राष्ट्रीय/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 सितंबर 2026
HPEC बदलने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई
NEET-UG से जुड़े प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने हाई-पावर्ड इन्क्वायरी कमेटी यानी HPEC के पुनर्गठन की मांग को स्वीकार नहीं किया। यह समिति 20 जुलाई को कॉकroach जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए बनाई गई थी।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से समिति के सदस्यों के बीच “हितों के टकराव” यानी कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट के आरोपों पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि समिति ने अभी अपना काम शुरू भी नहीं किया था और उसके खिलाफ सवाल उठने लगे। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं, जिनमें छात्र भी शामिल हैं, को “अनुमान और पहले से बनी धारणाओं” के आधार पर आरोप लगाने से बचने की सलाह दी।
पुलिस कार्रवाई की जांच पहले, कमेटी पर सवाल बाद में
सुप्रीम कोर्ट का रुख इस मामले में साफ दिखाई दिया कि पहले HPEC को अपना काम करने दिया जाए। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों की जांच है। खास तौर पर प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल और पुलिस की कथित ज्यादती जैसे गंभीर सवालों की जांच होनी है।
अदालत ने संकेत दिया कि जब जांच समिति को तथ्यों की पड़ताल करने का मौका ही नहीं मिला है, तब उसके सदस्यों की निष्पक्षता पर पहले से सवाल खड़े करना उचित नहीं है। यानी अदालत ने फिलहाल समिति को बदलने के बजाय जांच को आगे बढ़ाने को प्राथमिकता दी है।
छात्रों की शिकायतें और पुलिस कार्रवाई बनी असली परीक्षा
NEET-UG और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों ने लंबे समय से विरोध किया है। 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। प्रदर्शनकारियों की तरफ से पुलिस बल के इस्तेमाल, हिरासत और पैलेट गन से जुड़े आरोप सामने आए।
अब HPEC की जांच का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि इस समिति के जरिए यह पता लगाया जाना है कि उस दिन वास्तव में क्या हुआ, पुलिस ने किस परिस्थिति में कार्रवाई की और क्या बल का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा—बिना जांच निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं
अदालत ने याचिकाकर्ताओं के रवैये पर “डिस्क्वाइट” यानी असहजता जताई। उसका मुख्य सवाल यही था कि जब समिति ने अपना काम शुरू ही नहीं किया तो उसकी निष्पक्षता और काम करने के तरीके पर पहले से निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है।
इससे एक महत्वपूर्ण संदेश भी निकलता है—जांच की मांग करना अलग बात है और जांच शुरू होने से पहले जांच करने वाली संस्था को ही दोषी मान लेना अलग बात। अदालत फिलहाल दूसरे रास्ते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखी।
पैलेट गन के इस्तेमाल पर अब जांच की नजर
इस पूरे विवाद में पैलेट गन का मुद्दा सबसे संवेदनशील सवालों में से एक है। अगर किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने ऐसी कार्रवाई की है, तो उसकी परिस्थितियों, आदेश, इस्तेमाल की जरूरत और उससे हुए नुकसान की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि HPEC की रिपोर्ट इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने समिति को बदलने के बजाय जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना है। इसका मतलब यह भी है कि पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।
याचिकाकर्ताओं में छात्र भी शामिल
इस मामले में याचिकाकर्ताओं में छात्र भी शामिल हैं। उनकी ओर से समिति के गठन और उसकी संरचना को लेकर सवाल उठाए गए थे। उनका तर्क था कि अगर जांच निष्पक्ष होनी है तो समिति के हर सदस्य की स्वतंत्रता और संभावित हितों के टकराव को पहले से स्पष्ट किया जाना चाहिए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि समिति के काम शुरू होने से पहले ही उस पर संदेह करना अनुमान और पूर्वधारणाओं पर आधारित हो सकता है।
अब HPEC की रिपोर्ट पर रहेगी नजर
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि HPEC अपनी जांच किस तरह आगे बढ़ाती है और पुलिस कार्रवाई को लेकर क्या निष्कर्ष सामने आते हैं। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने किस स्तर तक बल प्रयोग किया, पैलेट गन के इस्तेमाल की परिस्थिति क्या थी और क्या कार्रवाई नियमों के अनुसार हुई—इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
सुप्रीम कोर्ट का बुधवार का रुख फिलहाल यही है कि पहले जांच हो, फिर निष्कर्ष निकले।
NEET विवाद में एक और अहम मोड़
NEET-UG को लेकर पहले से परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, छात्रों के विरोध और सरकार की कार्रवाई जैसे कई सवाल राष्ट्रीय बहस का हिस्सा रहे हैं। अब पुलिस कार्रवाई की जांच भी इसी विवाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गई है।
एक तरफ छात्रों और प्रदर्शनकारियों को अपनी शिकायतों और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। असली सवाल यह है कि इन दोनों के बीच संतुलन किस तरह रखा गया।
अब निगाह HPEC की जांच पर है—क्या समिति पुलिस कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारियों के साथ हुए व्यवहार पर स्पष्ट तथ्य सामने ला पाएगी? और क्या इस जांच के बाद यह साफ होगा कि 20 जुलाई को आखिर उस दिन हुआ क्या था?



