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एक साल में चौथी बार तबादला! MP की IAS अफसर बोलीं—“मैं आसान निशाना बन गई हूं”

50 दिन में फिर ट्रांसफर, अफसर का दर्द—“काम समझने से पहले हटा दिया जाता है”; अधीनस्थों पर धमकाने और फाइलें रोकने के आरोप, IAS एसोसिएशन को लिखी चिट्ठी

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | भोपाल | 8 सितंबर 2026

50 दिन की पोस्टिंग, फिर तबादला

मध्य प्रदेश की 2011 बैच की आईएएस अधिकारी नेहा मरव्या का एक साल के भीतर चौथी बार तबादला होने के बाद उन्होंने अपनी पीड़ा आईएएस एसोसिएशन के सामने रखी है। आदिवासी क्षेत्र विकास परियोजना की निदेशक के रूप में जिम्मेदारी संभालने के महज 50 दिन बाद उनका तबादला कर दिया गया। इससे पहले भी उनके छोटे-छोटे कार्यकाल चर्चा में रहे हैं। मरव्या ने एसोसिएशन के व्हाट्सऐप समूह में अपनी चिट्ठी साझा करते हुए सवाल उठाया कि जब किसी अधिकारी को काम समझने और व्यवस्था सुधारने के लिए ही कुछ महीने नहीं दिए जाएंगे, तो वह प्रभावी तरीके से काम कैसे कर पाएगा?

“जब तक काम समझती हूं, तब तक हटा दिया जाता है”

नेहा मरव्या ने अपनी चिट्ठी में कहा कि उन्होंने हमेशा सरकार के तबादला आदेशों को सम्मान के साथ स्वीकार किया, लेकिन इस बार वह बेहद निराश महसूस कर रही हैं। उनका कहना है कि एक अधिकारी को किसी नई जिम्मेदारी को समझने में ही समय लगता है, लेकिन उन्हें बार-बार दो-तीन महीने के भीतर ही हटा दिया जाता है। उन्होंने सवाल किया कि “जब तक मैं जिम्मेदारी समझती हूं, तब तक मुझे हटा दिया जाता है, फिर मैं काम कैसे करूं?” यह सवाल सिर्फ एक अधिकारी की व्यक्तिगत परेशानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में स्थिरता और जवाबदेही को लेकर भी गंभीर बहस खड़ी करता है।

अधीनस्थों पर धमकाने का आरोप

मरव्या ने अपनी शिकायत में दावा किया कि उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारियों ने उनकी मेज थपथपाई और उनका तबादला करवाने की धमकी तक दी। उन्होंने अधीनस्थों की कथित अनुशासनहीनता और फाइलें रोकने की शिकायत भी की थी। उनका आरोप है कि जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद थी, उनके बजाय उन्हें ही पद से हटा दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक आईएएस अधिकारी की स्थिति इतनी कमजोर हो सकती है कि अधीनस्थ कर्मचारी उसके तबादले को प्रभावित करने की धमकी देने लगें?

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“हमेशा साजिश करने वाले जीतते हैं, मैं हार जाती हूं”

अपनी चिट्ठी में मरव्या ने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उन्होंने वर्षों तक धैर्य रखा और उम्मीद की कि परिस्थितियां सुधरेंगी, लेकिन अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अधीनस्थ उन्हें धमकाने लगे हैं। उन्होंने लिखा कि “हमेशा साजिश करने वाले जीतते हैं और मैं असफल होती हूं। व्यवस्था ने मुझे विफल कर दिया है।” उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आज अगर वह निशाना बनी हैं तो कल कोई दूसरा आईएएस अधिकारी भी ऐसी स्थिति का सामना कर सकता है। आईएएस एसोसिएशन की ओर से इस चिट्ठी पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

पहले भी तबादलों और विवादों का इतिहास

नेहा मरव्या का प्रशासनिक करियर इससे पहले भी तबादलों और विवादों के कारण चर्चा में रहा है। जनवरी 2025 में डिंडोरी कलेक्टर का पद संभालने के करीब आठ महीने बाद उन्हें वहां से हटा दिया गया था। 2017 में शिवपुरी जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी रहते हुए तत्कालीन कलेक्टर ओपी श्रीवास्तव के साथ वाहन भुगतान को लेकर उनका विवाद सामने आया था। 2022 में उन्होंने आरोप लगाया था कि तत्कालीन प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने उन्हें राजस्व विभाग में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने के लिए कार्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया।

सवाल सिर्फ नेहा मरव्या का नहीं

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बार-बार होने वाले छोटे कार्यकाल प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर नहीं करते? किसी अधिकारी को अगर कुछ ही हफ्तों या महीनों में नई जगह भेज दिया जाए तो वह किसी विभाग की समस्याओं को समझेगा कब, सुधार की योजना बनाएगा कब और उसके परिणामों की जिम्मेदारी लेगा कब? दूसरी तरफ सरकार के पास तबादले करने के प्रशासनिक अधिकार होते हैं और हर तबादले को अपने आप गलत नहीं माना जा सकता। लेकिन जब एक वरिष्ठ अधिकारी खुद सार्वजनिक रूप से कहे कि लगातार छोटे कार्यकाल के कारण वह काम नहीं कर पा रही हैं और उन्हें अधीनस्थों की शिकायत करने के बाद हटाया गया, तो इस पूरे घटनाक्रम की पारदर्शी समीक्षा की मांग जरूर उठती है।

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क्या सिस्टम अफसर से बड़ा हो गया है?

आईएएस अधिकारी सरकार की नीतियों को जमीन पर लागू करने वाली प्रशासनिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। अगर किसी अधिकारी को अपने ही अधीनस्थों से अनुशासन बनाए रखने में परेशानी हो और शिकायत के बाद कार्रवाई अधिकारी के तबादले के रूप में सामने आए, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि प्रशासनिक अधिकार वास्तव में किसके हाथ में हैं। क्या ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारी को राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलती है? क्या अफसरों के छोटे कार्यकाल विकास और शासन की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करते? और अगर किसी अधिकारी को लगता है कि व्यवस्था ने उसे विफल कर दिया है, तो उसकी शिकायत सुनने की जिम्मेदारी किसकी है?

नेहा मरव्या का मामला अब सिर्फ एक तबादले की खबर नहीं रह गया है। यह मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है—अगर एक आईएएस अधिकारी को बार-बार इतनी जल्दी हटाया जाएगा, तो शासन चलेगा कैसे और जवाबदेही तय होगी कैसे?

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