कानूनी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/जयपुर | 26 अगस्त 2026
राजस्थान हाईकोर्ट से जुड़ा एक असाधारण और गंभीर घटनाक्रम सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.पी. शर्मा को तत्काल किसी दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया है। जस्टिस मेहता ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अन्य सदस्यों को भी पत्रों के माध्यम से अवगत कराया है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस मेहता ने अगस्त में लिखे तीन पत्रों में जस्टिस शर्मा पर अधिकारों के कथित दुरुपयोग और न्यायिक मामलों के रोस्टर से संबंधित कथित अनियमितताओं जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जस्टिस शर्मा के संबंध में कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जिनके कारण उनकी ईमानदारी को लेकर संदेह पैदा होता है।
जस्टिस मेहता ने अपने पत्र में जस्टिस शर्मा को राजस्थान से बाहर स्थानांतरित किए जाने की मांग करते हुए इसे न्यायिक संस्था के हित से जोड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा को राजस्थान से तत्काल बाहर नहीं भेजना संस्था के हित के खिलाफ होगा। उन्होंने किसी अन्य हाईकोर्ट से नए मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति किए जाने का सुझाव भी दिया है।
मामला क्यों असाधारण है?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिकायत किसी राजनीतिक दल, वकील संगठन या बाहरी व्यक्ति की ओर से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के ही एक मौजूदा जज की ओर से सामने आई है। जस्टिस मेहता स्वयं राजस्थान से आते हैं और राजस्थान हाईकोर्ट में भी न्यायाधीश रह चुके हैं।
किसी हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा इस स्तर पर सवाल उठाया जाना न्यायपालिका के प्रशासनिक कामकाज और संस्थागत व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास मामलों के आवंटन और पीठों के गठन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे में रोस्टर से जुड़ी किसी भी शिकायत को न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय माना जाता है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जस्टिस मेहता द्वारा लगाए गए आरोप अभी आरोप ही हैं। उपलब्ध रिपोर्ट में ऐसा कोई अंतिम न्यायिक या प्रशासनिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है, जिसमें जस्टिस शर्मा को इन आरोपों का दोषी ठहराया गया हो। इसलिए पूरे मामले को आरोपों और शिकायतों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
कॉलेजियम के सामने अब बड़ी चुनौती
जस्टिस मेहता की मांग के बाद अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पर हैं। कॉलेजियम को यह तय करना होगा कि सामने रखी गई शिकायतों और आरोपों पर किस तरह विचार किया जाए और क्या जस्टिस शर्मा के तबादले की सिफारिश की जाए।
न्यायपालिका में जजों के तबादले और नियुक्तियां संवेदनशील विषय होते हैं। खासकर किसी हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत सामने आने पर निर्णय लेते समय संस्थागत गरिमा, न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि शिकायतों की प्रकृति क्या है, वे कितनी गंभीर हैं और उनके समर्थन में क्या सामग्री कॉलेजियम के सामने रखी गई है। यदि आरोपों की जांच या समीक्षा की आवश्यकता महसूस होती है, तो संबंधित प्रक्रिया के जरिए तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है।
न्यायपालिका की विश्वसनीयता का सवाल
न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। अदालतों से जनता केवल न्याय की उम्मीद नहीं करती, बल्कि यह भी अपेक्षा करती है कि न्यायिक संस्थानों के भीतर प्रशासनिक निर्णय निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से लिए जाएं।
मामलों के आवंटन और रोस्टर व्यवस्था का न्यायिक प्रक्रिया में विशेष महत्व है। यदि इस व्यवस्था को लेकर किसी वरिष्ठ न्यायाधीश की ओर से गंभीर आपत्ति दर्ज कराई जाती है, तो उसका संस्थागत स्तर पर गंभीरता से परीक्षण होना स्वाभाविक है।
फिलहाल इस घटनाक्रम का अगला चरण सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के रुख पर निर्भर करेगा। यदि कॉलेजियम मामले पर विचार करता है तो आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि जस्टिस मेहता की मांग पर क्या निर्णय लिया जाता है और क्या राजस्थान हाईकोर्ट के नेतृत्व में कोई बदलाव किया जाएगा।
इतना स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज द्वारा राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ स्थानांतरण की मांग ने न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक कामकाज को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। अब इस मामले में पारदर्शी प्रक्रिया और तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा ही आगे की दिशा तय करेगी।




