अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/तेहरान | 31 अगस्त 2026
ईरान और अमेरिका के बीच छह महीने से जारी युद्ध में एक महीने से अधिक की अपेक्षाकृत शांति के बाद फिर सीधा सैन्य टकराव तेज हो गया है। अमेरिका ने रविवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान के लारक द्वीप पर दो ईरानी रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया। इसके कुछ ही घंटों बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जवाबी कार्रवाई का दावा करते हुए जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की बात कही। जॉर्डन की सेना ने सोमवार तड़के कहा कि उसने उसके हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाली आठ मिसाइलों को रोक दिया। शुरुआती रिपोर्टों में अमेरिकी ठिकानों पर नुकसान के अलग-अलग दावे सामने आए हैं, लेकिन अमेरिकी पक्ष से हमले में हुए नुकसान का विस्तृत स्वतंत्र आकलन तत्काल उपलब्ध नहीं था। इसलिए ईरानी दावों को फिलहाल दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
लारक द्वीप पर अमेरिका का हमला क्यों हुआ?
अमेरिकी कार्रवाई का केंद्र लारक द्वीप रहा, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद रणनीतिक हिस्से में स्थित है। अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने देखा था कि IRGC की ओर से ऐसे रॉकेट लॉन्चरों की तैयारी की जा रही थी, जिनका इस्तेमाल होर्मुज में समुद्री बारूदी सुरंगें यानी sea mines पहुंचाने के लिए किया जा सकता था। इसके बाद अमेरिकी बलों ने दो लॉन्चरों पर हमला किया। यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे जुलाई के अंत के बाद ईरानी क्षेत्र में अमेरिका की पहली ज्ञात प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई बताया जा रहा है। अमेरिकी सेना पहले ही होर्मुज के अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से बारूदी सुरंगें हटाने का अभियान पूरा कर चुकी थी और वॉशिंगटन ने नए सिरे से माइन बिछाने की कोशिश के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था।
ईरान ने अमेरिकी हमले को गंभीर सैन्य कार्रवाई माना और IRGC ने जवाब देने की चेतावनी दी। ईरानी सरकारी तथा अर्ध-सरकारी मीडिया के अनुसार लारक द्वीप पर अमेरिकी हमले में कुछ ईरानी सैनिकों और नागरिकों की मौत तथा कुछ के घायल होने की बात कही गई है। IRGC ने कहा कि इस कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा। इसके बाद ईरानी बलों ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी वाले King Hussein और Al-Azraq एयरबेस को निशाना बनाने का दावा किया। ईरानी सरकारी मीडिया ने इन ठिकानों के तकनीकी एवं रखरखाव ढांचे और लड़ाकू विमानों से संबंधित क्षेत्रों को निशाना बनाने तथा भारी नुकसान पहुंचाने का दावा किया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि तत्काल नहीं हुई है।
जॉर्डन में मिसाइलें रोकी गईं
ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद जॉर्डन में हवाई सुरक्षा सक्रिय हो गई। जॉर्डन की सशस्त्र सेनाओं ने कहा कि आठ मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया गया, जो उसके हवाई क्षेत्र में दाखिल हुई थीं। स्थानीय रिपोर्टों में दक्षिणी जॉर्डन और अकाबा के आसपास धमाकों तथा मिसाइलों को रोकने की घटनाओं का उल्लेख किया गया। एक अमेरिकी स्रोत के हवाले से भी लगभग सभी आने वाली मिसाइलों को रोक लिए जाने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई ने संघर्ष को सीधे ईरान-अमेरिका क्षेत्र से निकालकर अमेरिकी सैन्य ठिकानों वाले दूसरे मध्य-पूर्वी देशों तक पहुंचाने का जोखिम बढ़ा दिया है।
होर्मुज क्यों है सबसे बड़ा खतरा?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। फारस की खाड़ी के तेल उत्पादक देशों से वैश्विक बाजार तक पहुंचने वाले बड़े हिस्से का समुद्री परिवहन इसी मार्ग से होता है। युद्ध के दौरान इस रास्ते में किसी भी लंबे व्यवधान का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एशिया, यूरोप और भारत सहित दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ सकता है।
ईरान की IRGC Navy ने दावा किया है कि उसके पास होर्मुज पर “पूर्ण नियंत्रण” है और तेहरान के साथ समन्वय के बिना वहां से गुजरने वाले जहाजों को रोका जा सकता है। इस दावे की वास्तविक परिचालन स्थिति अलग विषय है, लेकिन इससे समुद्री कंपनियों और तेल बाजारों में जोखिम की धारणा जरूर बढ़ी है। इसी बीच एक टैंकर के अज्ञात प्रोजेक्टाइल की चपेट में आने की सूचना भी सामने आई है। घटना में किसी के मारे जाने या पर्यावरणीय नुकसान की जानकारी नहीं दी गई। ऐसे घटनाक्रमों से जहाजरानी कंपनियों के लिए बीमा, सुरक्षा और मार्ग संबंधी लागत बढ़ सकती है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल
अमेरिकी हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई का असर वैश्विक तेल बाजार पर तुरंत दिखाई दिया। सोमवार को Brent crude फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। Reuters के अनुसार शुरुआती कारोबार में Brent करीब 2 प्रतिशत से अधिक चढ़ा, जबकि बाद के आंकड़ों में Brent futures में लगभग 2.52 प्रतिशत की तेजी के साथ 90.32 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI में लगभग 2.41 प्रतिशत की तेजी के साथ 85.41 डॉलर का स्तर दर्ज किया गया।
युद्ध शुरू होने के बाद Brent crude पहले लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से बढ़कर करीब 120 डॉलर तक पहुंच चुका है। बाद में तनाव कम होने और आपूर्ति को लेकर कुछ राहत मिलने से कीमतों में गिरावट आई थी। लेकिन होर्मुज में दोबारा सैन्य गतिविधियां बढ़ने से बाजार में फिर आशंका पैदा हुई है कि यदि समुद्री आवाजाही बाधित हुई तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत के लिए होर्मुज का घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। यदि संघर्ष के कारण तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ सकता है, जिससे व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव पड़ने की संभावना बनती है। लंबे समय तक महंगा कच्चा तेल परिवहन, विमानन, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक और अन्य उद्योगों की लागत को प्रभावित कर सकता है और इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों पर वास्तविक प्रभाव सरकार की मूल्य निर्धारण नीति, तेल कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय कीमतों की अवधि पर निर्भर करेगा।
अमेरिका के सामने एक और चुनौती—मिसाइल इंटरसेप्टर
इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण लेकिन कम दिखाई देने वाला प्रभाव अमेरिका और NATO की मिसाइल रक्षा क्षमता पर भी पड़ रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक यूरोप में अमेरिकी और NATO बलों के पास उन्नत मिसाइल इंटरसेप्टर का स्टॉक दबाव में है। खास तौर पर Patriot इंटरसेप्टर की उपलब्धता को लेकर चिंता जताई गई है। ये प्रणालियां बैलिस्टिक मिसाइलों से महत्वपूर्ण सैन्य एवं रणनीतिक ठिकानों की रक्षा में अहम भूमिका निभाती हैं। लगातार चल रहे मध्य-पूर्वी संघर्ष में बड़ी संख्या में मिसाइलों को रोकने की आवश्यकता से अमेरिकी भंडार पर दबाव बढ़ सकता है और इससे भविष्य में यूरोप में संभावित खतरों के लिए उपलब्ध रक्षा क्षमता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
युद्ध अब किस दिशा में जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि लारक द्वीप पर अमेरिकी हमला और जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी मिसाइल कार्रवाई सीमित जवाबी कार्रवाई तक रहती है या युद्ध के नए और अधिक खतरनाक चरण की शुरुआत करती है। एक महीने से अधिक समय बाद अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा सीधे हमले शुरू होने से क्षेत्रीय तनाव तेजी से बढ़ा है। यदि ईरान होर्मुज में जहाजों को रोकने या समुद्री सुरंगें बिछाने की कोशिश करता है और अमेरिका उसे रोकने के लिए लगातार सैन्य कार्रवाई करता है, तो संघर्ष का केंद्र ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बन सकता है।
फिलहाल तस्वीर साफ है—लारक द्वीप पर अमेरिकी हमला, उसके बाद ईरान की जवाबी मिसाइल कार्रवाई और होर्मुज में बढ़ता तनाव युद्ध को फिर से एक खतरनाक मोड़ पर ले आया है। इसका अगला असर केवल युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि तेल, जहाजरानी, वैश्विक बाजार और भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे सकता है।




