राष्ट्रीय/ डिजिटल सेंसरशिप | ABC NATIONAL NEWS | तिरुवनंतपुरम | 14 सितंबर 2026
1.78 करोड़ व्यूज वाला वीडियो अचानक भारत में प्रतिबंधित
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक AI से बनाए गए वीडियो को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वीडियो में केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को बिजली कटौती के मुद्दे पर केरल राज्य बिजली बोर्ड यानी केएसईबी के अधिकारियों के साथ नाचते हुए दिखाया गया था। यह वीडियो 10 सितंबर को इंस्टाग्राम के ‘aikavala’ पेज पर डाला गया था और इसके संचालक के अनुसार 13 सितंबर तक इसे करीब 1.78 करोड़ बार देखा जा चुका था।
Meta ने भारत में पहुंच क्यों रोकी?
वीडियो बनाने वालों के अनुसार, Meta ने अब भारत में इस वीडियो की पहुंच रोक दी है। उन्हें Meta की ओर से एक संदेश मिला, जिसमें कहा गया कि भारत सरकार के नोटिस के आधार पर भारत में इस सामग्री की पहुंच प्रतिबंधित की गई है। यही संदेश अब पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है, क्योंकि सवाल सिर्फ एक AI वीडियो को हटाने या रोकने का नहीं, बल्कि यह भी है कि सरकार ने ऐसा नोटिस क्यों भेजा और वीडियो को लेकर आपत्ति आखिर किस आधार पर की गई?
AI ने बनाया मुख्यमंत्री का नकली वीडियो
इस पूरे मामले की सबसे अहम बात यह है कि वीडियो असली घटना की रिकॉर्डिंग नहीं था, बल्कि AI तकनीक से तैयार किया गया वीडियो था। यानी मुख्यमंत्री वास्तव में इस तरह नाच रहे थे या बिजली बोर्ड के अधिकारियों के साथ ऐसा कोई कार्यक्रम हुआ था—ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है। AI की मदद से किसी वास्तविक व्यक्ति का चेहरा और हावभाव बदलकर ऐसी तस्वीर या वीडियो तैयार किया जा सकता है, जो देखने में असली लगे लेकिन वास्तव में पूरी तरह बनाया हुआ हो।
बिजली कटौती के मुद्दे से जुड़ा था वीडियो
वीडियो को केरल में हाल की बिजली कटौती की चर्चा से जोड़कर बनाया गया था। यही वजह है कि यह तेजी से लोगों के बीच पहुंचा और राजनीतिक व्यंग्य के रूप में वायरल हुआ। लेकिन जब किसी मुख्यमंत्री या किसी वास्तविक व्यक्ति को AI के जरिए ऐसी स्थिति में दिखाया जाता है, जो वास्तव में हुई ही नहीं, तो यह सवाल भी उठता है कि व्यंग्य और भ्रामक सामग्री के बीच सीमा कहां तय होगी?
सरकार का नोटिस, Meta की कार्रवाई और अभिव्यक्ति की आजादी
इस मामले ने सोशल मीडिया पर सरकार की भूमिका को लेकर भी बहस छेड़ दी है। अगर कोई AI वीडियो साफ तौर पर नकली है, तो लोगों को यह बताना जरूरी है कि वह AI से बनाया गया है। लेकिन अगर किसी सामग्री की पहुंच सरकार के नोटिस के बाद रोक दी जाती है, तो पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी हो जाती है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किस कानून या किस प्रावधान के तहत कार्रवाई की गई और सरकार ने Meta से यह कदम उठाने को क्यों कहा।
AI का दौर—अब असली और नकली में फर्क और मुश्किल
यह मामला केवल केरल की राजनीति तक सीमित नहीं है। AI तकनीक के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने पूरी दुनिया के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब किसी नेता, अभिनेता, अधिकारी या आम व्यक्ति का ऐसा वीडियो बनाया जा सकता है जिसमें वह ऐसी बात करता या ऐसा काम करता दिखाई दे, जो उसने कभी किया ही नहीं। इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ AI बनाना नहीं, बल्कि AI से बनी झूठी सामग्री को पहचानना और उसके इस्तेमाल की स्पष्ट सीमा तय करना होगी।
1.78 करोड़ लोगों तक पहुंची सामग्री को रोकना कितना प्रभावी?
वीडियो को भारत में प्रतिबंधित किए जाने की खबर सामने तब आई है, जब उसके संचालक के अनुसार वह करोड़ों लोगों तक पहुंच चुका था। ऐसे में एक और बड़ा सवाल उठता है—अगर कोई AI सामग्री गलत या भ्रामक है, तो क्या उसे वायरल होने के बाद रोकना पर्याप्त है? या फिर सोशल मीडिया कंपनियों और सरकार को ऐसी सामग्री के बारे में पहले ही स्पष्ट चेतावनी और पहचान की व्यवस्था करनी होगी?
अब सबसे बड़ा सवाल—नकली वीडियो पर कार्रवाई या राजनीतिक व्यंग्य पर रोक?
इस मामले में अभी सरकार की ओर से उस नोटिस का पूरा विवरण सामने नहीं आया है, जिसके आधार पर Meta ने भारत में वीडियो की पहुंच रोकी। इसलिए फिलहाल इतना ही स्पष्ट है कि वीडियो AI से बनाया गया था, वह 1.78 करोड़ व्यूज तक पहुंचा और उसके निर्माताओं के अनुसार भारत सरकार के नोटिस के बाद Meta ने उस पर प्रतिबंध लगाया।
लेकिन असली सवाल अब यही है—अगर AI वीडियो नकली था तो जनता को उसकी सच्चाई बताने के बजाय उसकी पहुंच रोकना ही रास्ता क्यों बना? सरकार बताए कि नोटिस किस आधार पर दिया गया, Meta बताए कि कार्रवाई किस नियम के तहत हुई और जनता तय करे कि यह डिजिटल सुरक्षा की जरूरत थी या अभिव्यक्ति की आजादी पर एक नया सवाल?



