राष्ट्रीय/ मध्यप्रदेश/ अपराध | ABC NATIONAL NEWS | सागर | 13 सितंबर 2026
₹80 की शराब बनी मौत का जाम
मध्य प्रदेश के सागर जिले से आई यह खबर सिर्फ एक जहरीली शराब की घटना नहीं, बल्कि गरीब और आम लोगों की जिंदगी के साथ हो रहे खतरनाक खिलवाड़ की तस्वीर है। सागर जिले के कई गांवों में जहरीली या मिलावटी शराब पीने के बाद अब तक 16 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 150 से ज्यादा लोग बीमार बताए जा रहे हैं। कई पीड़ितों की आंखों की रोशनी बुरी तरह प्रभावित हुई है और 30 से ज्यादा लोग अभी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। सबसे डराने वाली बात यह है कि कुछ लोगों के सामने अब जिंदगी भर अंधेरे में रहने का खतरा खड़ा हो गया है।
‘लाल वाली शराब’ पी और फिर छा गया अंधेरा
सागर के बुड़ना गांव के 49 वर्षीय राजधर सेन भी ऐसे ही पीड़ितों में शामिल हैं। वह मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। उन्होंने बताया कि 5 सितंबर को उन्होंने ₹80 की लाल रंग वाली शराब पी थी। पहले वह सफेद शराब पीते थे, लेकिन उनके इलाके में लाल रंग वाली शराब मिलने लगी तो उन्होंने उसे खरीद लिया। इसके कुछ घंटे बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। सांस फूलने लगी और उल्टी हुई। इसके बाद उनकी आंखों की रोशनी लगभग चली गई। अस्पताल में वह बताते हैं कि उन्हें सामने वाले व्यक्ति का चेहरा तक साफ दिखाई नहीं देता और सब कुछ सिर्फ काले और धुंधले धब्बे जैसा नजर आता है।
जहर ने आंखों की रोशनी पर किया सीधा हमला
मामले में सबसे गंभीर बात शराब पीने के बाद दिखाई देने वाली यह समस्या है। रिपोर्ट के अनुसार, इस त्रासदी में मेथिल अल्कोहल यानी मेथनॉल विषाक्तता से मौत और गंभीर बीमारी के मामले सामने आए हैं। मेथनॉल शरीर के लिए बेहद जहरीला होता है और इसके संपर्क में आने पर गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। इस मामले में कई मरीजों की आंखों की रोशनी प्रभावित हुई है। यानी कुछ परिवारों के लिए यह त्रासदी सिर्फ अपने किसी सदस्य को खोने तक सीमित नहीं है, बल्कि जिन लोगों की जान बच गई है, उनके सामने भी लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
एक गांव नहीं, कई गांवों में फैला संकट
इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जहरीली शराब आखिर कई इलाकों तक पहुंची कैसे? अगर शराब में जहरीला रसायन मिला हुआ था, तो उसे बनाने, मिलाने, पहुंचाने और बेचने का पूरा नेटवर्क कितना बड़ा था? पुलिस अब इसी दिशा में जांच कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस नेटवर्क तक पहुंचना है जिसके जरिए यह शराब लोगों तक पहुंची।
मौतों के बाद जागे प्रशासन से बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जहरीली शराब किसने बनाई या किसने बेची। सवाल यह भी है कि ऐसी शराब बाजार और गांवों तक पहुंचने से पहले प्रशासन को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? अगर किसी इलाके में खुले तौर पर सस्ती शराब बेची जा रही थी, तो क्या स्थानीय स्तर पर इसकी निगरानी नहीं होनी चाहिए थी? क्या आबकारी और पुलिस व्यवस्था सिर्फ हादसे के बाद कार्रवाई करने के लिए है, या उसका असली काम लोगों की जान जाने से पहले खतरे को रोकना है?
गरीब की जान इतनी सस्ती क्यों?
₹80 की शराब खरीदने वाला व्यक्ति शायद यह सोचकर उसे पीता है कि वह सस्ती है, लेकिन उसके पीछे कौन सा जहर छिपा है, यह उसे पता नहीं होता। इस घटना में सबसे ज्यादा चिंता इसी बात की है कि जिन लोगों के पास महंगी शराब खरीदने का पैसा नहीं है, क्या वे जहरीली शराब के सबसे आसान शिकार बन जाते हैं? अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग की सुरक्षा का भी सवाल है।
16 मौतों के बाद असली कार्रवाई क्या होगी?
अब जरूरत सिर्फ गिरफ्तारियां करने या कुछ बोतलें जब्त करने तक सीमित रहने की नहीं है। जांच को यह पता लगाना होगा कि शराब कहां बनी, उसमें मेथनॉल कैसे पहुंचा, उसे किसने सप्लाई किया, किसने बेचा और इस पूरे नेटवर्क को संरक्षण या मदद किस स्तर पर मिली। अगर कोई बड़ा नेटवर्क सामने आता है तो उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई जरूरी है जिससे दोबारा किसी गांव में ₹80 की बोतल मौत का कारण न बने।
जिंदा बचे लोगों की जिंदगी कौन संभालेगा?
16 लोगों की मौत का दर्द तो परिवार कभी नहीं भूल पाएंगे, लेकिन जिन लोगों की आंखों की रोशनी चली गई या गंभीर रूप से प्रभावित हुई, उनकी आगे की जिंदगी का सवाल भी उतना ही बड़ा है। इलाज, परिवार की आर्थिक स्थिति, काम करने की क्षमता और बच्चों की पढ़ाई—इन सब पर इस हादसे का असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी केवल तत्काल इलाज तक खत्म नहीं होनी चाहिए। प्रभावित परिवारों के लंबे इलाज और पुनर्वास की भी जरूरत होगी।
अब सवाल बोतल का नहीं, पूरे सिस्टम का है
सागर की यह त्रासदी प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल खड़ा करती है—अगर जहरीली शराब पीने के बाद 16 लोगों की जान चली गई और 150 से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए, तो इस जहरीले कारोबार को रोकने की व्यवस्था आखिर कहां थी?
लोगों को शराब पीने से रोकना एक अलग बहस है, लेकिन किसी भी हालत में बाजार में ऐसी जहरीली शराब पहुंचना स्वीकार नहीं किया जा सकता। मौत के बाद जांच शुरू करना जरूरी है, लेकिन असली प्रशासनिक सफलता तब होगी जब अगली बोतल किसी परिवार का चिराग बुझाने से पहले ही पकड़ ली जाए।



