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अराल सागर से तिब्बत तक: क्या 60 साल पुरानी इंसानी भूल अब हिमालय को निगल रही है?

नदियों से छेड़छाड़ से लेकर पहाड़ों में अंधाधुंध निर्माण तक—प्रकृति के साथ लगातार खिलवाड़ का खामियाजा अब नेपाल, भारत और पूरे दक्षिण एशिया को भुगतना पड़ रहा है

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीति विशेषज्ञ | नई दिल्ली | 5 सितंबर 2026

क्या नेपाल की आज की तबाही की शुरुआत 60 साल पहले हो गई थी?

यह सवाल सुनने में अजीब जरूर लगता है, लेकिन आज हिमालय, नेपाल और दक्षिण एशिया में दिखाई दे रहे पर्यावरणीय संकट को केवल एक दिन की भारी बारिश या अचानक आई बाढ़ मान लेना शायद बहुत बड़ी भूल होगी। इसकी जड़ें कहीं ज्यादा पुरानी हो सकती हैं। करीब 60 साल पहले मध्य एशिया में इंसान ने नदियों के प्राकृतिक रास्ते में बड़े पैमाने पर बदलाव किया था। उस समय उद्देश्य खेती बढ़ाना और पानी का ज्यादा इस्तेमाल करना था। लेकिन धीरे-धीरे उसका परिणाम अराल सागर की तबाही के रूप में सामने आया। आज वही इतिहास हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति की व्यवस्था को सिर्फ तत्काल आर्थिक फायदे के लिए बदलना कितना खतरनाक हो सकता है। हिमालय और तिब्बत में आज तापमान बढ़ रहा है, बर्फ और ग्लेशियर बदल रहे हैं, पहाड़ों की जमीन कमजोर हो रही है और उसी संवेदनशील इलाके में सड़क, सुरंग, बांध और बिजली परियोजनाओं का जाल फैल रहा है। सवाल यह है कि क्या हम अराल सागर से मिले सबक को समझे बिना हिमालय में भी वही गलती दोहरा रहे हैं?

1960 का दशक: अराल सागर के साथ शुरू हुआ बड़ा प्रयोग

1960 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ ने मध्य एशिया में खेती बढ़ाने के लिए अमू दरिया और सिर दरिया नदियों के पानी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू किया। ये नदियां अराल सागर को पानी देती थीं। उस समय ज्यादा खेत, ज्यादा सिंचाई और ज्यादा उत्पादन को विकास की सफलता माना गया। किसी ने यह नहीं सोचा कि अगर समुद्र जैसी विशाल झील में पहुंचने वाला पानी लगातार कम कर दिया गया तो उसके साथ क्या होगा। धीरे-धीरे अराल सागर सिकुड़ने लगा। मछलियों का कारोबार खत्म होने लगा, बंदरगाह सूख गए, आसपास की जमीन बदलने लगी और अंततः विशाल जल क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सूखे, नमकीन मैदान में बदल गया। जिसे कभी विकास की उपलब्धि समझा गया था, वही कुछ दशकों बाद पर्यावरणीय त्रासदी बन गया।

अराल सागर की कहानी का सबसे बड़ा सबक क्या है?

अराल सागर हमें यह बताता है कि प्रकृति की किसी एक व्यवस्था को बदलने का असर उसी जगह तक सीमित नहीं रहता। पानी कम हुआ तो मछलियां कम हुईं, मछली उद्योग खत्म हुआ, स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई और सूखे समुद्र की जमीन से नमक तथा धूल उड़ने लगी। इस बदलाव ने पूरे क्षेत्र के पर्यावरण और लोगों के जीवन को प्रभावित किया। हालांकि दुनिया के हर मौसम परिवर्तन को सीधे अराल सागर से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन यह उदाहरण इतना जरूर दिखाता है कि इंसान जब किसी प्राकृतिक संतुलन को बड़े पैमाने पर बदलता है तो उसके परिणाम कई पीढ़ियों तक भुगतने पड़ सकते हैं।

अब वही सवाल हिमालय के सामने खड़ा है

आज सवाल तिब्बती पठार और हिमालय को लेकर है। यह इलाका केवल पहाड़ों की खूबसूरत श्रृंखला नहीं है। यहां जमा बर्फ, ग्लेशियर, नदियां और जमी हुई जमीन पूरे एशिया की जल व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के करोड़ों लोगों की जिंदगी किसी न किसी रूप में इसी प्राकृतिक व्यवस्था से जुड़ी है। अगर ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ तेजी से पिघलती है, जमी हुई जमीन कमजोर होती है, ग्लेशियरों का आकार बदलता है और भारी बारिश के साथ पहाड़ों की ढलान टूटती है तो उसका असर नीचे के गांवों, शहरों, खेतों और नदियों तक पहुंचता है। इसलिए हिमालय में होने वाली कोई बड़ी घटना सिर्फ हिमालय की खबर नहीं है—यह पूरे दक्षिण एशिया की खबर है।

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26 अगस्त की हिमालयी घटना ने खतरे की घंटी बजा दी

26 अगस्त की ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र की घटना ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया। बर्फ, चट्टान और जमी हुई जमीन के बड़े हिस्से के टूटने के बाद पानी, मिट्टी और पत्थरों का विशाल मलबा नीचे की ओर आया और नदियों तथा घाटियों में तेजी से फैल गया। कई इलाकों में सड़कें, पुल और बस्तियां प्रभावित हुईं। घटना ने यह दिखा दिया कि हजारों मीटर की ऊंचाई पर होने वाला एक बदलाव कुछ ही समय में नीचे रहने वाले लोगों की जिंदगी को उलट सकता है। इस तरह की घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों में बदलाव, भारी बारिश, कमजोर ढलान और मानवीय गतिविधियों जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए किसी एक कारण को अंतिम वजह मानने के बजाय पूरे पर्यावरणीय तंत्र को समझना जरूरी है।

क्या हमने हिमालय को विकास की प्रयोगशाला बना दिया है?

विकास जरूरी है। भारत और नेपाल जैसे देशों को सड़कें चाहिए, बिजली चाहिए, रोजगार चाहिए, अस्पताल चाहिए और दूरदराज के इलाकों को शहरों से जोड़ना भी जरूरी है। लेकिन असली सवाल विकास के खिलाफ होना नहीं है, बल्कि यह पूछना है कि विकास कहां, कितना और किस तरीके से किया जाए। पहाड़ मैदान नहीं हैं। यहां एक सड़क बनाने के लिए पहाड़ काटना पड़ता है, सुरंग बनाने के लिए चट्टान के भीतर जाना पड़ता है और बांध बनाने के लिए नदी की प्राकृतिक व्यवस्था बदलनी पड़ती है। अगर एक संवेदनशील इलाके में ऐसी दर्जनों परियोजनाएं एक साथ बनें तो क्या किसी ने यह हिसाब लगाया है कि प्रकृति पर कुल दबाव कितना बढ़ रहा है?

सड़क और सुरंग जरूरी हैं, लेकिन पहाड़ की कीमत पर नहीं

हिमालय में सड़क और सुरंगें लोगों को जोड़ती हैं और आपदा के समय मदद पहुंचाने में भी उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन सवाल उनकी जरूरत का नहीं, बल्कि उनकी योजना का है। अगर पहाड़ की भूगर्भीय स्थिति को ठीक से समझे बिना लगातार खुदाई की जाए, प्राकृतिक जलधाराओं के रास्ते बदले जाएं और जंगल काटे जाएं तो बारिश या भूस्खलन के समय खतरा बढ़ सकता है। हमें हर परियोजना को सिर्फ इस नजर से नहीं देखना चाहिए कि उससे कितने किलोमीटर सड़क बनी या कितनी बिजली पैदा हुई। यह भी देखना होगा कि उस परियोजना के कारण पहाड़, नदी, जंगल और स्थानीय लोगों की जिंदगी पर अगले 20, 30 या 50 साल में क्या असर पड़ेगा।

बांध और बिजली परियोजनाओं पर अब नए सवाल जरूरी हैं

भारत को ऊर्जा चाहिए और हिमालय में जलविद्युत की बड़ी संभावना है। लेकिन हर नदी पर बड़ी परियोजना बनाना जरूरी नहीं हो सकता। जिस क्षेत्र में पहाड़ पहले से कमजोर हों, वहां अचानक आने वाली बाढ़ और भारी मलबा बांधों, सुरंगों और बिजलीघरों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए अब समय आ गया है कि पुरानी और नई परियोजनाओं की आपदा के नए खतरे को ध्यान में रखकर दोबारा जांच की जाए। किसी परियोजना की आर्थिक उपयोगिता के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर वहां एक असाधारण बाढ़ या भूस्खलन हुआ तो क्या होगा और उसका नुकसान कितने जिलों तथा कितने लोगों तक पहुंच सकता है।

सबसे कम प्रदूषण करने वाले लोग सबसे ज्यादा नुकसान क्यों झेलें?

जलवायु संकट की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसका नुकसान हर जगह बराबर नहीं होता। दक्षिण एशिया के गरीब और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है, लेकिन बाढ़, गर्मी, भूस्खलन और पानी की समस्या का असर उन्हें बहुत ज्यादा झेलना पड़ता है। नेपाल इसका बड़ा उदाहरण है। जब दुनिया के बड़े औद्योगिक देश दशकों तक भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करते रहे और दूसरी तरफ गरीब देश अपनी सीमित क्षमता में जीवन चलाते रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—जलवायु संकट पैदा करने में जिसका योगदान कम है, नुकसान का सबसे बड़ा बोझ उसी के सिर क्यों आए?

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अराल से हिमालय और फिर मैदानों तक एक ही कहानी

हिमालय में ऊपर जो होता है, उसका असर नीचे तक जाता है। पहाड़ में बर्फ और पानी का संतुलन बदलेगा तो नदियों का प्रवाह बदलेगा। नदियों का प्रवाह बदलेगा तो खेत प्रभावित होंगे। खेत प्रभावित होंगे तो भोजन और रोजगार पर असर पड़ेगा। उसके बाद यही समस्या शहरों और बाजारों तक पहुंचेगी। नेपाल से आने वाली नदियों का असर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक हो सकता है और आगे बांग्लादेश तक पहुंच सकता है। इसलिए हिमालय को किसी एक देश का पर्यावरणीय विषय समझना गलत है। यह पूरे दक्षिण एशिया की साझा जीवनरेखा है।

जंगल काटकर विकास करने का मॉडल कितनी दूर चलेगा?

यह सवाल हिमालय से बाहर भी पूछा जाना चाहिए। अंडमान-निकोबार के जंगलों से लेकर छत्तीसगढ़, असम और अरुणाचल प्रदेश तक विकास और पर्यावरण के बीच संघर्ष की खबरें सामने आती रही हैं। जंगल सिर्फ लकड़ी या जमीन नहीं होते। वे पानी रोकते हैं, मिट्टी को बांधते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं और हजारों प्रजातियों को घर देते हैं। स्थानीय और आदिवासी समुदायों की जिंदगी भी इन्हीं जंगलों से जुड़ी होती है। इसलिए किसी जंगल को सिर्फ इसलिए खाली जमीन नहीं समझा जा सकता क्योंकि वहां कोई बड़ी परियोजना बन सकती है। जिस जंगल को काटकर आज पैसा मिलेगा, उसके खत्म होने की कीमत आने वाली पीढ़ियां चुका सकती हैं।

क्या विकास का फायदा कुछ लोगों को और नुकसान करोड़ों को मिलेगा?

बड़ी परियोजनाओं से उद्योगों और अर्थव्यवस्था को फायदा मिल सकता है। लेकिन अगर उनका पर्यावरणीय नुकसान बहुत बड़ा हो तो सवाल यह है कि उसका बोझ कौन उठाएगा। किसी परियोजना का लाभ अगर कुछ कंपनियों या शहरों तक पहुंचता है और उसका नुकसान गांवों, किसानों, जंगलों और नदियों को झेलना पड़ता है तो विकास का यह मॉडल सवालों के घेरे में आना चाहिए। लाभ का हिसाब और नुकसान का हिसाब एक ही किताब में होना चाहिए। तभी पता चलेगा कि कोई परियोजना वास्तव में देश के लिए फायदेमंद है या सिर्फ कागज पर।

राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़ना होगा

ऐसी आपदाओं के बाद आरोप लगाना आसान होता है। कोई चीन को जिम्मेदार बताएगा, कोई भारत को, कोई किसी राज्य की सरकार को, कोई किसी बांध को और कोई जलवायु परिवर्तन को। लेकिन सिर्फ आरोप लगाने से पहाड़ सुरक्षित नहीं होंगे। हिमालय की नदियां सीमा देखकर नहीं बहतीं और बादल पासपोर्ट लेकर नहीं आते। इसलिए भारत, नेपाल, चीन, भूटान और बांग्लादेश को साझा वैज्ञानिक जानकारी और आपदा चेतावनी व्यवस्था पर काम करना होगा। अगर ऊपर पहाड़ में खतरा पैदा होने के कुछ घंटे पहले नीचे के गांवों को जानकारी मिल जाए तो बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया जा सकता है।

भारत को पूरे दक्षिण एशिया की आवाज बनना होगा

भारत की जिम्मेदारी इस मामले में और बड़ी है। भारत के पास वैज्ञानिक संस्थान, मौसम विशेषज्ञ, जल विशेषज्ञ और बड़ी तकनीकी क्षमता है। उसे सिर्फ अपने हिस्से की समस्या देखने के बजाय पूरे दक्षिण एशिया के लिए पहल करनी चाहिए। हिमालयी ग्लेशियरों, नदियों, भूस्खलन और बाढ़ की साझा निगरानी व्यवस्था बनाई जा सकती है। नेपाल और भारत के बीच नदी तथा आपदा संबंधी जानकारी का आदान-प्रदान और मजबूत होना चाहिए। बांग्लादेश और दूसरे पड़ोसी देशों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिए। हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश की सीमा से संभव नहीं है।

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दुनिया को भी अपनी विकास की रफ्तार पर सवाल करना होगा

यह कहना आसान है कि विकास रोक दिया जाए, लेकिन ऐसा संभव नहीं है। दुनिया की अरबों आबादी को घर, बिजली, सड़क, रोजगार और भोजन चाहिए। इसलिए रास्ता विकास रोकना नहीं, बल्कि विकास को प्रकृति के साथ संतुलित करना है। बड़े पैमाने पर जंगल काटना, बिना सीमा खनन करना और हर संवेदनशील इलाके में भारी निर्माण करना विकास का स्थायी रास्ता नहीं हो सकता। दुनिया के बड़े कार्बन उत्सर्जक देशों को उत्सर्जन घटाना होगा और गरीब तथा संवेदनशील देशों को जलवायु नुकसान से बचने के लिए पर्याप्त पैसा और तकनीक देनी होगी।

अराल सागर ने 60 साल में अपना दर्द दिखाया, हिमालय शायद इतना समय न दे

अराल सागर की त्रासदी धीरे-धीरे सामने आई। उसे बर्बाद होने में कई दशक लगे। लेकिन आज दुनिया तेजी से बदल रही है। तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर बदल रहे हैं और पहाड़ों पर मानवीय दबाव भी बढ़ रहा है। इसलिए अगली बड़ी पर्यावरणीय त्रासदी को सामने आने में 60 साल लगें, यह जरूरी नहीं। कई बदलाव कुछ वर्षों में ही गंभीर रूप ले सकते हैं। यही कारण है कि आज की हिमालयी घटनाओं को सिर्फ आज की खबर मानना खतरनाक होगा। यह भविष्य के खतरे का संकेत भी हो सकती हैं।

प्रकृति बदला नहीं लेती, लेकिन हिसाब जरूर मांगती है

हम अक्सर कहते हैं कि प्रकृति हमसे बदला ले रही है। शायद बात इससे भी सीधी है। प्रकृति बदला नहीं लेती, वह सिर्फ अपने नियमों के अनुसार प्रतिक्रिया देती है। नदी को रोकेंगे तो वह किसी न किसी रास्ते से आगे बढ़ेगी। जंगल हटाएंगे तो मिट्टी की पकड़ कमजोर होगी। पहाड़ काटेंगे तो उसकी ढलान बदलेगी। तापमान बढ़ेगा तो बर्फ और पानी का संतुलन भी बदलेगा। समस्या यह है कि हम इन संकेतों को तब समझते हैं जब नुकसान सामने आ चुका होता है।

अब सवाल अगली तबाही का नहीं, अगली गलती का है

अराल सागर हमें छह दशक से ज्यादा समय से चेतावनी दे रहा है। उसने बताया कि विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किया गया बदलाव कभी-कभी इतनी बड़ी कीमत मांग सकता है जिसकी भरपाई इंसान की कई पीढ़ियां भी नहीं कर पातीं। अब हिमालय हमारे सामने खड़ा है। सवाल यह नहीं कि हमें सड़क चाहिए या बिजली चाहिए। सवाल यह है कि क्या हमें सड़क और बिजली ऐसी कीमत पर चाहिए, जिसमें पहाड़, जंगल, नदी और आने वाली पीढ़ियां अपना भविष्य खो दें?

अंतिम सवाल: क्या हम समय रहते रुकेंगे?

अगर अभी भी हमने चेतावनियों को नजरअंदाज किया, वैज्ञानिकों की बात को किनारे रखा और हर प्राकृतिक सीमा को विकास की बाधा मान लिया, तो आने वाले समय में नुकसान और बड़ा हो सकता है। तब शायद हम फिर वही करेंगे—बाढ़ आएगी, राहत भेजेंगे, टूटी सड़कें बनाएंगे, मुआवजा देंगे, जांच बैठाएंगे और कुछ समय बाद सब भूल जाएंगे। लेकिन प्रकृति भूलती नहीं। अराल सागर की कहानी हमारे सामने है, हिमालय की कहानी अभी लिखी जा रही है। सवाल सिर्फ इतना है कि उस कहानी का अगला अध्याय हम समझदारी से लिखेंगे या फिर एक और बड़ी त्रासदी के बाद पढ़ेंगे।

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