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‘कत्ल-ए-हुसैन असल में मर्ग-ए-यज़ीद है’—लेकिन दिल्ली में MCD को मासूमों की मौत के बाद क्यों याद आया अपना कर्तव्य?

ओपिनियन | राष्ट्रीय/दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026

 

सात मौतें हुईं, तब खुली MCD की आंखें

सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत गिरने से सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली नगर निगम अचानक ऐसे सक्रिय दिखाई दे रहा है, जैसे दिल्ली की हर खतरनाक इमारत अब उसकी नजर में आ गई हो। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 11 और 12 सितंबर को सिर्फ दो दिनों में 67 संपत्तियां ध्वस्त की गईं और 9 संपत्तियां सील की गईं। 35 संपत्तियों को कारण बताओ नोटिस जारी हुए और चार के खिलाफ ध्वस्तीकरण आदेश दिए गए। सवाल यह नहीं है कि अब कार्रवाई क्यों हो रही है—कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। असली सवाल यह है कि जब इमारतें खड़ी हो रही थीं, जब अतिरिक्त मंजिलें बन रही थीं, जब नियमों का उल्लंघन हो रहा था और जब छात्र तथा किरायेदार इन इमारतों में रह रहे थे, तब एमसीडी कहां थी? क्या प्रशासन को खतरे का पता लगाने के लिए पहले सात जिंदगियों के खत्म होने का इंतजार करना जरूरी था?

‘बाद में जागना’ प्रशासन की मजबूरी नहीं, विफलता है

दो दिनों में 67 संपत्तियों पर बुलडोजर चलना अपने आप में बड़ी कार्रवाई है, लेकिन यही आंकड़ा प्रशासन से सबसे बड़ा सवाल भी पूछता है। अगर सिर्फ दो दिनों में इतनी बड़ी संख्या में ऐसी संपत्तियां मिल सकती हैं जिन पर ध्वस्तीकरण या सीलिंग की कार्रवाई जरूरी समझी गई, तो क्या इन संपत्तियों की पहचान पहले नहीं की जा सकती थी? एमसीडी ने नजफगढ़, रोहिणी, नरेला, सिविल लाइंस और शाहदरा उत्तर समेत कई इलाकों में कार्रवाई की है। करोल बाग के बड़े गोदाम सील हुए और पश्चिमी क्षेत्र में होटल पर भी कार्रवाई हुई। यानी समस्या किसी एक इलाके या एक-दो इमारतों तक सीमित नहीं है। जब समस्या इतनी व्यापक है तो समाधान भी हादसे के बाद चलने वाला बुलडोजर नहीं, बल्कि हादसे से पहले चलने वाला निरीक्षण तंत्र होना चाहिए।

कर्बला का संदेश और प्रशासन की जिम्मेदारी

मुहर्रम और कर्बला की याद में कही जाने वाली प्रसिद्ध पंक्ति है—“कत्ल-ए-हुसैन असल में मर्ग-ए-यज़ीद है, इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद।” इस पंक्ति का मूल संदेश जुल्म के सामने इंसाफ, सत्य और प्रतिरोध की याद से जुड़ा है। आज इस धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ को किसी समुदाय या आस्था पर टिप्पणी के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक सवाल के रूप में देखना चाहिए—क्या व्यवस्था को इंसानी जान की कीमत समझने के लिए पहले किसी ‘कर्बला’ का इंतजार करना चाहिए? सत्य निकेतन की सात मौतें किसी आंकड़े से ज्यादा हैं। वे सात परिवारों का उजड़ना हैं, सात घरों की दुनिया बदल जाना हैं और उन छात्रों के भविष्य का खत्म हो जाना हैं जो दिल्ली पढ़ने आए थे। प्रशासन की असली सफलता यह नहीं कि मौतों के बाद कितनी इमारतें गिराई गईं; असली सफलता यह होती कि मौत से पहले खतरनाक इमारत पहचान ली जाती।

 

1,200 पीजी की जांच—इतने दिन तक कौन सो रहा था?

सत्य निकेतन हादसे के बाद एमसीडी ने 1,200 से अधिक पीजी इमारतों का सर्वे किया। अधिकारियों के अनुसार तीन इमारतें खतरनाक मिलीं, 39 में मामूली मरम्मत की जरूरत थी और नौ में बड़ी मरम्मत की जरूरत सामने आई। इसके अलावा चार मंजिल से ऊपर की 26 फ्रेम वाली इमारतों को विशेष निगरानी के लिए चिन्हित किया गया। अब जरा इस तस्वीर को समझिए। दिल्ली में हजारों छात्र और किरायेदार निजी पीजी में रहते हैं। इनमें से कई मकान ऐसे इलाकों में हैं जहां जगह की कमी, ऊंची कीमतों और छात्रों की मजबूरी के कारण भवनों का इस्तेमाल उनकी मूल क्षमता से कहीं ज्यादा हो सकता है। अगर सुरक्षा सर्वे इतना जरूरी था तो यह काम नियमित रूप से क्यों नहीं किया गया? क्या किसी इमारत की सुरक्षा जांच का कैलेंडर हादसे से तय होगा?

तीन लाख संपत्तियों का सर्वे—समस्या कितनी गहरी है?

एमसीडी ने पिछले तीन महीनों में करीब 3 लाख संपत्तियों का सर्वे किया, जो 404 कॉलोनियों और 168 वार्डों में फैला था। इसका उद्देश्य आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल की पहचान करना था। यह आंकड़ा बताता है कि दिल्ली में संपत्ति के उपयोग और निर्माण नियमों की निगरानी कोई छोटा प्रशासनिक काम नहीं है। लेकिन इतनी बड़ी कवायद के बावजूद अगर लोगों को सुरक्षित रहने के लिए पहले किसी हादसे का इंतजार करना पड़े, तो पूरी व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या एमसीडी के पास दिल्ली की सभी संवेदनशील इमारतों का वास्तविक समय का सुरक्षा रिकॉर्ड है? क्या खतरनाक भवनों की सूची सार्वजनिक है? क्या पीजी संचालकों की जवाबदेही तय है?

मौत के बाद 67 बुलडोजर, पहले कितने निरीक्षण?

एमसीडी के अपने आंकड़े बताते हैं कि 1 जून से 3 सितंबर 2026 के बीच 983 संपत्तियों पर ध्वस्तीकरण कार्रवाई, 464 संपत्तियों पर सीलिंग, 1,516 अनधिकृत निर्माण संबंधी कारण बताओ नोटिस और 708 सीलिंग नोटिस जारी किए गए। 726 ध्वस्तीकरण आदेश भी जारी हुए। यानी सत्य निकेतन हादसे से पहले भी निगम बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर रहा था। फिर भी सवाल बचता है—अगर इतना बड़ा प्रवर्तन अभियान चल रहा था तो क्या पीजी और छात्रों के रहने वाली इमारतों की सुरक्षा अलग प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए थी? 983 संपत्तियों पर कार्रवाई का आंकड़ा प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन अगर उसी शहर में एक पीजी गिरकर सात लोगों की जान ले ले, तो आंकड़ों के पीछे छिपी व्यवस्था की कमियां भी देखनी होंगी।

बुलडोजर आसान है, जिम्मेदारी तय करना मुश्किल क्यों?

किसी इमारत को गिराना प्रशासन के लिए दिखाई देने वाली कार्रवाई है। बुलडोजर चलता है, तस्वीरें आती हैं, खबर बनती है और जनता को लगता है कि सरकार सक्रिय हो गई। लेकिन असली प्रशासनिक काम उससे पहले होता है। नक्शा किसने पास किया? निर्माण की निगरानी किसने की? अतिरिक्त मंजिल कब बनी? इमारत का इस्तेमाल पीजी के रूप में कब शुरू हुआ? कितने लोग रह रहे थे? क्या सुरक्षा मानकों की जांच हुई? शिकायत पहले मिली थी या नहीं? अगर मिली थी तो क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब के बिना सिर्फ बुलडोजर चलाना समस्या का आधा समाधान है। क्योंकि आज एक इमारत गिरेगी, कल दूसरी बन सकती है। अगर सिस्टम वही रहा तो हादसा फिर हो सकता है।

मासूम छात्र प्रशासन की जिम्मेदारी थे, बोझ नहीं

दिल्ली में पढ़ने आने वाला छात्र अक्सर अपने परिवार से दूर रहता है। उसे सुरक्षित कमरा चाहिए, लेकिन उसके पास भवन का नक्शा जांचने या संरचनात्मक मजबूती का परीक्षण कराने की क्षमता नहीं होती। वह किराया देता है और भरोसा करता है कि जिस कमरे में उसे रखा जा रहा है, वह रहने लायक है। यही भरोसा प्रशासनिक व्यवस्था पर भी होता है। अगर कोई छात्र अवैध या खतरनाक इमारत में रहता है तो उसकी गलती क्या है? मकान मालिक ने नियम तोड़ा तो छात्र क्यों मरे? निरीक्षण नहीं हुआ तो छात्र क्यों कीमत चुकाए? अनुमति में गड़बड़ी हुई तो उसकी सजा उस परिवार को क्यों मिले जिसने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजा था?

पीजी मालिक पर कार्रवाई जरूरी, लेकिन अधिकारी भी सवालों से बाहर नहीं

यह कहना भी गलत होगा कि सारी जिम्मेदारी केवल एमसीडी की है। अगर किसी मकान मालिक ने जानबूझकर अवैध निर्माण किया, अतिरिक्त मंजिल बनाई, भवन का गलत इस्तेमाल किया या सुरक्षा नियमों की अनदेखी की तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जहां सरकारी विभाग को निगरानी, अनुमति, निरीक्षण और प्रवर्तन की जिम्मेदारी दी गई है, वहां अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन रातोंरात नहीं होता। अतिरिक्त मंजिल एक दिन में अचानक प्रकट नहीं होती। बेसमेंट अचानक गोदाम नहीं बन जाता। पूरा भवन एक दिन में पीजी नहीं बन जाता। अगर वर्षों तक सब चलता रहा तो सवाल यह भी है कि संबंधित विभागों ने क्या देखा और क्या नहीं देखा।

35 नोटिस और चार ध्वस्तीकरण आदेश—अब फाइलें बंद नहीं होनी चाहिए

एमसीडी ने 35 संपत्तियों को कारण बताओ नोटिस दिए और चार के खिलाफ ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए हैं। अब जरूरी है कि इन मामलों की कार्रवाई सिर्फ नोटिस जारी होने तक सीमित न रहे। जिन इमारतों में वास्तविक खतरा है, वहां रहने वालों को समय रहते सुरक्षित किया जाए। जिनमें सुधार संभव है, उन्हें स्पष्ट समयसीमा दी जाए। और जिनके मालिक लगातार नियम तोड़ते हैं, उनके खिलाफ कानून के तहत कठोर कार्रवाई हो। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कार्रवाई निष्पक्ष हो। बुलडोजर कानून का विकल्प नहीं हो सकता; बुलडोजर कानून के पालन का अंतिम साधन होना चाहिए।

क्या प्रभावशाली लोगों की इमारतों पर भी यही पैमाना लागू होगा?

यह सवाल दिल्ली में हमेशा उठता रहा है कि कार्रवाई छोटे और कमजोर लोगों पर जल्दी होती है और बड़े कारोबारी, प्रभावशाली संपत्ति मालिक या राजनीतिक संपर्क वाले लोगों के मामलों में प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इस धारणा को खत्म करने का एक ही तरीका है—एक समान कानून, एक समान निरीक्षण और एक समान कार्रवाई। अगर छोटी गली का अवैध निर्माण गिराया जाता है तो बड़े इलाके की बड़ी संपत्ति भी जांच से बाहर नहीं होनी चाहिए। अगर एक छात्र पीजी पर कार्रवाई होती है तो बड़े होटल, गोदाम और व्यावसायिक परिसर भी समान सुरक्षा मानकों के अधीन होने चाहिए। दिल्ली की सुरक्षा में कोई वीआईपी श्रेणी नहीं होनी चाहिए।

मौत के बाद जागना संवेदना नहीं, सिस्टम की विफलता का प्रमाण है

प्रशासन की संवेदनशीलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं है कि हादसे के बाद कितने अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे। असली संवेदनशीलता यह है कि हादसे से पहले कितने परिवारों को सुरक्षित किया गया। सात मौतों के बाद 67 इमारतें गिराना निश्चित रूप से कार्रवाई है, लेकिन यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि अगर यही कार्रवाई सात दिन, सात महीने या सात साल पहले हो जाती तो क्या सात जिंदगियां बच सकती थीं? इस सवाल का जवाब शायद कोई अधिकारी सार्वजनिक रूप से न दे, लेकिन यही सवाल पूरी व्यवस्था को भीतर से परेशान करना चाहिए।

अब MCD को बुलडोजर नहीं, स्थायी सुरक्षा अभियान चलाना होगा

दिल्ली में पीजी, हॉस्टल, होटल, गोदाम और पुराने भवनों के लिए नियमित सुरक्षा ऑडिट जरूरी है। हर संवेदनशील इमारत का डिजिटल रिकॉर्ड हो। पीजी संचालकों का पंजीकरण हो। भवन की क्षमता से अधिक लोगों को रखने पर कार्रवाई हो। आपातकालीन रास्ते, आग से बचाव, विद्युत व्यवस्था और संरचनात्मक सुरक्षा की जांच हो। खतरनाक भवनों की सार्वजनिक सूची बने और उन्हें समय रहते खाली कराया जाए। अगर एमसीडी यह व्यवस्था बना पाती है तो सत्य निकेतन की सात मौतें सिर्फ एक दुखद घटना नहीं रहेंगी, बल्कि दिल्ली की भवन सुरक्षा व्यवस्था बदलने की वजह बनेंगी।

अब सवाल बुलडोजर से नहीं, जवाबदेही से है

सत्य निकेतन के बाद दिल्ली में बुलडोजर चल रहे हैं। 67 संपत्तियां ध्वस्त हो चुकी हैं, नौ सील हो चुकी हैं, दर्जनों को नोटिस मिल चुके हैं और 1,200 से ज्यादा पीजी की जांच हो चुकी है। लेकिन दिल्ली के नागरिकों का सवाल इससे आगे है—अगली खतरनाक इमारत कौन-सी है, यह हादसे से पहले कौन बताएगा?

क्योंकि बुलडोजर चलना प्रशासन की ताकत दिखाता है, लेकिन हादसा होने से पहले खतरे को पहचान लेना प्रशासन की क्षमता दिखाता है।

और सात मासूम जिंदगियां चली जाने के बाद अगर व्यवस्था जागती है, तो सबसे कड़वा सवाल यही रहेगा— क्या दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए हर बार पहले एक सत्य निकेतन का मलबा गिरना जरूरी है?

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