महाराष्ट्र | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 8 सितंबर 2026
आंकड़ों ने दिखाया तुकाराम मुंढे के 100 दिनों का असर
महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए में आयुक्त तुकाराम मुंढे के करीब 100 दिनों के कार्यकाल में दवा निर्माताओं और विक्रेताओं के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अंग्रेजी अखबार “द हिंदू” द्वारा देखे गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025-26 की तुलना में जून से अगस्त 2026 के तीन महीनों में एफडीए को मिलने वाली शिकायतों की संख्या में 557 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई। शिकायतों की जांच में 378 प्रतिशत और तलाशी तथा जब्ती की कार्रवाई में 217 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी इन तीन महीनों में विभाग की निगरानी और कार्रवाई पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हुई।
शिकायतों से लेकर छापों तक कार्रवाई तेज
आंकड़ों की सबसे बड़ी तस्वीर शिकायतों की जांच और तलाशी-जब्ती की कार्रवाई में दिखाई देती है। शिकायतों की संख्या में 557 प्रतिशत की वृद्धि का मतलब है कि विभाग के सामने पहले की तुलना में कहीं ज्यादा शिकायतें पहुंचीं या उन्हें दर्ज किया गया। इसके साथ शिकायतों की जांच 378 प्रतिशत बढ़ी और तलाशी तथा जब्ती की कार्रवाई 217 प्रतिशत बढ़ गई। इससे साफ संकेत मिलता है कि एफडीए ने दवाओं के निर्माण और बिक्री से जुड़े मामलों में निगरानी तथा जांच को अधिक सक्रिय किया। दवाओं की गुणवत्ता और उनकी बिक्री सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी है, इसलिए इस तरह की नियामकीय सख्ती का जनहित के नजरिए से खास महत्व है।
लेकिन लाइसेंस रद्द करने में उतनी बड़ी छलांग नहीं
दिलचस्प बात यह है कि कार्रवाई के आंकड़ों में हर क्षेत्र में इतनी बड़ी वृद्धि नहीं हुई। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि लाइसेंस रद्द करने या निलंबित करने जैसी नियामकीय कार्रवाइयों में कोई बहुत बड़ा उछाल नहीं आया। पिछले पांच वर्षों में जहां हर महीने औसतन करीब 258 नियामकीय कार्रवाइयां हुईं, वहीं जून से अगस्त 2026 के दौरान यह औसत बढ़कर लगभग 293 प्रति माह रहा। यानी कार्रवाई बढ़ी जरूर, लेकिन लाइसेंस रद्द या निलंबित करने के मामले में वृद्धि उस स्तर की नहीं रही, जैसी शिकायतों की जांच और तलाशी-जब्ती में दिखाई दी।
क्या बदल गया एफडीए का काम करने का तरीका?
इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आता है—क्या एफडीए में काम करने की प्राथमिकताओं और निगरानी के तरीके में बदलाव आया है? शिकायत मिलने के बाद उसकी जांच, संदिग्ध गतिविधियों की तलाश और जब्ती जैसी कार्रवाई में इतनी तेज वृद्धि यह संकेत देती है कि विभाग ने जमीनी स्तर पर निगरानी बढ़ाई है। हालांकि केवल तीन महीनों के आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि यह बदलाव लंबे समय तक बना रहेगा। इसके लिए आने वाले महीनों के आंकड़ों को देखना भी जरूरी होगा।
100 दिन का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?
तुकाराम मुंढे की पहचान लंबे समय से प्रशासनिक सख्ती और सक्रिय कामकाज के लिए रही है। एफडीए के इन आंकड़ों ने उनके करीब 100 दिनों के कार्यकाल को लेकर एक ठोस तस्वीर जरूर सामने रखी है। शिकायतों में 557 प्रतिशत, जांच में 378 प्रतिशत और तलाशी-जब्ती में 217 प्रतिशत की बढ़ोतरी निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि लाइसेंस रद्द करने और निलंबित करने जैसी कार्रवाइयों में केवल सीमित वृद्धि हुई है। इसलिए पूरे कार्यकाल का आकलन केवल छापों की संख्या से नहीं, बल्कि यह देखकर होना चाहिए कि इन कार्रवाइयों के बाद दवा बाजार में नियमों का पालन, दवाओं की गुणवत्ता और आम लोगों की सुरक्षा पर कितना असर पड़ा।
जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल
दवा और खाद्य सुरक्षा से जुड़े विभाग की असली सफलता केवल ज्यादा शिकायतें दर्ज करने या ज्यादा छापे मारने में नहीं, बल्कि मिलावट, घटिया दवाओं और नियम तोड़ने वालों पर प्रभावी कार्रवाई करके आम लोगों का भरोसा मजबूत करने में है। तुकाराम मुंढे के 100 दिनों के आंकड़े बताते हैं कि एफडीए की गतिविधियां तेज हुई हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आने वाले महीनों में यह सख्ती कितनी निरंतर रहती है और क्या इसका सीधा लाभ महाराष्ट्र के करोड़ों उपभोक्ताओं और मरीजों को मिलता है।




