पहुंच गया है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने मंगलवार शाम उस बिल को आगे बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का रास्ता खोला जा सकता है। इस बिल में भारत समेत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले दूसरे देशों को निशाना बनाने का प्रावधान है। हालांकि, अभी इसे अंतिम कानून नहीं माना जा सकता। बिल को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया के बाद 16 सितंबर को हाउस में अंतिम वोट होने की उम्मीद है।
214-211 के बेहद करीबी वोट से मिली मंजूरी
“लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026” को आगे बढ़ाने वाला प्रस्ताव 214-211 वोट से पास हुआ। यह मुकाबला बेहद करीबी रहा। दो डेमोक्रेट सांसदों ने अपनी पार्टी के रुख से अलग जाकर रिपब्लिकन सांसदों के साथ मतदान किया। इस घटनाक्रम ने अमेरिकी हाउस डेमोक्रेटिक नेतृत्व को भी चौंका दिया।
अब असली परीक्षा अंतिम वोट की है। अगर बिल हाउस से आगे बढ़ता है तो उसके बाद अमेरिकी विधायी प्रक्रिया के अगले चरण पूरे होने होंगे। यानी आज की तारीख में भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देने की दिशा में बड़ा कदम जरूर उठा है।
ट्रंप को क्या अधिकार मिल सकता है?
बिल का प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देने से जुड़ा है। इसके साथ ही ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।
अमेरिका का तर्क है कि रूस की कच्चे तेल की कमाई यूक्रेन के खिलाफ चल रहे युद्ध को आर्थिक मदद देती है। इसलिए वॉशिंगटन उन देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है जो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखते हैं।
भारत के लिए खतरे की घंटी क्यों?
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है और रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में रहा है। रूस से मिलने वाले तेल की कीमत और उपलब्धता ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अगर अमेरिका वास्तव में भारत के खिलाफ 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो इसका असर सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापार पर नहीं बल्कि भारतीय कंपनियों, निर्यातकों और अमेरिकी बाजार में कारोबार करने वाले उद्योगों पर भी पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि भारत रूस से सस्ता तेल खरीदकर जो आर्थिक लाभ हासिल करता है, क्या उस पर अमेरिकी टैरिफ का संभावित बोझ भारी पड़ सकता है?
भारत के सामने सिर्फ तेल नहीं, व्यापार का भी सवाल
मामला केवल रूस से तेल खरीदने तक सीमित नहीं है। भारत और अमेरिका के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता है। अगर रूस के साथ भारत की ऊर्जा नीति को लेकर अमेरिकी प्रतिबंध या टैरिफ लागू होते हैं, तो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है।
अमेरिका के लिए भी यह फैसला आसान नहीं होगा। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, निवेश और व्यापार के व्यापक संबंध हैं। इसलिए किसी भी बड़े टैरिफ का असर दोनों तरफ पड़ सकता है।
भारत ने रूस से तेल क्यों बढ़ाया?
रूस से भारतीय तेल खरीद में बढ़ोतरी का बड़ा कारण यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में आए बदलाव रहे हैं। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूसी तेल पर छूट उपलब्ध हुई और भारतीय रिफाइनरों ने उसे खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया।
भारत लगातार यह रुख रखता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का प्राथमिक उद्देश्य देश के करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आपूर्ति सुनिश्चित करना है। भारत ने रूस के साथ-साथ मध्य-पूर्व, अमेरिका और दूसरे देशों से भी ऊर्जा खरीद जारी रखी है।
अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ रहा है
अब अमेरिकी संसद में आया यह बिल भारत के लिए एक और चुनौती है। अगर कानून बनता है और ट्रंप इसका इस्तेमाल करते हैं, तो भारत के सामने रूस से ऊर्जा खरीद और अमेरिकी बाजार तक पहुंच के बीच संतुलन बनाने का सवाल और मुश्किल हो सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात फिर समझना जरूरी है—बिल का हाउस में अंतिम रूप से कानून बन जाना और उसके बाद भारत पर वास्तव में 100% टैरिफ लागू होना दो अलग-अलग चरण हैं। आगे की विधायी और प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल—ऊर्जा सुरक्षा या अमेरिकी दबाव?
भारत के सामने आने वाले समय में कठिन रणनीतिक संतुलन होगा। एक तरफ रूस लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण रक्षा और ऊर्जा साझेदार रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत के लिए व्यापार, तकनीक, निवेश और रणनीतिक सहयोग का बड़ा साझेदार है।
ऐसे में नई दिल्ली के लिए चुनौती यह होगी कि ऊर्जा की कीमत, राष्ट्रीय हित, रूस के साथ संबंध और अमेरिका के साथ व्यापार—इन सभी को एक साथ कैसे संतुलित किया जाए।
क्या 100% टैरिफ सिर्फ रूस पर दबाव है या भारत पर भी?
अमेरिकी कानून बनाने वालों का घोषित उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। लेकिन अगर इसकी कीमत रूस से तेल खरीदने वाले देशों को चुकानी पड़े, तो भारत जैसे बड़े आयातक देश भी सीधे प्रभावित हो सकते हैं।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रूस तेल बेचता रहेगा या नहीं। सवाल यह भी है कि अगर अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार हासिल कर लिया, तो क्या नई दिल्ली अपनी ऊर्जा नीति बदलने पर मजबूर होगी?
अमेरिकी हाउस में 214-211 का वोट भारत के लिए एक बड़ा संकेत जरूर है, लेकिन अभी अंतिम फैसला बाकी है। अब देखना होगा कि अमेरिकी संसद और ट्रंप प्रशासन इस बिल को किस रूप में आगे बढ़ाते हैं—और भारत इस बढ़ते अमेरिकी दबाव का जवाब अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को किस तरह सामने रखकर देता है।



