व्यापार/ अर्थव्यवस्था | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 9 सितंबर 2026
रूसी तेल की चर्चा के बीच अमेरिकी LPG का बढ़ता दबदबा
भारत की ऊर्जा जरूरतों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है, जिस पर शायद उतनी चर्चा नहीं हो रही जितनी होनी चाहिए। रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, लेकिन LPG के मामले में अमेरिका तेजी से भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत के LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 55.4 प्रतिशत हो गई। इससे पहले जुलाई में यह हिस्सेदारी लगभग 73 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यानी जिस भारत की घरेलू रसोई का ईंधन लंबे समय तक मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आता रहा, उसकी LPG आपूर्ति व्यवस्था अब तेजी से अमेरिका की ओर मुड़ रही है। यह बदलाव केवल व्यापार का आंकड़ा नहीं है; यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, विदेश नीति, अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता और आने वाले वर्षों की रणनीति से सीधे जुड़ा हुआ है।
भारत LPG के लिए इतना निर्भर क्यों है?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता है। 2025 में भारत ने करीब 2.185 करोड़ टन LPG आयात की थी और उस समय लगभग 90 प्रतिशत LPG आयात मध्य पूर्व से आता था। देश में घरेलू LPG खपत का लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता था। इसका अर्थ बिल्कुल सीधा है—भारतीय घरों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली गैस की आपूर्ति में विदेशों की भूमिका बहुत बड़ी है। यही वजह है कि जब मध्य पूर्व में संघर्ष बढ़ा और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से LPG जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, तब भारत के सामने सिर्फ विदेश नीति का नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की रसोई का सवाल खड़ा हो गया। सरकार को किसी भी कीमत पर LPG उपलब्ध रखनी थी और इसी मजबूरी ने अमेरिकी LPG को भारतीय बाजार में तेजी से जगह दिलाई।
अमेरिका की हिस्सेदारी कुछ महीनों में 12 प्रतिशत से 73 प्रतिशत तक कैसे पहुंची?
यह बदलाव बेहद तेज रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2026 में भारत के LPG आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 12 प्रतिशत थी। मार्च में यह 36.9 प्रतिशत पहुंच गई, मई में 50 प्रतिशत से ऊपर चली गई और जुलाई में करीब 73 प्रतिशत तक पहुंच गई। अगस्त में इसमें कुछ कमी आई और अमेरिकी हिस्सेदारी 55.4 प्रतिशत रही, जबकि संयुक्त अरब अमीरात करीब 15.2 प्रतिशत और अल्जीरिया 11.9 प्रतिशत के साथ फिर महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बने। कुवैत की हिस्सेदारी करीब 8.8 प्रतिशत रही। इसका मतलब यह है कि भारत पूरी तरह किसी एक देश पर निर्भर नहीं हुआ है, बल्कि संकट के बीच उसने तेजी से अपना आपूर्ति नेटवर्क बदला है। लेकिन अमेरिका का 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाना निश्चित रूप से एक बड़ा रणनीतिक बदलाव है।
भारत ने अमेरिका से महंगी और दूर की LPG क्यों खरीदी?
पहली नजर में सवाल उठता है कि जब खाड़ी देश भारत के इतने करीब हैं तो हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका से LPG मंगाने की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब है—आपूर्ति की सुरक्षा। मध्य पूर्व से भारत तक LPG की सामान्य समुद्री यात्रा कुछ ही दिनों में पूरी हो सकती है, लेकिन अमेरिकी खाड़ी क्षेत्र से भारत के पश्चिमी तट तक आने वाले जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है और कुछ जहाज पनामा नहर के रास्ते आते हैं। यात्रा 30 से 45 दिन या उससे अधिक भी हो सकती है। इसके बावजूद भारत ने अमेरिकी LPG खरीदी क्योंकि उस समय निकटवर्ती खाड़ी आपूर्ति विश्वसनीय नहीं थी। यानी भारत ने यहां सस्ती गैस से ज्यादा महत्व गैस की उपलब्धता और रसोई की सुरक्षा को दिया।
अमेरिकी LPG हमेशा महंगी ही होगी, ऐसा भी नहीं है
यह तस्वीर भी पूरी तरह एकतरफा नहीं है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा LPG निर्यातक है और वहां शेल गैस उत्पादन के कारण प्रोपेन की उपलब्धता काफी अधिक है। अमेरिकी LPG की कीमत का एक बड़ा संदर्भ मोंट बेलव्यू बाजार है, जबकि मध्य पूर्व की LPG कीमतें सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइसिंग से जुड़ी होती हैं। अमेरिकी गैस को भारत तक लाने में मालभाड़ा ज्यादा है, लेकिन अमेरिकी बंदरगाहों पर मूल कीमत कम होने से कुछ परिस्थितियों में यह अंतर कम हो सकता है। मौजूदा संकट में हॉर्मुज क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों का युद्ध-जोखिम बीमा भी काफी महंगा हुआ है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि जहाज कितनी दूर से आ रहा है; सवाल यह भी है कि विश्वसनीय आपूर्ति की कीमत कितनी है।
हॉर्मुज संकट ने भारत की कमजोरी उजागर कर दी
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है। भारत की LPG आपूर्ति का करीब 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा संकट से पहले खाड़ी देशों से आता था। जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान आया, तो भारत को अचानक वैकल्पिक स्रोतों की जरूरत पड़ गई। इससे पता चलता है कि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कितनी जोखिमपूर्ण हो सकती है। आज अमेरिका से LPG आ रही है, कल कोई दूसरा संकट पैदा हो सकता है। इसलिए भारत के लिए असली समाधान किसी एक देश को खाड़ी देशों के स्थान पर बैठाना नहीं, बल्कि अमेरिका, खाड़ी देश, अफ्रीका और घरेलू उत्पादन—सभी को मिलाकर एक मजबूत और विविध आपूर्ति व्यवस्था बनाना होना चाहिए।
लेकिन LPG की मांग भी घट गई है
एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है। मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारत में LPG की औसत मांग करीब 10.42 लाख बैरल प्रतिदिन थी। युद्ध और आपूर्ति संकट के बाद मार्च से अगस्त 2026 के बीच यह औसतन करीब 8.62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई—लगभग 20 प्रतिशत की कमी। इसका एक कारण आपूर्ति संकट और कीमतों का दबाव रहा, जिसके कारण सरकार ने खाना पकाने के अलावा कुछ औद्योगिक इस्तेमाल में LPG की खपत घटाने के कदम उठाए। साथ ही भारतीय रिफाइनरियों ने घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाया। इसका मतलब यह है कि आयात घटाने में सिर्फ नए आपूर्तिकर्ताओं का योगदान नहीं है; भारत ने अपनी घरेलू उत्पादन क्षमता और मांग प्रबंधन को भी इस्तेमाल किया है।
फिर भी अमेरिका के साथ लंबी अवधि के करार क्यों महत्वपूर्ण हैं?
अब कहानी 2026 से आगे बढ़कर 2027 तक पहुंच चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों से अगले साल अपने LPG आयात का कम से कम 15 प्रतिशत हिस्सा अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं के साथ वार्षिक समझौतों के जरिए लेने पर विचार करने को कहा है। इससे भी बड़ा संकेत यह है कि रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2027 में अपने LPG आयात का 25 प्रतिशत तक अमेरिका से लेने की योजना पर विचार कर रहा है। यदि ऐसा होता है तो अमेरिकी LPG भारत के ऊर्जा आयात की स्थायी तस्वीर का हिस्सा बन सकती है, भले ही हॉर्मुज संकट खत्म होने के बाद इसकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से नीचे आ जाए।
यह सिर्फ ऊर्जा नीति नहीं, भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता भी है
यहां विदेश नीति और व्यापार का पहलू भी सामने आता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार भारत ने अमेरिका से ऊर्जा खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है और दोनों देशों ने 2030 तक 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य रखा है। ऐसे में अमेरिकी LPG की खरीद भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में भी एक महत्वपूर्ण घटक बन सकती है। लेकिन भारत को सावधान रहना होगा कि व्यापार समझौते के दबाव में ऊर्जा खरीद की ऐसी प्रतिबद्धता न बन जाए जिससे भविष्य में भारतीय कंपनियों को बाजार की वास्तविक जरूरत से ज्यादा महंगी या अनावश्यक LPG खरीदनी पड़े। ऊर्जा सुरक्षा का पहला नियम है—आपूर्ति सुरक्षित हो, लेकिन कीमत और शर्तें भी भारत के हित में हों।
रूस से तेल, अमेरिका से LPG—क्या भारत सचमुच संतुलन बना रहा है?
भारत की मौजूदा ऊर्जा रणनीति दिलचस्प है। कच्चे तेल के मामले में रूस भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, जबकि LPG में अमेरिका तेजी से सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन रहा है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत की पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता का उदाहरण भी हो सकता है—जहां नई दिल्ली किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों से अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से ऊर्जा खरीदती है। भारत के लिए यही रास्ता सबसे उपयोगी हो सकता है। लेकिन अगर LPG में अमेरिकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ती गई और भविष्य में तेल, गैस, तकनीक तथा अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में भी निर्भरता बढ़ती गई, तो सवाल उठेगा कि क्या ऊर्जा विविधीकरण के नाम पर भारत एक नई निर्भरता तो पैदा नहीं कर रहा?
आम भारतीय के लिए इसका मतलब क्या है?
आम परिवार के लिए इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—क्या रसोई गैस उपलब्ध रहेगी और उसकी कीमत कितनी होगी? अगर अमेरिकी LPG भारत को संकट के समय निरंतर आपूर्ति देती है तो यह अच्छी बात है। लेकिन लंबी समुद्री दूरी, मालभाड़ा और भू-राजनीतिक जोखिम कीमत को प्रभावित कर सकते हैं। दूसरी तरफ खाड़ी आपूर्ति अगर हॉर्मुज संकट के बाद सामान्य हो जाती है तो वहां से आने वाली LPG फिर अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकती है। इसलिए भारत को किसी एक स्रोत को स्थायी विजेता बनाने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें संकट आने पर तुरंत दूसरे स्रोत सक्रिय हो सकें और भारतीय उपभोक्ता को झटका न लगे।
सबसे बड़ा सबक—ऊर्जा सुरक्षा का मतलब सिर्फ ज्यादा खरीदना नहीं
भारत के सामने अब एक बड़ा अवसर भी है। घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाना, रिफाइनरियों की क्षमता बढ़ाना, रणनीतिक भंडार और दीर्घकालीन आपूर्ति करारों में विविधता लाना तथा अमेरिका, खाड़ी और अन्य उत्पादक देशों के बीच संतुलन बनाए रखना—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज का संकट कल की ऊर्जा नीति तय करता है। हॉर्मुज ने दिखा दिया कि दूर किसी समुद्री मार्ग पर युद्ध हो तो उसका असर भारत की रसोई तक पहुंच सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा अब सिर्फ पेट्रोलियम मंत्रालय का विषय नहीं रही; यह भारत की विदेश नीति, आर्थिक नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन चुकी है।
अंतिम सवाल—क्या भारत ने संकट से सही सबक लिया है?
अमेरिका का भारत के LPG बाजार में 55 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी तक पहुंचना निश्चित रूप से बड़ी खबर है, लेकिन इसे न तो पूरी जीत कहा जा सकता है और न ही नई निर्भरता का संकट। असली तस्वीर यह है कि भारत ने मध्य पूर्व की आपूर्ति में संकट आते ही तेजी से अमेरिकी LPG का रास्ता अपनाया, घरेलू उत्पादन बढ़ाया और अपनी खरीद को दूसरे देशों तक फैलाया। अगर हॉर्मुज की स्थिति सामान्य होती है तो अमेरिकी हिस्सेदारी घट सकती है, लेकिन 2027 के संभावित दीर्घकालीन करार बताते हैं कि अमेरिका अब भारत की LPG कहानी से बाहर जाने वाला नहीं है।
अब भारत के नीति-निर्माताओं के सामने असली परीक्षा यही है—क्या वे अमेरिका, रूस, ईरान और खाड़ी देशों के बीच अपने रणनीतिक संबंधों को संतुलित रखते हुए ऐसी ऊर्जा व्यवस्था बनाएंगे जिसमें किसी युद्ध, प्रतिबंध या समुद्री नाकेबंदी से भारत की रसोई और अर्थव्यवस्था बंधक न बने? क्योंकि असली आत्मनिर्भरता किसी एक देश से दूरी बनाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर किसी एक देश पर निर्भर न रहना है।




