राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 सितंबर 2026
विदेशी पर्यटक ने टिकट बोर्ड दिखाकर पूछा—विदेशियों के लिए ज्यादा शुल्क क्यों?
दिल्ली के मशहूर दिल्ली हाट में भारतीय और विदेशी पर्यटकों के लिए अलग-अलग प्रवेश शुल्क देखकर एक विदेशी पर्यटक ने सवाल खड़ा कर दिया। पर्यटक ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में टिकट दरों वाले बोर्ड की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारतीय पर्यटकों की तुलना में विदेशियों से अधिक शुल्क लिया जा रहा है। बोर्ड के अनुसार, वयस्क भारतीयों के लिए प्रवेश शुल्क ₹30, 5 से 12 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए ₹20 और विदेशी पर्यटकों के लिए ₹100 निर्धारित है। इसी अंतर को दिखाते हुए पर्यटक ने सवाल किया कि अगर ब्रिटेन में किसी विदेशी से अलग शुल्क लिया जाता तो उसे नस्लवाद कहा जाता, लेकिन भारत में ऐसा क्यों स्वीकार किया जाता है। वीडियो के साथ ‘भारत में नस्लवाद?’ जैसा सवाल भी लिखा गया, जिसके बाद सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर जोरदार चर्चा शुरू हो गई।
सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछा—क्या अलग शुल्क को नस्लवाद कहना सही है?
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने विदेशी पर्यटक की तुलना पर सवाल उठाया। कई लोगों ने कहा कि अलग-अलग देशों में स्थानीय नागरिकों और विदेशी नागरिकों के लिए अलग शुल्क होना कोई असामान्य बात नहीं है। कुछ लोगों ने पश्चिमी देशों की विश्वविद्यालय फीस का उदाहरण देते हुए पूछा कि जब विदेशी छात्रों से कई जगह स्थानीय छात्रों की तुलना में काफी ज्यादा शुल्क लिया जाता है, तो क्या उसे भी नस्लवाद कहा जाएगा। कुछ भारतीय उपयोगकर्ताओं ने यह भी याद दिलाया कि कई भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा के लिए स्थानीय छात्रों की तुलना में कहीं अधिक फीस देते हैं। इसी आधार पर लोगों ने कहा कि केवल विदेशी पर्यटकों से ज्यादा प्रवेश शुल्क लिया जाना अपने आप में नस्लवाद साबित नहीं करता।
भारत ही नहीं, कई देशों में है अलग-अलग शुल्क की व्यवस्था
बहस में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई कि विदेशी और स्थानीय पर्यटकों के लिए अलग प्रवेश शुल्क केवल भारत की व्यवस्था नहीं है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यूरोप के उदाहरण देते हुए कहा कि कई जगह गैर-यूरोपीय संघ के पर्यटकों से स्थानीय या यूरोपीय संघ के नागरिकों की तुलना में अधिक शुल्क लिया जाता है। दुनिया के कई पर्यटन स्थलों पर स्थानीय लोगों के लिए कम और विदेशी पर्यटकों के लिए अधिक शुल्क रखा जाता है। इसके पीछे आमतौर पर स्थानीय सरकारी सहायता, सार्वजनिक धन, पर्यटन नीति, संरक्षण खर्च और स्थानीय लोगों की आय तथा विदेशी पर्यटकों की भुगतान क्षमता जैसे कारण बताए जाते हैं। इसलिए केवल शुल्क में अंतर देखकर किसी व्यवस्था को सीधे नस्लवाद कहना एक अलग बहस का विषय है।
भारतीयों ने दिया टैक्स और सार्वजनिक सुविधाओं का तर्क
कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने यह तर्क भी दिया कि भारत में कई सार्वजनिक स्थलों और पर्यटन सुविधाओं के रखरखाव में सरकारी धन और भारतीय करदाताओं का पैसा लगता है। ऐसे में स्थानीय नागरिकों के लिए कम शुल्क और विदेशी पर्यटकों के लिए अधिक शुल्क रखने की नीति को अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। लोगों ने कहा कि यहां सवाल किसी व्यक्ति की नस्ल या रंग के आधार पर भेदभाव करने का नहीं, बल्कि स्थानीय और विदेशी आगंतुकों के लिए अलग शुल्क तय करने की नीति का है। हालांकि दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ सकता है कि किसी देश में विदेशी पर्यटकों के लिए शुल्क कितना ज्यादा होना उचित है और क्या शुल्क का अंतर इतना बड़ा होना चाहिए कि किसी आगंतुक को भेदभाव महसूस हो।
₹30 से ₹100 का अंतर बना चर्चा का केंद्र
दिल्ली हाट के टिकट बोर्ड पर भारतीय वयस्क के लिए ₹30 और विदेशी पर्यटक के लिए ₹100 का शुल्क दर्ज होना इस पूरे विवाद का मुख्य कारण बना। यानी विदेशी वयस्क को भारतीय वयस्क की तुलना में लगभग तीन गुना से ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। इसी अंतर को देखकर विदेशी पर्यटक ने अपना सवाल उठाया। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी शुल्क व्यवस्था को नस्लवाद मानने के लिए केवल कीमत का अंतर पर्याप्त आधार नहीं है। इसके पीछे लागू नियम, शुल्क तय करने का उद्देश्य और यह व्यवस्था सभी विदेशी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है या नहीं—इन सभी बातों को देखना जरूरी है।
एक छोटे वीडियो ने खड़ी कर दी बड़ी बहस
दिल्ली हाट का यह मामला अब केवल ₹100 की टिकट का सवाल नहीं रह गया है। इसने यह बहस छेड़ दी है कि पर्यटन स्थलों पर स्थानीय नागरिकों और विदेशी पर्यटकों के लिए अलग शुल्क की सीमा क्या होनी चाहिए और इसे किस नजरिए से देखा जाए। विदेशी पर्यटक इसे भेदभाव के रूप में देख रहा है, जबकि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में भारतीयों ने दुनिया के दूसरे देशों की फीस और प्रवेश शुल्क व्यवस्था का उदाहरण देकर जवाब दिया है। ऐसे में दिल्ली हाट का यह छोटा-सा वीडियो अब पर्यटन, समानता, स्थानीय नागरिकों के अधिकार और विदेशी आगंतुकों के साथ व्यवहार को लेकर सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस का मुद्दा बन गया है।




