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नेपाल-चीन बाढ़ में पर्यटन बना त्रासदी का केंद्र, सैकड़ों लोग लापता; तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के परिवारों की बढ़ी बेचैनी

अंतरराष्ट्रीय/ट्रैवल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 अगस्त 2026

नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने केवल स्थानीय गांवों और नदी किनारे बसे समुदायों को ही नहीं, बल्कि उस पूरे पर्यटन गलियारे को अपनी चपेट में ले लिया है जहां हर साल हजारों पर्यटक, ट्रेकर्स और तीर्थयात्री पहुंचते हैं। बुधवार को नेपाल के त्रिशूली नदी क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ ने कई बस्तियों, सड़कों और संपर्क मार्गों को तबाह कर दिया। इसके बाद सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की सामने आई है जो नेपाल, भारत, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के दूसरे हिस्सों में बैठकर अपने प्रियजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। कई लोग नेपाल घूमने, ट्रेकिंग करने या धार्मिक यात्रा पर गए थे और अब उनका कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार नेपाल में कम से कम 517 विदेशी नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें 178 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं। चीन की सीमा की ओर भी सैकड़ों लोग लापता बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह आपदा केवल प्राकृतिक त्रासदी नहीं रह गई है, बल्कि इसने हिमालयी पर्यटन की सुरक्षा, तीर्थयात्रा के जोखिम और विदेश यात्रा पर जाने वाले लोगों की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिस रास्ते पर हर साल पहुंचते हैं पर्यटक और तीर्थयात्री, वही बना मौत और लापता होने का क्षेत्र

नेपाल का त्रिशूली नदी क्षेत्र केवल स्थानीय आबादी के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। यह हिमालयी पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण इलाका है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जैसे जिले इस क्षेत्र से जुड़े हैं और यहां से होकर ट्रेकिंग, राफ्टिंग तथा धार्मिक यात्राओं के लिए लोग गुजरते हैं। गर्मियों और शुरुआती शरद ऋतु में इस इलाके में विदेशी पर्यटकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में भारतीय तीर्थयात्री भी पहुंचते हैं। इनमें से कई यात्री तिब्बत स्थित पवित्र कैलाश पर्वत की यात्रा के लिए नेपाल के रास्ते सीमा की ओर बढ़ते हैं। यही कारण है कि अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन का असर स्थानीय लोगों से कहीं आगे जाकर पर्यटन समूहों, तीर्थयात्रियों और विदेशी नागरिकों तक पहुंचा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस आपदा के बाद कई परिवारों को यह तक पता नहीं चल पा रहा कि उनके अपने लोग आखिर कहां हैं। सड़क और संचार व्यवस्था बाधित होने के कारण मोबाइल संपर्क टूट गया है और कई इलाकों तक बचाव दलों का पहुंचना भी कठिन हो गया है। ऐसे में किसी होटल, गेस्टहाउस, बस, ट्रेकिंग समूह या तीर्थयात्रा दल से संपर्क टूटना परिवारों के लिए घंटों और दिनों की बेचैनी में बदल गया है। सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा अपने रिश्तेदारों और दोस्तों की तस्वीरें साझा कर मदद की अपील की जा रही है। किसी के पास आखिरी फोन कॉल की जानकारी है, किसी के पास बस का विवरण है और किसी के पास केवल इतना पता है कि उनका अपना व्यक्ति उस इलाके में था।

21 वर्षीय सुमन की आखिरी बात—“सुबह मिलते हैं”

इस त्रासदी की मानवीय तस्वीर नेपाल के 21 वर्षीय सुमन दहाल की कहानी में दिखाई देती है। सुमन माउंट कैलाश की यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों के एक टूर समूह के साथ काम करते थे। बुधवार को वह त्रिशूली नदी के किनारे स्थित तिमुरे इलाके में थे और काठमांडू लौटने की तैयारी कर रहे थे। उनकी बहन अस्मिता दहाल के मुताबिक सुमन ने आखिरी बार परिवार से संपर्क किया था। बातचीत के अंत में उन्होंने कहा था—“सुबह मिलते हैं।” लेकिन वह सुबह परिवार के लिए सामान्य सुबह नहीं बनी। उसके बाद सुमन से संपर्क नहीं हो पाया।

परिवार को आशंका है कि जिस बस से वह लौटने वाले थे, वह बाढ़ की चपेट में आ गई हो सकती है। लेकिन जब तक बचाव दल वहां पहुंचकर स्थिति स्पष्ट नहीं करते, परिवार के पास केवल इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक फोन कॉल, एक संदेश या किसी बचाव दल की सूचना अब उनके लिए उम्मीद बन गई है। यह कहानी अकेले सुमन की नहीं है। ऐसे कई परिवार हैं जिनके अपने लोग पर्यटक, गाइड, चालक, तीर्थयात्री या स्थानीय पर्यटन व्यवसाय से जुड़े होने के कारण उस इलाके में मौजूद थे और अब उनसे संपर्क टूट चुका है।

178 भारतीय लापता—कैलाश यात्रा ने बढ़ाई चिंता

भारतीय परिवारों के लिए इस आपदा की चिंता और भी बड़ी है। नेपाल पर्यटन बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार नेपाल में लापता विदेशी नागरिकों में कम से कम 178 भारतीय शामिल हैं। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की बताई जा रही है जो धार्मिक यात्रा के लिए नेपाल से होते हुए तिब्बत की ओर बढ़ रहे थे। कैलाश पर्वत की यात्रा भारतीय श्रद्धालुओं के लिए केवल पर्यटन नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ी यात्रा है। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र से होकर गुजरते हैं।

अमेरिकी नागरिक राधिका शर्मा के माता-पिता रमेश और नीलम शर्मा भी ऐसे ही एक धार्मिक यात्रा समूह का हिस्सा थे। परिवार के मुताबिक तीर्थयात्रियों के समूह से टूर कंपनी का आखिरी संपर्क बुधवार सुबह उस समय हुआ था जब वे तिब्बत की सीमा तक पहुंच चुके थे। उसके बाद परिवार को कोई खबर नहीं मिली। राधिका ने इस इंतजार को अपनी जिंदगी के सबसे कठिन समयों में से एक बताया। उनके लिए अब कैलाश यात्रा, जो आस्था और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में शुरू हुई थी, अचानक अनिश्चितता और भय में बदल गई है।

सिर्फ भारतीय नहीं, दुनिया भर के परिवार कर रहे हैं इंतजार

नेपाल में लापता विदेशी नागरिकों की सूची में कई देशों के लोग शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक भारतीयों के अलावा 53 यूक्रेनी, 51 मलेशियाई, 35 ऑस्ट्रेलियाई, 33 ब्रिटिश और 25 कनाडाई नागरिक भी लापता बताए गए हैं। अमेरिका ने भी अपने 90 नागरिकों के लापता होने की जानकारी दी है। यानी यह आपदा नेपाल के पहाड़ी इलाकों में हुई जरूर है, लेकिन इसकी चिंता दुनिया के कई देशों के घरों तक पहुंच चुकी है।

लापता लोगों में पर्यटक और कम उम्र के बच्चे भी शामिल बताए गए हैं। एक टूर कंपनी के मुताबिक जिस समूह का संपर्क नहीं हो पा रहा है, उसमें 14 वर्ष की एक अमेरिकी लड़की तथा 12 और 14 वर्ष की उम्र के दो ऑस्ट्रेलियाई लड़के भी शामिल हैं। बच्चों के लापता होने की खबर ने इस आपदा की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। जिन परिवारों ने बच्चों को सुरक्षित यात्रा और यादगार अनुभव के लिए भेजा था, वे अब हर आने वाली खबर पर उम्मीद लगाए बैठे हैं।

पर्यटन के लिए लोकप्रिय जगह, लेकिन प्रकृति के सामने बेहद कमजोर

हिमालयी क्षेत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती ही कई बार उसका सबसे बड़ा जोखिम बन जाती है। ऊंचे पहाड़, संकरी घाटियां, तेज बहाव वाली नदियां और घुमावदार सड़कें पर्यटकों के लिए रोमांच पैदा करती हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदा के समय यही भौगोलिक परिस्थितियां बचाव कार्य को बेहद कठिन बना देती हैं। त्रिशूली नदी के किनारे बसे कई इलाकों में लोगों की आजीविका कृषि के साथ-साथ पर्यटन, ट्रेकिंग और राफ्टिंग से जुड़ गई है। यानी जिस पर्यटन ने स्थानीय लोगों को आर्थिक अवसर दिए, उसी पर्यटन मार्ग पर आई आपदा ने स्थानीय समुदायों के साथ यात्रियों को भी जोखिम में डाल दिया।

रसुवा जैसे क्षेत्रों में पहले से ही गरीबी और बुनियादी सुविधाओं की सीमाएं चुनौती बनी हुई हैं। 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद कई परिवारों ने बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी दोबारा खड़ी की थी। कुछ परिवार नदी के निचले इलाकों में जाकर बस गए थे। अब अचानक आई बाढ़ ने उन्हीं समुदायों को एक और बड़े संकट में धकेल दिया है। इसका असर स्थानीय लोगों के साथ उन पर्यटकों पर भी पड़ा है जो उसी सड़क और नदी घाटी से होकर गुजर रहे थे।

चीन की सीमा पर भी सैकड़ों लोग लापता

त्रासदी की सीमा नेपाल तक नहीं रुकती। नेपाल-चीन सीमा के पास शुरू हुआ भूस्खलन आगे चीन के जियारोंग बंदरगाह क्षेत्र तक पहुंचा, जो दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सीमा मार्ग है। चीन की ओर भी कम से कम 558 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है, जिनमें लगभग 260 विदेशी नागरिक बताए गए हैं। इसका अर्थ यह है कि जिस हिमालयी सीमा क्षेत्र को पर्यटन, व्यापार और धार्मिक यात्राओं के लिए महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, वही अब बड़े मानवीय संकट का केंद्र बन गया है।

यह स्थिति उन यात्रियों के लिए विशेष चिंता पैदा करती है जो एक देश से दूसरे देश की सीमा की ओर यात्रा करते हैं। ऐसे मार्गों पर किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में केवल होटल या एयरपोर्ट की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होती। यात्रियों की वास्तविक समय में लोकेशन, टूर ऑपरेटर की जिम्मेदारी, सीमा अधिकारियों के साथ समन्वय और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

परिवारों की सबसे बड़ी समस्या—“हमें पता ही नहीं कि वे कहां हैं”

प्राकृतिक आपदा में मौत की पुष्टि जितनी दर्दनाक होती है, उससे कम कठिन नहीं होता किसी व्यक्ति के लापता होने का इंतजार। नेपाल की इस त्रासदी में कई परिवार इसी मानसिक पीड़ा से गुजर रहे हैं। कनाडा के ओटावा में रहने वाली रोजिना धुंगाना को जब अपने गृह क्षेत्र के बाढ़ में तबाह होने की खबर मिली तो उनके माता-पिता सुरक्षित थे, लेकिन उनके पुराने पड़ोसी, दोस्त और परिचितों में कई लोग लापता थे। सोशल मीडिया पर लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि फलां व्यक्ति सुरक्षित है या नहीं, किस होटल में था, किस बस में गया था और आखिरी बार किससे बात हुई थी।

संचार व्यवस्था टूट जाने के बाद ऐसी परिस्थितियों में अफवाहें भी तेजी से फैलती हैं। किसी को कोई अधूरी जानकारी मिलती है, कोई पुरानी तस्वीर साझा कर देता है और परिवारों की बेचैनी और बढ़ जाती है। इसलिए आपदा के दौरान आधिकारिक सूचना तंत्र का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। परिवारों को स्पष्ट सूची, हेल्पलाइन, सुरक्षित लोगों की जानकारी और लापता यात्रियों की पुष्टि की प्रक्रिया जल्द उपलब्ध कराना राहत और बचाव कार्य जितना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्या हिमालयी पर्यटन की सुरक्षा व्यवस्था पर अब सवाल उठेंगे?

नेपाल की यह घटना पर्यटन उद्योग के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—क्या अत्यधिक लोकप्रिय पर्यटन और तीर्थ मार्गों पर आपदा प्रबंधन की व्यवस्था उस स्तर की है, जिस स्तर पर अब अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या पहुंच चुकी है? खासकर उन क्षेत्रों में जहां पर्यटक समूह बसों, जीपों या स्थानीय मार्गों से सीमा की ओर जाते हैं, वहां मौसम की तत्काल चेतावनी, नदी के जलस्तर की निगरानी, सुरक्षित मार्गों की जानकारी और यात्रियों की डिजिटल ट्रैकिंग जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत बढ़ती जा रही है।

टूर ऑपरेटरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी पर्यटक समूह के साथ कितने लोग हैं, वे किस वाहन में हैं, उनका अगला पड़ाव क्या है, वे किस होटल या गेस्टहाउस में रुके थे और आखिरी बार उनसे कब संपर्क हुआ—ऐसी जानकारी आपातकालीन स्थिति में बचाव एजेंसियों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। विशेष रूप से विदेशी यात्रियों के मामले में दूतावासों और स्थानीय प्रशासन के बीच त्वरित समन्वय जरूरी है।

भारतीय यात्रियों के लिए भी बड़ा सबक

नेपाल भारत से सबसे लोकप्रिय विदेशी पर्यटन स्थलों में से एक है। धार्मिक यात्राओं, पर्वतीय पर्यटन, साहसिक गतिविधियों और पड़ोसी देश होने के कारण भारतीय यात्रियों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। ऐसे में इस घटना से भारतीय पर्यटकों के लिए भी कई सबक निकलते हैं। किसी दूरदराज पहाड़ी या सीमा क्षेत्र में जाने से पहले केवल होटल और टिकट की बुकिंग करना पर्याप्त नहीं है। मौसम की स्थिति, स्थानीय प्रशासन की चेतावनी, यात्रा मार्ग, टूर ऑपरेटर की विश्वसनीयता, आपातकालीन संपर्क और यात्रा बीमा जैसी चीजों को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए।

विशेषकर मानसून या भारी बारिश वाले मौसम में पहाड़ी क्षेत्रों की यात्रा करते समय मौसम तेजी से बदल सकता है। जिस सड़क पर कुछ घंटे पहले यातायात सामान्य था, वही अचानक भूस्खलन या बाढ़ के कारण बंद हो सकती है। इसलिए यात्रा की योजना में कुछ अतिरिक्त समय रखना, स्थानीय अधिकारियों की चेतावनी का पालन करना और जोखिम वाले मार्गों पर अनावश्यक यात्रा से बचना बेहद जरूरी है।

पर्यटन सिर्फ खूबसूरत तस्वीरों का नाम नहीं

नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर याद दिलाया है कि पर्यटन की चमकदार तस्वीर के पीछे कई वास्तविक जोखिम भी छिपे होते हैं। पहाड़ों के बीच बहती नदी, बादलों से घिरी सड़क, ट्रेकिंग मार्ग, तीर्थयात्रा का रास्ता या सीमा की ओर जाती बस—सोशल मीडिया पर ये सब रोमांचक तस्वीरें लग सकती हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदा के समय यही रास्ते जीवन और मौत के बीच की दूरी बन सकते हैं।

आज सैकड़ों परिवारों के लिए नेपाल कोई पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि इंतजार का नाम बन गया है। किसी मां-बाप को अपने बच्चे की खबर चाहिए, किसी बहन को अपने भाई की, किसी बेटी को अपने माता-पिता की और किसी दोस्त को अपने साथी की। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि नेपाल का पर्यटन कब सामान्य होगा। सवाल सिर्फ इतना है—“हमारा अपना व्यक्ति कहां है?”

अब प्राथमिकता—हर लापता व्यक्ति तक पहुंचना

बचाव अभियान जारी है और अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दुर्गम पहाड़ी इलाके तक पहुंचना, संचार व्यवस्था बहाल करना और बाढ़ एवं भूस्खलन से प्रभावित क्षेत्रों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना है। जब तक आधिकारिक तौर पर सभी प्रभावित इलाकों की जांच पूरी नहीं हो जाती, लापता लोगों की वास्तविक संख्या और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होना मुश्किल है।

लेकिन इस आपदा से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—पर्यटन की सुरक्षा अब केवल सड़क, होटल और गाइड की व्यवस्था का विषय नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और चरम मौसम की घटनाओं के दौर में पर्यटन स्थलों पर आपदा प्रबंधन भी यात्रा की मूलभूत जरूरत बन चुका है। खासकर उन जगहों पर जहां धार्मिक यात्रियों और विदेशी पर्यटकों की बड़ी संख्या पहुंचती है, वहां हर यात्री का रिकॉर्ड, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था और त्वरित बचाव प्रणाली मजबूत करना जरूरी होगा।

नेपाल के पहाड़ों में इस समय सिर्फ पानी और मलबा नहीं बह रहा। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बैठे परिवारों की उम्मीदें भी उसी नदी के साथ जुड़ी हुई हैं। कोई अपने बेटे की वापसी की प्रार्थना कर रहा है, कोई माता-पिता के फोन का इंतजार कर रहा है और कोई सोशल मीडिया पर मदद की अपील कर रहा है। इस त्रासदी की सबसे बड़ी कहानी आंकड़ों में नहीं, उन चेहरों में है जो अपने लापता अपनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं।

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