राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 अगस्त 2026
आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में शामिल दो सहयोगी दलों के बीच विवाद शनिवार को उस समय खुलकर सामने आ गया, जब केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बीच तीखी बयानबाजी हुई। मामला केवल आरक्षण की नीति पर असहमति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गया। चिराग पासवान ने जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन को चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे SC-ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ या बदलाव के पक्ष में हैं, तो पहले अपने पद से इस्तीफा दें। दूसरी ओर, मांझी के हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) का कहना है कि उसका उद्देश्य आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि इसका लाभ उन दलित समुदायों तक पहुंचाना है जो अब भी सबसे ज्यादा वंचित हैं।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
यह विवाद SC-ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण यानी कोटे के भीतर कोटा और आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ जैसे सवालों को लेकर शुरू हुआ। जीतन राम मांझी की पार्टी HAM ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और SC-ST श्रेणी के भीतर अधिक जरूरतमंद समुदायों के लिए अलग हिस्सेदारी की मांग का समर्थन किया है। मांझी के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी आरक्षण खत्म करने की बात नहीं कर रही है। उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ समाज के उन वर्गों तक भी पहुंचना चाहिए जो लंबे समय से इससे पर्याप्त लाभ नहीं ले पाए हैं। HAM ने यह सवाल भी उठाया है कि अगर दूसरे आरक्षित वर्गों में अत्यंत पिछड़े समूहों के लिए अलग व्यवस्था पर चर्चा हो सकती है, तो SC समुदायों के भीतर सबसे वंचित समूहों की स्थिति पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए।
चिराग पासवान ने क्यों खोला मोर्चा?
चिराग पासवान ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि SC-ST आरक्षण की बुनियाद आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता है। उनके अनुसार अगर आरक्षण को मुख्य रूप से आर्थिक आधार से जोड़ दिया गया तो इसकी मूल भावना बदल जाएगी। इसी आधार पर उन्होंने मांझी और उनके बेटे को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि यदि वे ‘क्रीमी लेयर’ की व्यवस्था के पक्ष में हैं, तो उन्हें पहले अपने पदों से इस्तीफा देना चाहिए। चिराग ने यह भी कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीतिक बयानबाजी के बजाय संसद में गंभीर और व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
मांझी खेमे का तर्क भी समझना जरूरी
मांझी खेमे का सवाल अलग है। उसका कहना है कि SC श्रेणी के भीतर सभी समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ समुदायों को आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत अधिक मिला है, जबकि कुछ अत्यंत पिछड़े दलित समुदाय अभी भी प्रतिनिधित्व के मामले में पीछे हैं। इसी अंतर को दूर करने के लिए उप-वर्गीकरण की मांग की जा रही है। HAM ने पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में आरक्षण के भीतर वर्गीकरण की बहस का भी संदर्भ दिया है। इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी महत्वपूर्ण है, जिसमें राज्यों को SC/ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण करने की संवैधानिक अनुमति से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला दिया गया था।
एक ही सरकार में दो अलग रास्ते
राजनीतिक रूप से यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दोनों ही NDA के सहयोगी हैं और दोनों केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री हैं। बिहार की राजनीति में भी दोनों नेताओं का अपना सामाजिक और राजनीतिक आधार है। ऐसे में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दोनों का खुलकर आमने-सामने आना NDA के भीतर सामाजिक न्याय और दलित राजनीति को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण को सामने लाता है। यह केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत बयानबाजी नहीं है, बल्कि इसके पीछे यह बड़ा सवाल है कि आरक्षण का लाभ किस तरह और किन समुदायों तक पहुंचाया जाए।
आरक्षण पर बहस अब और तेज होने के संकेत
इस विवाद ने ऐसे समय में राजनीतिक तापमान बढ़ाया है जब देश में आरक्षण को लेकर बहस फिर तेज है। चिराग पासवान आरक्षण को सामाजिक भेदभाव से जोड़ते हुए मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा की बात कर रहे हैं, जबकि मांझी खेमे की मांग मौजूदा व्यवस्था के भीतर सबसे वंचित समूहों को अधिक प्रभावी हिस्सेदारी देने की है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों को सामाजिक न्याय से जोड़ रहे हैं। इसलिए आने वाले समय में यह बहस केवल बिहार तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण, क्रीमी लेयर और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन सकते हैं।
असली सवाल—आरक्षण का लाभ सबसे वंचित तक कैसे पहुंचे?
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद यही है कि आरक्षण का उद्देश्य समाज के सबसे वंचित लोगों तक अवसर पहुंचाना है, तो उसकी व्यवस्था को कितना प्रभावी बनाया जा सकता है। चिराग पासवान का जोर इस बात पर है कि सामाजिक भेदभाव अभी समाप्त नहीं हुआ है और इसलिए आरक्षण की मूल सामाजिक न्याय की भावना कमजोर नहीं होनी चाहिए। मांझी खेमे का जोर इस बात पर है कि आरक्षित श्रेणी के भीतर भी जो समुदाय सबसे पीछे रह गए हैं, उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। दोनों तर्कों के बीच समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं, बल्कि आंकड़ों, सामाजिक स्थिति, संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक फैसलों के आधार पर गंभीर चर्चा से निकल सकता है।
NDA के लिए भी बड़ी राजनीतिक चुनौती
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी का यह टकराव NDA के लिए भी महत्वपूर्ण है। दोनों नेता बिहार में सामाजिक न्याय और दलित राजनीति के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। ऐसे में उनके बीच आरक्षण पर खुली लड़ाई गठबंधन के भीतर मतभेदों को सार्वजनिक कर रही है। फिलहाल विवाद बयानबाजी और इस्तीफे की मांग तक पहुंचा है, लेकिन आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र और NDA नेतृत्व इस मतभेद को किस तरह संभालता है। आरक्षण का सवाल करोड़ों लोगों के अवसर, प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान से जुड़ा है। इसलिए इसका समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा संविधान, न्यायालय के फैसलों और ठोस सामाजिक आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।




