राष्ट्रीय/ केरल/ जनहित | ABC NATIONAL NEWS | मलप्पुरम | 13 सितंबर 2026
2019 की बाढ़ ने घर छीना, सात साल बाद भी पक्की छत नहीं मिली
केरल के मलप्पुरम से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो विकास और सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अगस्त 2019 में आई भीषण बाढ़ ने वानियमपुझा के 26 पनिया आदिवासी परिवारों के घर तबाह कर दिए थे। घर उजड़ने के बाद इन परिवारों को पक्के घर और सुरक्षित जिंदगी मिलने की उम्मीद थी, लेकिन सात साल बीत गए और कई परिवार आज भी प्लास्टिक और तिरपाल से बने अस्थायी टेंट में रहने को मजबूर हैं। चालयार नदी के पार मुंडेरी इलाके में इन परिवारों की जिंदगी बारिश, गर्मी और दूसरी मुश्किलों के बीच गुजर रही है।
खबर सामने आई तो मानवाधिकार आयोग ने खुद मामला उठाया
इस मामले में अब एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। केरल राज्य मानवाधिकार आयोग ने द हिंदू में प्रकाशित विस्तृत रिपोर्ट के बाद खुद संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया है। आयोग ने अधिकारियों को इन आदिवासी परिवारों के पुनर्वास के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया है। यानी जिन परिवारों की परेशानी लंबे समय से सरकारी व्यवस्था के सामने मौजूद थी, अब उस पर मानवाधिकार आयोग ने सीधे हस्तक्षेप किया है।
कलेक्टर से एक सप्ताह में मांगी पूरी रिपोर्ट
आयोग के न्यायिक सदस्य के. बैजनाथ ने मलप्पुरम के कलेक्टर और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग के परियोजना अधिकारी से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी है। अधिकारियों को बताना होगा कि इन परिवारों के पुनर्वास के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, इस समय उनकी स्थिति क्या है और उन्हें स्थायी रूप से बसाने की प्रक्रिया कब तक पूरी की जाएगी। आयोग ने सिर्फ यह पूछने के बजाय कि काम क्यों नहीं हुआ, अब निश्चित समय सीमा के भीतर पुनर्वास पूरा करने की योजना भी मांगी है।
सवाल सिर्फ घर का नहीं, सम्मान के साथ जिंदगी का है
किसी परिवार का कुछ दिनों या कुछ महीनों तक अस्थायी टेंट में रहना आपदा के बाद मजबूरी हो सकती है, लेकिन सात साल तक प्लास्टिक की छत के नीचे रहना एक बहुत बड़ा सवाल है। इन परिवारों ने बाढ़ में अपना घर खोया था। उसके बाद उनका पुनर्वास होना था, ताकि वे सुरक्षित जगह पर सामान्य जिंदगी शुरू कर सकें। लेकिन अगर सात साल बाद भी परिवार अस्थायी आश्रय में हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि पुनर्वास की प्रक्रिया आखिर कहां अटक गई?
26 परिवारों का इंतजार अब और लंबा नहीं होना चाहिए
इन 26 परिवारों के लिए पुनर्वास का मतलब सिर्फ ईंट और सीमेंट से बने घर देना नहीं है। उन्हें ऐसी जगह चाहिए जहां वे सुरक्षित रह सकें और उनके बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, पानी और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें। आदिवासी परिवारों के पुनर्वास में उनकी सामाजिक और सामुदायिक जरूरतों का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसलिए अब आयोग की कार्रवाई से उम्मीद जगी है कि मामला केवल कागजों में रिपोर्ट बनाने तक सीमित नहीं रहेगा।
सात साल में कितनी बार बदली होगी तारीख?
2019 की बाढ़ से 2026 तक सात साल का समय बहुत लंबा होता है। इस दौरान सरकारें बदल सकती हैं, अधिकारी बदल सकते हैं और योजनाएं बन सकती हैं, लेकिन इन परिवारों के लिए उनकी सबसे बड़ी जरूरत—एक सुरक्षित घर—अभी भी अधूरी है। यही वह बिंदु है जहां प्रशासन से जवाब मांगना जरूरी हो जाता है। अगर पुनर्वास जरूरी था तो इतने वर्षों तक क्यों नहीं हुआ? अगर योजना बनी थी तो जमीन पर क्यों नहीं पहुंची? और अगर कोई बाधा थी तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई से अब उम्मीद
आयोग ने अब अधिकारियों से वर्तमान स्थिति और आगे की पूरी कार्ययोजना मांगी है। इससे उम्मीद है कि वानियमपुझा के इन परिवारों की समस्या को जल्द समाधान की दिशा में ले जाया जाएगा। सबसे जरूरी बात यह होगी कि रिपोर्ट तैयार होने के बाद कार्रवाई भी दिखाई दे। क्योंकि इन परिवारों ने सिर्फ एक सरकारी रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया है—उन्होंने सात साल अपनी जिंदगी का इंतजार करते हुए गुजारे हैं।
अब तिरपाल नहीं, स्थायी छत चाहिए
वानियमपुझा की यह कहानी केवल 26 परिवारों की कहानी नहीं है। यह बताती है कि प्राकृतिक आपदा के बाद सबसे कमजोर लोगों का पुनर्वास कितना महत्वपूर्ण है। बाढ़ घर बहा सकती है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रभावित लोगों को दोबारा सुरक्षित जीवन का आधार मिले। अब मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप के बाद उम्मीद यही है कि इन परिवारों का इंतजार खत्म होगा और उन्हें जल्द स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन मिलेगा।
सात साल तक तिरपाल के नीचे रहने के बाद अब सवाल बहुत सीधा है—क्या 26 आदिवासी परिवारों को आखिरकार उनका स्थायी घर मिलेगा, और क्या इस बार तय समय सीमा के भीतर पुनर्वास सचमुच जमीन पर दिखाई देगा?



