राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026
SIR के तीसरे चरण में डिलीट हुए नामों का आंकड़ा बढ़ा
मतदाता सूची की Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। The Hindu के डेटा विश्लेषण के मुताबिक, SIR के तीसरे चरण में अब तक ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने वाले 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 17.1% नाम हटाए गए हैं। यह आंकड़ा दूसरे चरण के मुकाबले 4.8 प्रतिशत अंक ज्यादा है। खास बात यह है कि तीसरे चरण में हटाए गए नामों में ‘Shifted’ यानी स्थान बदल चुके मतदाता और ‘Absent’ यानी अनुपस्थित मतदाताओं की हिस्सेदारी भी पहले के चरणों से ज्यादा दिखाई दे रही है।
19 में से 17 राज्यों में ड्राफ्ट रोल जारी
SIR का तीसरा चरण कुल 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रहा है। इनमें से 17 ने अब तक अपनी ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी कर दी है। नागालैंड और त्रिपुरा में ड्राफ्ट रोल अभी जारी नहीं हुआ है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश के लिए चुनाव आयोग ने अभी SIR की घोषणा नहीं की है।
यानी तस्वीर अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है, लेकिन शुरुआती आंकड़े ही चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर एक बड़ी बहस खड़ी कर रहे हैं।
17.1% नाम हटना आखिर कितना बड़ा आंकड़ा है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 17.1% हटाए गए नामों का मतलब यह नहीं है कि इतने प्रतिशत वास्तविक और पात्र मतदाताओं को गलत तरीके से वोटर लिस्ट से निकाल दिया गया है। SIR में मृत, स्थान बदल चुके, डुप्लीकेट या लंबे समय से अनुपस्थित मतदाताओं के नाम हटाए जाने की प्रक्रिया भी शामिल होती है।
चुनाव आयोग खुद कहता है कि मतदाता सूची को साफ, सही और अपडेट रखने के लिए मृत, स्थान बदल चुके और डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान जरूरी है।
लेकिन असली सवाल यहीं से पैदा होता है—अगर किसी वास्तविक मतदाता का नाम ‘Shifted’ या ‘Absent’ के आधार पर हट गया और वह चुनाव के समय वोट देने पहुंचा तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
‘Shifted’ और ‘Absent’ पर सबसे बड़ा सवाल
चुनाव आयोग की 2025 की SIR प्रक्रिया से जुड़ी गाइडलाइन में कहा गया है कि जिन मतदाताओं के Enumeration Form वापस नहीं आए, उनके संभावित कारण—जैसे Absent, Shifted, Death या Duplicate—स्थानीय पूछताछ के आधार पर दर्ज किए जा सकते हैं। ऐसे मतदाताओं की बूथवार सूची और हटाए जाने का संभावित कारण सार्वजनिक करने का भी प्रावधान बताया गया है।
यानी ‘Absent’ लिखा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मतदाता फर्जी है या उसका नाम हमेशा के लिए खत्म हो गया। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नामों के सामने ऐसे कारण दर्ज होने पर हर नाम की सही जांच और आपत्ति दर्ज कराने का मौका बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
वोटर लिस्ट से नाम हटाना मामूली प्रक्रिया नहीं
मतदाता सूची में नाम होना केवल एक प्रशासनिक एंट्री नहीं है। यही नाम चुनाव के दिन नागरिक के मतदान अधिकार का आधार बनता है। चुनाव आयोग के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाना हो या किसी नाम पर आपत्ति करनी हो तो फॉर्म-7 के जरिए प्रक्रिया उपलब्ध है। वहीं मौजूदा विवरण में सुधार या पता बदलने के लिए फॉर्म-8 का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए SIR के दौरान सबसे अहम सवाल केवल यह नहीं है कि कितने नाम हटाए गए, बल्कि यह भी है कि कितने लोगों को नोटिस मिला, कितनों ने दावा-आपत्ति की, कितने नाम वापस जोड़े गए और कितने मामलों में BLO की रिपोर्ट बदली गई।
चुनाव आयोग का तर्क—साफ मतदाता सूची जरूरी
चुनाव आयोग का कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए शुद्ध और अपडेटेड मतदाता सूची जरूरी है। आयोग के अनुसार SIR का उद्देश्य पात्र मतदाताओं को शामिल करना और मृत, स्थान बदल चुके तथा अपात्र या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना है।
इस दृष्टि से मतदाता सूची की गहन जांच अपने आप में गलत प्रक्रिया नहीं है। लेकिन लोकतंत्र में नाम हटाने की प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए जितनी नाम जोड़ने की प्रक्रिया।
असली परीक्षा ड्राफ्ट के बाद शुरू होगी
SIR की ड्राफ्ट सूची अंतिम सूची नहीं होती। चुनाव आयोग की प्रक्रिया में ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद दावे और आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया जाता है। 2025 में जारी SIR कार्यक्रम में भी ड्राफ्ट रोल के बाद दावा-आपत्ति और नोटिस-हियरिंग की प्रक्रिया रखी गई थी।
इसलिए अब असली सवाल यह है कि जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए हैं, वे कितनी आसानी से अपनी आपत्ति दर्ज करा पाएंगे और चुनाव अधिकारी कितनी तेजी से उनका समाधान करेंगे।
क्या कोई पात्र मतदाता छूट तो नहीं जाएगा?
SIR समर्थकों का तर्क है कि फर्जी, डुप्लीकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाना जरूरी है। दूसरी तरफ चिंता यह है कि अगर प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाता का नाम भी गलती से हट गया तो उसका सीधा असर उसके मतदान के संवैधानिक अधिकार पर पड़ेगा।
यही वजह है कि SIR की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने लाख या करोड़ नाम हटाए गए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि कितने अपात्र नाम हटे और कितने पात्र मतदाता सुरक्षित रूप से सूची में बने रहे।
अब सबसे बड़ा सवाल—SIR सफाई है या नए विवाद की शुरुआत?
तीसरे चरण में 17.1% नाम हटने और ‘Shifted’ तथा ‘Absent’ श्रेणियों के बढ़ने ने निश्चित तौर पर बहस तेज कर दी है। लेकिन इन आंकड़ों को सीधे “फर्जी नाम हटाए गए” या “वास्तविक मतदाताओं के नाम काट दिए गए” कहना भी अभी जल्दबाजी होगी। अंतिम निष्कर्ष के लिए राज्यवार आंकड़े, दावे-आपत्तियां और अंतिम मतदाता सूची देखना जरूरी होगा।
लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है—मतदाता सूची में एक भी पात्र नागरिक का नाम गलती से नहीं कटना चाहिए।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल वोटर का है
SIR चाहे कितनी भी बड़ी प्रशासनिक कवायद क्यों न हो, उसका अंतिम उद्देश्य होना चाहिए—सही मतदाता सूची और हर पात्र नागरिक का मतदान अधिकार सुरक्षित रखना।
अब चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—17.1% नाम हटने के बाद इनमें कितने वास्तव में मृत, डुप्लीकेट या स्थायी रूप से स्थान बदल चुके मतदाता हैं और कितने ऐसे नागरिक हैं जो आज भी उसी जगह रहते हैं और वोट देने के पात्र हैं?
क्योंकि चुनाव में असली ताकत EVM, बैलेट या किसी राजनीतिक दल की नहीं—मतदाता के वोट की होती है। और अगर किसी पात्र मतदाता का नाम ही सूची से गायब हो गया, तो लोकतंत्र के सामने सवाल सिर्फ एक नाम का नहीं, पूरे चुनावी भरोसे का होगा।



