कानून/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026
सरोगेट विज्ञापन के नोटिस को चुनौती देने की कोशिश नाकाम
विमल इलायची के विज्ञापन से जुड़े विवाद में अभिनेता शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन की ओर से भेजे गए कारण बताओ नोटिस के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका पर राहत नहीं मिली। दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को इस याचिका को सुनने से इनकार कर दिया। अदालत ने मामला क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र से जुड़ा मानते हुए कहा कि इस चुनौती के लिए महाराष्ट्र की अदालतें ज्यादा उचित और सुविधाजनक मंच हैं।
मामला आखिर है क्या?
महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने विमल इलायची के ब्रांड एंबेसडर रहे इन तीनों अभिनेताओं को विज्ञापन को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इस मामले में आरोप लगाया गया है कि इलायची के नाम पर दिखाया जाने वाला विज्ञापन तंबाकू वाले पान मसाला के लिए सरोगेट विज्ञापन का काम कर सकता है। यानी किसी ऐसे उत्पाद का प्रचार करना जिसका नाम और प्रस्तुति किसी दूसरे उत्पाद के प्रचार के लिए इस्तेमाल हो रही हो।
यह आरोप अभी अंतिम रूप से साबित नहीं हुआ है। मामला नियामकीय प्रक्रिया में है और संबंधित पक्षों को अपना जवाब देने का अधिकार है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्यों नहीं सुनी याचिका?
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने याचिका खारिज करते हुए क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का सवाल उठाया। अदालत का कहना था कि इस चुनौती के लिए महाराष्ट्र की अदालतें ज्यादा उपयुक्त और सुविधाजनक मंच हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने यह फैसला दे दिया कि विज्ञापन सरोगेट विज्ञापन है या संबंधित अभिनेता किसी नियम के दोषी हैं। अदालत ने फिलहाल केवल यह तय किया कि इस मामले की चुनौती दिल्ली हाईकोर्ट में सुनना उचित नहीं है।
कंपनी ने दिल्ली का रास्ता क्यों चुना?
याचिका पीबी एग्रो एलएलपी की ओर से दायर की गई थी। यह कंपनी विमल ब्रांड के तहत तंबाकू रहित इलायची और पान मसाला के निर्माण और बिक्री के लिए मास्टर लाइसेंसी है। कंपनी की दलील थी कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन से जुड़े अधिकारी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करते हैं और मंत्रालय का मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का तर्क दिया गया था।
लेकिन अदालत ने महाराष्ट्र को माना सही मंच
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि इस मामले में महाराष्ट्र की अदालतें ज्यादा उचित मंच हैं। इसका मतलब यह है कि अगर कंपनी नोटिस को कानूनी चुनौती देना चाहती है, तो उसे महाराष्ट्र में आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।
बॉलीवुड सितारों के विज्ञापन फिर सवालों के घेरे में
यह मामला एक बार फिर बड़े फिल्मी सितारों द्वारा किए जाने वाले उत्पादों के विज्ञापनों पर सवाल खड़ा करता है। जब कोई बड़ा अभिनेता किसी ब्रांड का प्रचार करता है, तो उसके चेहरे और लोकप्रियता का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किसी उत्पाद का नाम बदलकर या उसे दूसरे रूप में पेश करके उस विज्ञापन के जरिए किसी दूसरे उत्पाद का प्रचार किया जा सकता है?
अदालत का फैसला अभी विज्ञापन की वैधता पर नहीं
इस पूरे मामले में एक बात साफ रखना जरूरी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने विज्ञापन को अवैध घोषित नहीं किया है और न ही तीनों अभिनेताओं को दोषी ठहराया है। अदालत ने याचिका को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के आधार पर स्वीकार नहीं किया है। अब संबंधित पक्ष महाराष्ट्र में उपलब्ध कानूनी रास्ते अपना सकते हैं और वहां इस विवाद के मूल मुद्दे पर सुनवाई हो सकती है।
अब असली सवाल
बड़े सितारों के विज्ञापन में सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि स्क्रीन पर किस उत्पाद का नाम लिखा है। यह भी देखना जरूरी है कि उस विज्ञापन का वास्तविक संदेश क्या है और उपभोक्ता तक कौन-सा ब्रांड या उत्पाद पहुंच रहा है।
क्या विज्ञापन में इलायची जैसे तंबाकू-मुक्त उत्पाद का नाम इस्तेमाल करना वास्तव में सिर्फ उसी उत्पाद का प्रचार है, या इसके पीछे किसी दूसरे उत्पाद को बढ़ावा देने की रणनीति हो सकती है? इसका अंतिम जवाब अब महाराष्ट्र में होने वाली कानूनी और नियामकीय प्रक्रिया से सामने आएगा।



